इतिहास जो पढ़ाया/बताया नहीं जाता....
भाग-1
*खोयी हुई, या गायब की हुई इतिहास की एक झलक
*622 ई से लेकर 634 ई तक मात्र 12 वर्ष में अरब के सभी मूर्तिपूजकों को मुहम्मद ने तलवार से जबरदस्ती मुसलमान बना दिया! (मक्का में महादेव काबळेश्वर (काबा) को छोड कर!)*
*634 ईस्वी से लेकर 651 तक, यानी मात्र 16 वर्ष में सभी पारसियों को तलवार की नोंक पर जबरदस्ती मुसलमान बना दिया!*
*640 में मिस्र में पहली बार इस्लाम ने पांँव रखे, और देखते ही देखते मात्र 15 वर्ष में, 655 तक इजिप्ट के लगभग सभी लोग जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*
*नार्थ अफ्रीकन देश जैसे अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को आदि देशों को 640 से 711 ई तक पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म में जबरदस्ती बदल दिया गया!*
*3 देशों का सम्पूर्ण सुख चैन जबरदस्ती छीन लेने में मुसलमानो ने मात्र 71 वर्ष लगाए!*
*711 ईस्वी में स्पेन पर आक्रमण हुआ, 730 ईस्वी तक स्पेन की 70% आबादी मुसलमान थी!*
*मात्र 19 वर्ष में तुर्क थोड़े से वीर निकले, तुर्कों के विरुद्ध जिहाद 651 ईस्वी में आरंभ हुआ, और 751 ईस्वी तक सारे तुर्क जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*
*इण्डोनेशिया के विरुद्ध जिहाद मात्र 40 वर्ष में पूरा हुआ! सन 1260 में मुसलमानों ने इण्डोनेशिया में मारकाट मचाई, और 1300 ईस्वी तक सारे इण्डोनेशियाई जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*
*फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन आदि देशों को 634 से 650 के बीच जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*
*सीरिया की कहानी तो और दर्दनाक है! मुसलमानों ने इसाई सैनिकों के आगे अपनी महिलाओ को कर दिया! मुसलमान महिलाये गयीं इसाइयों के पास, कि मुसलमानों से हमारी रक्षा करो! बेचारे मूर्ख इसाइयों ने इन धूर्तो की बातों में आकर उन्हें शरण दे दी! फिर क्या था, सारी "सूर्पनखा" के रूप में आकर, सबने मिलकर रातों रात सभी सैनिकों को हलाल करवा दिया!*
*अब आप भारत की स्थिति देखिये!*
*उसके बाद 700 ईस्वी में भारत के विरुद्ध जिहाद आरंभ हुआ! वह अब तक चल रहा है!*
*जिस समय आक्रमणकारी ईरान तक पहुँचकर अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर चुके थे, उस समय उनकी हिम्मत नहीं थी कि भारत के राजपूत साम्राज्य की ओर आंँख उठाकर भी देख सकें!*
*636 ईस्वी में खलीफा ने भारत पर पहला हमला बोला! एक भी आक्रान्ता जीवित वापस नहीं जा पाया!*
*कुछ वर्ष तक तो मुस्लिम आक्रान्ताओं की हिम्मत तक नहीं हुई भारत की ओर मुँह करके सोया भी जाए! लेकिन कुछ ही वर्षो में गिद्धों ने अपनी जात दिखा ही दी! दुबारा आक्रमण हुआ! इस समय खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था! उसने हाकिम नाम के सेनापति के साथ विशाल इस्लामी टिड्डिदल भारत भेजा!*
*सेना का पूर्णतः सफाया हो गया, और सेनापति हाकिम बन्दी बना लिया गया! हाकिम को भारतीय राजपूतों ने मार भगाया और बड़ा बुरा हाल करके वापस अरब भेजा, जिससे उनकी सेना की दुर्गति का हाल, उस्मान तक पहुंँच जाए!*
*यह सिलसिला लगभग 700 ईस्वी तक चलता रहा! जितने भी मुसलमानों ने भारत की तरफ मुँह किया, राजपूत शासकों ने उनका सिर कन्धे से नीचे उतार दिया!*
*उसके बाद भी भारत के वीर जवानों ने पराजय नही मानी! जब 7 वीं सदी इस्लाम की आरंभ हुई, जिस समय अरब से लेकर अफ्रीका, ईरान, यूरोप, सीरिया, मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की यह बड़े बड़े देश जब मुसलमान बन गए, भारत में महाराणा प्रताप के पूर्वज बप्पा रावल का जन्म हो चुका था!*
*वे अद्भुत योद्धा थे, इस्लाम के पञ्जे में जकड़ कर अफगानिस्तान तक से मुसलमानों को उस वीर ने मार भगाया! केवल यही नहीं, वह लड़ते लड़ते खलीफा की गद्दी तक जा पहुंँचे! जहाँ स्वयं खलीफा को अपनी प्राणों की भिक्षा माँगनी पड़ी!*
*उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं! नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय जैसे योद्धा भारत को मिले! जिन्होंने अपने पूरे जीवन में राजपूती धर्म का पालन करते हुए, पूरे भारत की न केवल रक्षा की, बल्कि हमारी शक्ति का डङ्का विश्व में बजाए रखा!*
*पहले बप्पा रावल ने पुरवार किया था, कि अरब अपराजित नहीं है! लेकिन 836 ई के समय भारत में वह हुआ, कि जिससे विश्वविजेता मुसलमान थर्रा गए!*
*सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने मुसलमानों को केवल 5 गुफाओं तक सीमित कर दिया! यह वही समय था, जिस समय मुसलमान किसी युद्ध में केवल विजय हासिल करते थे, और वहाँ की प्रजा को मुसलमान बना देते!*
*भारत वीर राजपूत मिहिरभोज ने इन आक्रांताओ को अरब तक थर्रा दिया!*
*पृथ्वीराज चौहान तक इस्लाम के उत्कर्ष के 400 वर्ष बाद तक राजपूतों ने इस्लाम नाम की बीमारी भारत को नहीं लगने दी! उस युद्ध काल में भी भारत की अर्थव्यवस्था अपने उत्कृष्ट स्थान पर थी! उसके बाद मुसलमान विजयी भी हुए, लेकिन राजपूतों ने सत्ता गंवाकर भी पराजय नही मानी, एक दिन भी वे चैन से नहीं बैठे!*
*अन्तिम वीर दुर्गादास जी राठौड़ ने दिल्ली को झुकाकर, जोधपुर का किला मुगलों के हाथो ने निकाल कर हिन्दू धर्म की गरिमा, को चार चाँद लगा दिए!*
*किसी भी देश को मुसलमान बनाने में मुसलमानों ने 20 वर्ष नहीं लिए, और भारत में 800 वर्ष राज करने के बाद भी मेवाड़ के शेर महाराणा राजसिंह ने अपने घोड़े पर भी इस्लाम की मुहर नहीं लगने दी!*
*महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, मिहिरभोज, रानी दुर्गावती, अपनी मातृभूमि के लिए जान पर खेल गए!*
*एक समय ऐसा आ गया था, लड़ते लड़ते राजपूत केवल 2% पर आकर ठहर गए! एक बार पूरा विश्व देखें, और आज अपना वर्तमान देखें! जिन मुसलमानों ने 20 वर्ष में विश्व की आधी जनसंख्या को मुसलमान बना दिया, वह भारत में केवल पाकिस्तान बाङ्ग्लादेश तक सिमट कर ही क्यों रह गए?*
*राजा भोज, विक्रमादित्य, नागभट्ट प्रथम और नागभट्ट द्वितीय, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, समुद्रगुप्त, स्कन्द गुप्त, छत्रसाल बुन्देला, आल्हा उदल, राजा भाटी, भूपत भाटी, चाचादेव भाटी, सिद्ध श्री देवराज भाटी, कानड़ देव चौहान, वीरमदेव चौहान, हठी हम्मीर देव चौहान, विग्रह राज चौहान, मालदेव सिंह राठौड़, विजय राव लाँझा भाटी, भोजदेव भाटी, चूहड़ विजयराव भाटी, बलराज भाटी, घड़सी, रतनसिंह, राणा हमीर सिंह और अमर सिंह, अमर सिंह राठौड़, दुर्गादास राठौड़, जसवन्त सिंह राठौड़, मिर्जा राजा जयसिंह, राजा जयचंद, भीमदेव सोलङ्की, सिद्ध श्री राजा जय सिंह सोलङ्की, पुलकेशिन द्वितीय सोलङ्की, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, राजकुमारी रतनबाई, रानी रुद्रा देवी, हाड़ी रानी, रानी पद्मावती, जैसी अनेको रानियों ने लड़ते-लड़ते अपने राज्य की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए!*
*अन्य योद्धा तोगा जी वीरवर कल्लाजी जयमल जी जेता कुपा, गोरा बादल राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छावा, मोहन सिंह मँढाड़, राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस, राव शेखाजी, राव चन्द्रसेन जी दोड़, राव चन्द्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलङ्की, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुण्डीर, बल्लू जी चम्पावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंह तोमर और उनका वंश, झाला राजा मान, महाराजा अनङ्गपाल सिंह तोमर, स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह, अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्श सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह, ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूङ्गजी, भुरजी, बलजी, जवाहर जी, छत्रपति शिवाजी!*
*ऐसे हिन्दू योद्धाओं का संदर्भ हमें हमारे इतिहास में तत्कालीन नेहरू-गाँधी सरकार के शासन काल में कभी नहीं पढ़ाया गया! पढ़ाया ये गया, कि अकबर महान बादशाह था! फिर हुमायूँ, बाबर, औरङ्गजेब, ताजमहल, कुतुब मीनार, चारमीनार आदि के बारे में ही पढ़ाया गया!*
*अगर हिन्दू सङ्गठित नहीं रहते, तो आज ये देश भी पूरी तरह सीरिया और अन्य देशों की तरह पूर्णतया मुस्लिम देश बन चुका होता!*
*ये सुंदर विश्लेषण जानकारी हिंदू समाज तक पहुंचना अनिवार्य है! हर वर्ग और समाज में वीरों की गाथाओं को बताकर उन्हें गर्व की अनुभूति करानी चाहिए!*
जय हिन्दी जय हिंदुस्तान
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व्हाट्स ऐप से साभार
-✍🏻✍🏻 स्वामी दीपेशानन्द सरस्वती
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2-
प्रस्तावना
आज़ादी के बाद हमने इस देश का नाम “भारत” रखा “हिंदुस्तान” नहीं। जबकि 1206 से 1858 तक इसे हिंदुस्तान कहा जाता था। 01 जनवरी 1859 से ब्रिटेन की रानी ने इसे इंडिया नाम दे दिया। हमारा अपना नाम भारत है। क्या “भारतीयता” और “हिंदुस्तान” अलग-अलग हैं। हाँ, भारतीयता में हिंदू सम्मिलित है परंतु सिर्फ़ हिंदू ही भारतीय नहीं हैं। भारतीयता में और भी बहुत कुछ शामिल है। यह एक बहुत लम्बी दास्तान है। “भारत” हमारे पितरों की पुण्य भूमि के निवासियों का स्वमेव उपार्जित नाम है जो यहाँ की मातृभूमि की संस्कृति और भूगोल की मिलीजुली देन है। “हिंदू” नाम हमें दूसरों ने दिया है। हिंदुत्व सेवा में रत सरसंघ चालक भागवत जी भारत के हितार्थ अखिल भारतीय इमाम प्रमुख अहमद इलियासी से मिलने 22 सितम्बर 2022 को मस्जिद में गये, और इमाम ने उन्हें राष्ट्रपिता कहा। यहाँ हिंदुत्व धीरे-धीरे हिंदुवाद की तरफ़ खिसकता नज़र आ रहा है। कट्टर मुस्लिम परस्त यहाँ भी मौक़ा देखते हैं। उन्होंने अहमद इलियासी को धमकियाँ देना शुरू कर दिया तो इमाम साहब को वायी-प्लस सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई। यही हिंदुवादी और हिंदुत्व का भेद है। हमें कट्टर मुस्लिम और मुस्लिम में भी भेद करना सीखना होगा। भारत का हर मुस्लिम कट्टर नहीं है। हिंदुवादी गांधी जब कलकत्ता में दंगा ग्रस्त क्षेत्र में मुसलमान के घर रुके, तो सुरक्षित थे। दिल्ली के बिड़ला हाऊस में हिंदुत्व के सिपाही ने भजन संध्या को जाते गाँधी जी के सीने में पिस्तौल ख़ाली कर दिया था। विश्वास का संकट बड़ी चीज है। हिंदुत्व को गाँधी जी पर भरोसा नहीं था। भारतीय कट्टर मुसलमानों को भागवत जी पर भरोसा नहीं है। हिंदुवादी गाँधी जी को दंगाग्रस्त इलाक़े के मुसलमानों पर भरोसा था। भारतीयता का रहस्य इन्ही घटनाओं में छुपा है। हिंदू संस्कृति के बग़ैर भारतीयता समाप्त हो जाएगी। पिछले दो हज़ार सालों में जो कुछ इस ज़मीन पर घटित हुआ है, उसे समाहित करके भारत खड़ा हुआ है। यह पुस्तक भारतीयता की रक्षार्थ हिंदू प्रतिरोध की गाथा है। आज के युग में प्रतिरोध नहीं परस्पर भरोसा चाहिए। इसीलिए वर्तमान सरकार ने उपद्रवी बीन बजाने की जगह विकास की बाँसुरी पर मनभावन धुन बजाना शुरू कर दी है। पृथ्वी को अगर धर्म के आधार पर बाँटा जाए तो मस्तिष्क में मुख्यतः चार सांस्कृतिक चेतनाएँ उभरती हैं।
• हिंदू सांस्कृतिक चेतना- भारत, नेपाल
• मुस्लिम सांस्कृतिक चेतना- मध्यपूर्व एशियाई देश,
• मसीही सांस्कृतिक चेतना- यूरोप, उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अफ़्रीकन देश
• बुद्ध प्रणीत चेतना- चीन, जापान, प्रशांत महासागरीय देश।
हिंदू चेतना का आधार प्रकृति है। जब तक प्रकृति के तत्व मौजूद है तब तक हिंदू सांस्कृतिक चेतना का अस्तित्व विद्यमान रहेगा। बुद्ध चेतना तो सनातन चेतना का ही विस्तार है। बाक़ी एकेश्वरवादी धार्मिक चेतना का सृजन संस्थागत है। संस्थागत सृजन कृत्रिम होता है। पिछले एक हज़ार सालों के इतिहास में मुस्लिम और मसीही चेतना ने कई स्वाभाविक विकसित चेतनाओं को समाप्त कर दिया है जैसे- नील नदी घाटी की मिश्र सभ्यता, दजला-फ़रात घाटियों की बेबीलोन-मेसोपोटामिया सभ्यता, अमेरिका की मय सभ्यता इत्यादि। रुस और चीन की संस्कृतियों को कम्यूनिज़्म निगल गया। इस्लाम, मसीही और कम्यूनिज़्म जैसी आक्रामक विचारधाराओं का सामना सिर्फ़ हिंदू चेतना ही कर सकी। भारत पर हुए 712 के पहले मुस्लिम आक्रमण से औरंगज़ेब की कट्टर हिंदू विरोधी नीतियों का सामना हिंदू चेतना ने किया। उसके बाद मसीही चेतना से पौने दो सौ साल टक्कर लेकर 15 अगस्त 1947 को भारतीय चेतना हिंदू चेतना सहित कई अन्य अंतर्धाराओं को समेटे एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में साकार हुई। यह पुस्तक उसी हिंदू चेतना से प्रेरित अमर सेनानियों की दास्तान है।
सामान्यतः इतिहास लेखन की सामग्री राजाओं के बीच लड़ाइयों में उनके उद्भव, जय-पराजय, शासन व्यवस्था और पराभव की कहानियाँ रही हैं। इतिहास लेखन कार्य राजा-महाराजाओं के दरबारी इतिहास लेखकों या भाट चारणों द्वारा किया जाता था। जो राजाओं की सफलताओं का अतिशयोक्तिपूर्ण विवरण प्रस्तुत करते थे। राजाओं के लिखे या लिखवाए गए इतिहास में विजेताओं का इतिहास विजित राजाओं को दरकिनार कर देता था। कालांतर में विजेता के नज़रिए से घटनाओं का वर्णन ही मुख्य इतिहास मान लिए जाने की प्रवृत्ति विकसित होने लगी और विजित की महत्ता दरकिनार होते चली गई।
भारत में सल्तनत काल में अधिकांश विजेता मुसलमान थे। उनके दरबारी इतिहास लेखक भी मुसलमान थे। एक भी सल्तनत क़ालीन हिंदू लेखक का नाम खुर्दबीन लेकर देखने से भी नहीं मिलता। परंतु भारत की कुल आबादी में औसतन अस्सी प्रतिशत के आसपास हिंदू जनता थी। जब मुहम्मद बिन क़ासिम ने हिंदुस्तान के सिंध पर आक्रमण किया, उस समय तो शत-प्रतिशत आबादी हिंदू थी। यह बात कितनों को पता है कि सिंध का राजा दाहिर एक कश्मीरी ब्राह्मण था, और यह कि उसका पिता चच नामक एक व्यक्ति था, जिसके नाम पर अरबों ने चचनामा ग्रंथ लिखा था, ताकि वे बता सकें कि किस तरह इस्लाम की फ़ौजों ने काफ़िरों का सफ़ाया कर पुण्य कमाया था। यही पद्धति समूचे सल्तनत काल के इतिहास के बारे में जारी रही। भारतीयों ख़ास तौर से हिंदुओं के प्रतिरोध का इतिहास ओझल होता गया। भारत में राजनीतिक मजबूरियों के चलते इतिहास चार तरह से लिखा या लिखवाया गया है।
• विजेता नज़रिया का इतिहास
• साम्यवादी नज़रिया का इतिहास
• राष्ट्रवादी अतिरंजित इतिहास
• स्वतंत्र प्रामाणिक इतिहास
लोगों को अपने देश के सच्चे स्वतंत्र प्रामाणिक इतिहास को अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि उसे वर्तमान से जोड़कर एक स्वस्थ नज़रिया विकसित करने में सहूलियत हो सके। अन्यथा निहित स्वार्थों से अभिप्रेरित इतिहास उन्हें सही आकलन तक पहुँचने ही नहीं देता है। लोगों को यही नहीं पता चलता कि स्वतंत्र इतिहास क्या है? वे राजनीतिक प्रेरणा से प्रायोजित इतिहास की भूलभूलैया में भटक कर अनुचित अवधारणा विकसित कर लेते हैं। जिससे इतिहास के सबक़ भी गड़बड़ाने लगते हैं। कहावत है कि “जो राष्ट्र इतिहास से सबक़ नहीं लेते वे इतिहास की ग़लतियों को दुहराने को अभिशप्त होते हैं, जिस तरह 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन क़ासिम के हाथों हिंदूशाही राजा दाहिर की पराजय की पुनरावृत्ति 1192 तक मुहम्मद गोरी के हाथों तक लगातार होती रही। एक तो इस्लामिक हमलावर के पीछे ख़लीफ़ा सहित पूरा इस्लामिक साम्राज्य खड़ा होता था, वहीं हिंदूशाही के पीछे किसी राष्ट्रीय ताक़त या जनता का खड़ा होना बहुत दूर की बात थी। एक बेचारा राजा अकेला लड़ता रहता था। इसके उलट पड़ौसी राजा मुस्लिम हमलावरों से मिल जाते थे। इस तरह के कई सबक़ याद ही नहीं रखे गये। इसलिए मुस्लिम शासकों का लिखा इतिहास ही भारतीय इतिहास हो गया। हम कोशिश कर रहे हैं वह तत्व सामने लाया जाए जिसके चलते 712 ईस्वी से 1947 तक भारत की बहुसंख्यक हिंदू जनता में हिंदू चेतना से ओतप्रोत राष्ट्रीय भावना का विकास किस प्रकार हुआ है। इसमें समकालीन स्वतंत्र स्रोतों के आधार पर लिखे गए इतिहास से सामग्री प्राप्त की गई है। यह राज्य/राज्यों से राष्ट्र बनने की कहानी कहने का प्रयास है कि भारतीयता का विकास किस तरह किन तत्वों से हुआ है।
भारतीयता के मुख्य तत्व हिंदू सभ्यता से जन्मे हैं। दुनिया में भारतीयता की पहचान क्या है? अधिकांश लोगों ने शायद सोचा ही नहीं कि यदि हिंदू सभ्यता समाप्त हो गई होती तो भारत से सहिष्णुता और स्वतंत्र विचार विमर्श पद्धति भी ख़त्म हो गयी होती, जो भारतीय सभ्यता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूल्य रहा है। इन्ही तत्वों से भारत में लोकतंत्र सफल है। भारतीय सभ्यता वैदिक युग, उपनिषद काल, महाकाव्य और पौराणिक शास्त्रों में निहित सिद्धांतों से अस्तित्व में आई है। वे सिद्धांत हैं-
• सहिष्णुता (Tolerance),
• अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Liberty of Expression),
• बहुसंख्यक वाद (Pluralism) और
• स्वतंत्र विधि सम्मत न्याय व्यवस्था (Independent Judiciary)
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये चारों सिद्धांत आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के आधारभूत स्तम्भ हैं। भारतीय मेधा ने सदियों पूर्व जान लिया था कि मानव समाज द्वारा इन चारों सिद्धांतों पर चलने से “विश्व-बंधुत्व” का एक और परम सिद्धांत लक्षित होगा। यही “विश्व-बंधुत्व” भावना पृथ्वी पर एकमात्र आशा है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय तात्त्विक चिंतन लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल है। इसीलिए भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था सफल हो रही है। कभी पाकिस्तान और बंगला देश भी भारतीय दार्शनिक परम्परा के हिस्से थे। उन्होंने भारतीय चिंतन को अलविदा कहा तो वहाँ लोकतंत्र लड़खड़ाता दिखता है। भारतीय चिंतन में हिंदू सनातन बहुसंख्यक आबादी दर्शन है। जो भारतीय परम्परा निर्धारित करता है। जिसे बदलने की कोशिश एक हज़ार साल तक होती रही। वही संघर्ष भारतीय राष्ट्रीयता को बचाने का प्रयास रहा है। भारतीय प्रभुसत्ता और अस्मिता को बचाने की कोशिश रही है। वह विस्मृत इतिहास इस पुस्तक की विषय वस्तु है।
इस पुस्तक में हिंदूशाही राजा दाहिर के बलिदान की दास्तान है, न कि मुहम्मद बिन क़ासिम की अतिरंजित खूनी होली, राजा जयपाल की बहादुरी का क़िस्सा है न कि मुहम्मद गजनवी की लूट और मूर्तियों की तोड़ने के कारनामे और पृथ्वीराज चौहान की वीरता के क़िस्से हैं न कि मुहम्मद गोरी की कुटिल नीति के हिस्से। यह भारतीयता का इतिहास है। केवल राजनीतिक जीत-हार का विवरण नहीं है। पुस्तक क़िस्सा गोई अन्दाज़ में क्रमवार लिखी गई है, जिससे रोचकता बनी रहे और इतिहास का बोझिलपन पाठक को उबाऊ न लगे। यह किताब सनातन दर्शन से उपजे कालजयी जीवन मूल्यों की इतिहास गाथा है।
म############
3-
#वंदेभारत
इतिहास के पन्नों में कहाँ हैं ये नाम??
सेठ रामदास जी गुड़वाले - 1857 के महान क्रांतिकारी, दानवीर जिन्हें फांसी पर चढ़ाने से पहले अंग्रेजों ने उनपर शिकारी कुत्ते छोड़े जिन्होंने जीवित ही उनके शरीर को नोच खाया।
सेठ रामदास जी गुडवाला दिल्ली के अरबपति सेठ और बेंकर थे. इनका जन्म दिल्ली में एक अग्रवाल परिवार में हुआ था. इनके परिवार ने दिल्ली में पहली कपड़े की मिल की स्थापना की थी।
उनकी अमीरी की एक कहावत थी “रामदास जी गुड़वाले के पास इतना सोना चांदी जवाहरात है की उनकी दीवारो से वो गंगा जी का पानी भी रोक सकते है”
जब 1857 में मेरठ से आरम्भ होकर क्रांति की चिंगारी जब दिल्ली पहुँची तो
दिल्ली से अंग्रेजों की हार के बाद अनेक रियासतों की भारतीय सेनाओं ने दिल्ली में डेरा डाल दिया। उनके भोजन और वेतन की समस्या पैदा हो गई । रामजीदास गुड़वाले बादशाह के गहरे मित्र थे ।
रामदास जी को बादशाह की यह अवस्था देखी नहीं गई। उन्होंने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति बादशाह के हवाले कर दी और कह दिया
"मातृभूमि की रक्षा होगी तो धन फिर कमा लिया जायेगा "
रामजीदास ने केवल धन ही नहीं दिया, सैनिकों को सत्तू, आटा, अनाज बैलों, ऊँटों व घोड़ों के लिए चारे की व्यवस्था तक की।
सेठ जी जिन्होंने अभी तक केवल व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया उनकी संघठन की शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी हैरान हो गए ।
सारे उत्तर भारत में उन्होंने जासूसों का जाल बिछा दिया, अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया।
उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया। देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की इस संकट काल में सभी सँगठित हो और देश को स्वतंत्र करवाएं।
रामदास जी की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत परेशान होने लगे
कुछ कारणों से दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः कब्जा होने लगा । एक दिन उन्होंने चाँदनी चौक की दुकानों के आगे जगह-जगह जहर मिश्रित शराब की बोतलों की पेटियाँ रखवा दीं, अंग्रेज सेना उनसे प्यास बुझाती और वही लेट जाती । अंग्रेजों को समझ आ गया की भारत पे शासन करना है तो रामदास जी का अंत बहुत ज़रूरी है
सेठ रामदास जी गुड़वाले को धोखे से पकड़ा गया और जिस तरह से मारा गया वो क्रूरता की मिसाल है।
पहले उन्हें रस्सियों से खम्बे में बाँधा गया फिर उन पर शिकारी कुत्ते छुड़वाए गए उसके बाद उन्हें उसी अधमरी अवस्था में दिल्ली के चांदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।
सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट' में लिखा है -
"सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे।अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी।
सेठ रामदास जैसे अनेकों क्रांतिकारी इतिहास के पन्नों से गुम हो गए क्या सेठ रामदास जैसे क्रांतिकारियों के बलिदान का ऋण हम चुका पाये???
तुम न समझो देश को आज़ादी यूं ही मिली है।
हर कली इस बाग की,कुछ खून पी कर ही खिली है।
मिट गये वतन के वास्ते,दीवारों में जो गड़े हैं।
महल अपनी आज़ादी के,शहीदों की छातियों पर ही खड़े हैं।।
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*4*
प्राचीन मिस्र के महान पिरामिड के बारे में जानते हैं हम सभी। हममें से ज्यादातर लोग प्राचीन भारत के महान पिरामिड के बारे में नही जानते हैं।।
बरेली, जिसे पहले अहिछत्र के रूप में जाना जाता था, का उल्लेख महाभारत में द्रौपद के राज्य पांचाल की राजधानी के रूप में किया गया था। बाद में इसे अर्जुन ने जीत लिया और द्रोण को दे दिया। द्रुपद को अपनी राजधानी को दक्षिणी पांचला में कंपिलिया में स्थानांतरित करना पड़ा। अहिच्छत्र एक महान शहर के रूप में वर्णित किया गया था
बरेली में उत्खनन से एक विशाल पिरामिड के रूप में एक विशाल प्राचीन मंदिर का पता चला है। इसके अलावा खंडहर 22 मीटर ऊंचाई (तुलना के लिए, काबा 13 मीटर है) और शीर्ष पर एक लिंग है। साइट 187 हेक्टेयर है। तुलना करके, रोमन युग का लंदन सिर्फ 140 हेक्टेयर था
यदि १२ वीं शताब्दी में जिहादी आक्रमणकारियों द्वारा इसके विनाश के बाद भी ईंट मंदिर खंडहर इतना विशाल है, तो कोई केवल कल्पना कर सकता है कि मंदिर अपने विशाल काल में कैसा रहा होगा। अहिछत्र भारत का संभवतः सबसे लंबा जीवित स्थल है। 2000 ईसा पूर्व में प्राचीनतम परतों के अवशेषों में गेरू रंग के बर्तनों के बाद चित्रित ग्रे वेयर (पीजीडब्ल्यू) शामिल हैं। 12 वीं शताब्दी में "आइकोनोक्लास्टिक प्रवृत्ति" तक साइट 3000 साल तक जीवित रही। साइट पर कई हिंदू मूर्तियां मिली हैं जो अब दुनिया भर के संग्रहालय में हैं। मकर पर खड़ी गंगा की एक मूर्ति है। एक और भगवान शिव का है जो कि किरतारुनजिया के दृश्य का चित्रण करता है
जब मैंने इसे ट्विटर पर पोस्ट किया, तो मैंने अपने आश्चर्य को पाया कि बरेली के निवासियों को भी इस साइट के बारे में जानकारी नहीं है। मुझे वास्तव में आश्चर्य है कि इन स्मारकों के बारे में कभी बात नहीं की जाती है और लोगों को उनके बारे में अज्ञानता में रखा जाता है
सूचना स्रोत: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, अहिछत्र, जिला बरेली, उत्तर प्रदेश में उत्खनन (2007-2008)
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*5*
डालडा वाले डालमिया सेठ......
डालडा हिन्दुस्तान लिवर का देश का पहला वनस्पति घी था, जिसके मालिक थे स्वतन्त्र भारत के उस समय के सबसे धनी सेठ रामकृष्ण डालमिया।
टाटा, बिड़ला और डालमिया ये तीन नाम बचपन से सुनते आए है। मगर डालमिया घराना अब न कही व्यापार में नजर आया और न ही कहीं इसका नाम सुनाई देता है। वास्तव में डालमिया जी ने स्वामी करपात्री जी महाराज के साथ मिलकर गौहत्या एवं हिंदू कोड बिल पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर नेहरू से कड़ी टक्कर ले ली थी।
जहां तक रामकृष्ण डालमिया का संबंध है, वे राजस्थान के एक कस्बा चिड़ावा में एक गरीब अग्रवाल घर में पैदा हुए थे और मामूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने मामा के पास कोलकाता चले गए थे।
वहां पर बुलियन मार्केट में एक Salesman के रूप में उन्होंने अपने व्यापारिक जीवन का शुरुआत किया था। भाग्य ने डटकर डालमिया का साथ दिया और कुछ ही वर्षों के बाद वे देश के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए।
उनका औद्योगिक साम्राज्य देशभर में फैला हुआ था जिसमें समाचारपत्र, बैंक, बीमा कम्पनियां, विमान सेवाएं, सीमेंट, वस्त्र उद्योग, खाद्य पदार्थ आदि सैकड़ों उद्योग शामिल थे।
डालमिया सेठ के दोस्ताना रिश्ते देश के सभी बड़े-बड़े नेताओं से थी और वे उनकी खुले हाथ से आर्थिक सहायता किया करते थे। इसके बाद एक घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया।
कहा जाता है कि डालमिया एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे और उनके विख्यात हिन्दू संत स्वामी करपात्री जी महाराज से घनिष्ट संबंध थे। करपात्री जी महाराज ने 1948 में एक राजनीतिक पार्टी 'राम राज्य परिषद' स्थापित की थी। 1952 के चुनाव में यह पार्टी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और उसने 18 सीटों पर विजय प्राप्त की।
हिन्दू कोड बिल और गोवध पर प्रतिबंध लगाने के प्रश्न पर डालमिया से नेहरू की ठन गई। नेहरू हिन्दू कोड बिल पारित करवाना चाहता था, जबकि स्वामी करपात्री जी महाराज और डालमिया सेठ इसके खिलाफ थे।
हिन्दू कोड बिल और गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वामी करपात्रीजी महाराज ने देशव्यापी आंदोलन चलाया, जिसे डालमिया जी ने डटकर आर्थिक सहायता दी। नेहरू के दबाव पर लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पारित हुआ, जिसमें हिन्दू महिलाओं के लिए तलाक की व्यवस्था की गई थी।
कहा जाता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू कोड बिल के सख्त खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने इसे स्वीकृति देने से इनकार कर दिया। ज़िद्दी नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा और इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पुनः पारित करवाकर राष्ट्रपति के पास भिजवाया।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति को इसकी स्वीकृति देनी पड़ी। इस घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया। नेहरू के इशारे पर डालमिया के खिलाफ कंपनियों में घोटाले के आरोपों को लोकसभा में जोरदार ढंग से उछाला गया। इन आरोपों के जांच के लिए एक विविन आयोग बना। बाद में यह मामला स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिसमेंट (जिसे आज सी बी आई कहा जाता है) को जांच के लिए सौंप दिया गया। नेहरू ने अपनी पूरी सरकार को डालमिया के खिलाफ लगा दिया। उन्हें हर सरकारी विभाग में प्रधानमंत्री के इशारे पर परेशान और प्रताड़ित करना शुरू किया। उन्हें अनेक बेबुनियाद मामलों में फंसाया गया।
नेहरू की कोप दृष्टि ने एक लाख करोड़ के मालिक डालमिया को दिवालिया बनाकर रख दिया। उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिन्दुस्तान लिवर और अनेक उद्योगों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ा। अदालत में मुकदमा चला और डालमिया को तीन वर्ष कैद की सज़ा सुनाई गई। तबाह हाल और अपने समय के सबसे धनवान व्यक्ति डालमिया को नेहरू की वक्र दृष्टि के कारण जेल की कालकोठरी में दिन व्यतीत करने पड़े।
व्यक्तिगत जीवन में डालमिया बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने अच्छे दिनों में करोड़ों रुपये धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए दान में दिये।
इसके अतिरिक्त उन्होंने यह संकल्प भी लिया था कि जबतक इस देश में गोवध पर कानूनन प्रतिबंध नहीं, लगेगा वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। उन्होंने इस संकल्प को अंतिम सांस तक निभाया। गौवंश हत्या विरोध में 1978 में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
नेहरू के जमाने मे भी 1 लाख करोड़ के मालिक डालमिया को साजिशों में फंसा के नेहरू ने कैसे बर्बाद कर दिया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस व्यक्ति ने नेहरू के सामने सिर उठाया उसी को नेहरू ने मिट्टी में मिला दिया। देशवासी प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बाबू के साथ भी यही हुआ था।
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*6*
#इतिहास में पढ़ाया जाता है कि #ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू और लगभग 1653 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ।
अब #सोचिए कि जब मुमताज का इंतकाल 1631 में हुआ तो फिर कैसे उन्हें 1631 में ही ताजमहल में दफना दिया गया, जबकि ताजमहल तो 1632 में बनना शुरू हुआ था। यह सब मनगढ़ंत बातें हैं जो अंग्रेज और मुस्लिम इतिहासकारों ने 18वीं सदी में लिखी।
दरअसल 1632 में हिन्दू मंदिर को इस्लामिक लुक देने का कार्य शुरू हुआ। 1649 में इसका मुख्य द्वार बना जिस पर कुरान की आयतें तराशी गईं। इस मुख्य द्वार के ऊपर हिन्दू शैली का छोटे गुम्बद के आकार का मंडप है और अत्यंत भव्य प्रतीत होता है। आस पास मीनारें खड़ी की गई और फिर सामने स्थित फव्वारे
को फिर से बनाया गया।
मुमताज की मृत्यु के 7 वर्ष पश्चात Voyages and Travels into the East Indies नाम से निजी पर्यटन के संस्मरणों में आगरे का तो उल्लेख किया गया है किंतु ताजमहल के निर्माण का कोई उल्लेख नहीं किया।
टाॅम्हरनिए के कथन के अनुसार 20 हजार मजदूर यदि 22 वर्ष तक ताजमहल का निर्माण करते रहते तो माॅण्डेलस्लो भी उस विशाल निर्माण कार्य का उल्लेख अवश्य करता।
ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े की एक अमेरिकन प्रयोगशाला में की गई कार्बन जांच से पता चला है कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहजहां के काल से 300 वर्ष पहले का है, क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वीं सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिए दूसरे दरवाजे भी लगाए गए हैं।
ताज और भी पुराना हो सकता है। असल में ताज को सन् 1115 में अर्थात शाहजहां के समय से लगभग 500 वर्ष पूर्व बनवाया गया था।
ताजमहल के गुम्बद पर जो अष्टधातु का कलश खड़ा है वह त्रिशूल आकार का पूर्ण कुंभ है। उसके मध्य दंड के शिखर पर नारियल की आकृति बनी है। नारियल के तले दो झुके हुए आम के पत्ते और उसके नीचे कलश दर्शाया गया है। उस चंद्राकार के दो नोक और उनके बीचोबीच नारियल का शिखर मिलाकर त्रिशूल का आकार बना है।
हिन्दू और बौद्ध मंदिरों पर ऐसे ही कलश बने होते हैं। कब्र के ऊपर गुंबद के मध्य से अष्टधातु की एक जंजीर लटक रही है। शिवलिंग पर जल सिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी जंजीर पर टंगा रहता था। उसे निकालकर जब शाहजहां के खजाने में जमा करा दिया गया तो वह जंजीर लटकी रह गई। उस पर लाॅर्ड कर्जन ने एक दीप लटकवा दिया, जो आज भी है।
कब्रगाह को महल क्यों कहा गया? मकबरे को महल क्यों कहा गया? क्या किसी ने इस पर कभी सोचा, क्योंकि पहले से ही निर्मित एक महल को कब्रगाह में बदल दिया गया। कब्रगाह में बदलते वक्त उसका नाम नहीं बदला गया। यहीं पर शाहजहां से गलती हो गई। उस काल के किसी भी सरकारी या शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ‘ताजमहल’ शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल समझना हास्यास्पद है।
‘महल’ शब्द मुस्लिम शब्द नहीं है। अरब, ईरान, अफगानिस्तान आदि जगह पर एक भी ऐसी मस्जिद या कब्र नहीं है जिसके बाद महल लगाया गया हो।
यह भी गलत है कि मुमताज के कारण इसका नाम मुमताज महल पड़ा, क्योंकि उनकी बेगम का नाम था #मुमता -उल-जमानी। यदि मुमताज के नाम पर इसका नाम रखा होता तो ताजमहल के आगे से मुम को हटा देने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।
विंसेंट स्मिथ अपनी पुस्तक 'Akbar the Great Moghul' में लिखते हैं, बाबर ने सन् 1530 में आगरा के वाटिका वाले महल में अपने उपद्रवी जीवन से मुक्ति पाई। वाटिका वाला वो महल यही ताजमहल था। यह इतना विशाल और भव्य था कि इसके जितना दूसरा कोई भारत में महल नहीं था। बाबर की पुत्री गुलबदन ‘हुमायूंनामा’ नामक अपने ऐतिहासिक वृत्तांत में ताज का संदर्भ ‘रहस्य महल’ (Mystic House) के नाम से देती है।
ताजमहल का निर्माण राजा परमर्दिदेव के शासनकाल में 1155 अश्विन शुक्ल पंचमी, रविवार को हुआ था। अतः बाद में मुहम्मद गौरी सहित कई मुस्लिम आक्रांताओं ने ताजमहल के द्वार आदि को तोड़कर उसको लूटा। यह महल आज के ताजमहल से कई गुना ज्यादा बड़ा था और इसके तीन गुम्बद हुआ करते थे। हिन्दुओं ने उसे फिर से मरम्मत करके बनवाया, लेकिन वे ज्यादा समय तक इस महल की रक्षा नहीं कर सके।
👉 वास्तुकला के विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में ‘तेज-लिंग’ का वर्णन आता है। ताजमहल में ‘तेज-लिंग’ प्रतिष्ठित था इसीलिए उसका नाम ‘तेजोमहालय’ पड़ा था।
शाहजहां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेख ‘ताज-ए-महल’ के नाम से किया है, जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम ‘तेजोमहालय’ से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहजहां और औरंगजेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुए उसके स्थान पर पवित्र मकबरा शब्द का ही प्रयोग किया है।
ओक के अनुसार अनुसार हुमायूं, अकबर, मुमताज, एतमातुद्दौला और सफदरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिन्दू महलों या मंदिरों में दफनाया गया है।
ताजमहल तेजोमहल शिव मंदिर है - इस बात को स्वीकारना ही होगा कि ताजमहल के पहले से बने ताज के भीतर मुमताज की लाश दफनाई गई न कि लाश दफनाने के बाद उसके ऊपर ताज का निर्माण किया गया। ‘ताजमहल’ शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द ‘तेजोमहालय’ शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वरमहादेव प्रतिष्ठित थे। देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी व कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित चित्रकारी की गई है।
इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज के मकबरे वाला कमरा ही शिव मंदिर का गर्भगृह है। संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिन्दू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।
तेजोमहालय उर्फ ताजमहल को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। यह मंदिर विशालकाय महल क्षेत्र में था। आगरा को प्राचीनकाल में अंगिरा कहते थे, क्योंकि यह ऋषि अंगिरा की तपोभूमि थी। अंगिरा ऋषि भगवान शिव के उपासक थे।
बहुत प्राचीन काल से ही आगरा में 5 शिव मंदिर बने थे। यहां के निवासी सदियों से इन 5 शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करते थे।
लेकिन अब कुछ सदियों से बालकेश्वर, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राजराजेश्वर नामक केवल 4 ही शिव मंदिर शेष हैं। 5वें शिव मंदिर को सदियों पूर्व कब्र में बदल दिया गया। स्पष्टतः वह 5वां शिव मंदिर आगरा के इष्टदेव नागराज अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर ही हैं, जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।
#सनातनभारत
6
मोतीलाल नेहरू की 5 पत्नियाँ थीं।
(1) स्वरूप रानी
(2) थुसु रहमान बाई
(3) मंजुरी देवी
(4) एक ईरानी महिला
(5) एक कश्मीरी महिला
नंबर 1- स्वरूप रानी और नंबर 3- मंजुरि देवी को लेकर कोई समस्या नहीं है।
दूसरी पत्नी थुसू रहमान बाई के पहले पति मुबारक अली थे। मोतीलाल नेहरू, मुबारक अली के पास नौकरी करता था। मुबारक की आकस्मिक मृत्यु के कारण मोतीलाल थुसु रहमान बाई से निकाह कर लिये और परोक्ष रूप से पूरी संपत्ति के मालिक बन गये।
थुसु रहमान बाई को मुबारक अली से 2 बच्चे पहले से ही मौजूद थे-
(1) शाहिद हुसैन
(2) जवाहरलाल,
मोतीलाल द्वारा इन दोनों बच्चों शाहिद हुसैन और जवाहरलाल को थुसु रहमान बाई से निकाह करने की वजह से अपना बेटा कह दिया गया।
प्रासंगिक उल्लेख:-
जवाहरलाल की माँ थुसू रहमान बाई थी, लेकिन उनके पिता मुबारक अली ही थे।
तदनुसार थुसू रहमान बाई से निकाह करने की वजह से मोतीलाल, जवाहरलाल नेहरू के पालक पिता थे।
मोतीलाल की चौथी पत्नी एक ईरानी महिला थी, जिसे मुहम्मद अली जिन्ना नामक एक बेटा था।
मोतीलाल की 5 नंबर वाली पत्नी एक कश्मीरी महिला थी, यह मोतीलाल नेहरु की नौकरानी थी।
इसको शेख अब्दुल्लाह नामक एक बेटा था, जो बाद में कश्मीर का मुख्यमंत्री बना था।
अर्थात् वस्तुतः *नेहरू, जिन्ना और अब्दुल्ला तीनों भाई मुसलमान थे।*
पर, जब भारत का बँटवारा होने लगा तो तीनों भाई आपस में झगड़ पड़े, तब..
(1) जवाहर को भारत,
(2) जिन्ना को पाकिस्तान
(3) शेख अब्दुल्ला को कश्मीर दिया गया (नौकरानी के बेटे के रूप में)
भारत से संबंधित होने से रोकने के लिए सुरक्षात्मक दृष्टिकोणवश कश्मीर को अनुच्छेद 370 प्रदान किया गया, ताकि कश्मीर भारत का होकर भी भारत का न हो।
उसके बाद जवाहरलाल की बेटी इंदिरा ने फिरोज खान से शादी की उनके *राजीव खान और संजय खान* हुए संजय को एक मुस्लिम से उत्पन्न बेटा माना जाता है।राजीव और संजय सगा नहीं बल्कि सौतेला भाई है।
जो संजय गांधी की मृत्यु पर फूट-फूटकर रोया था। *राजीव खान ने विदेशी इटली की क्रिस्चियन की औरत सोनिया माइनों से शादी की।*
*राजीव की बेटी प्रियंका ने ईसाई क्रिश्चियन राबर्ट बढेरा से शादी की पूरा परिवार ही बढ़ शंकर (वर्णसंकर) है फिर हिंदू कैसे हो सकते है? सब पूर्णरूपेण कसाई ईसाई वर्णसंकर प्रजाति है। और हम सबको भारतीयों को हिंदू पंडित कहकर बताया गया है जोकि पूर्णरूपेण असत्य है।*
इसीलिए इन लोगों ने *राम को काल्पनिक कहा*
और *सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट* भी दिया
*राम मंदिर का हमेशा विरोध* भी किया,
*वक्फ बोर्ड मुस्लिम पर्सनल लॉ* आदि *अनेकों मुस्लिम पक्ष के कार्य किए* और *हिंदू सनातन धर्म को दबाने की हमेशा इस कांग्रेसमें कोशिश की।*
अब समय आ गया है सब सनातनी भाई बहनों हिंदुओं को सचेत हो जाना है और अपने अस्तित्व की लड़ाई सबको तन मन धन से लड़नी है जो लड़ रहा है उसको समर्थन करना है।
अब प्रश्न है, भारत 70 वर्षों तक 3 भागों में विभाजित था, हम हिंदुस्तानियों को अलग-अलग तरीकों से टोपी क्यों पहनाई जाती रही, अथार्त् बेवकूफ क्यों बनाया जाता रहा।
आखिर, किस कारण।
सूत्र:- इम्मैथाइज़र की जीवनी।
इतिहास गवाह है हमेशा किले के दरवाज़े अंदर से ही खोले गए है।😎
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पंडित जवाहरलाल नेहरू के पिता का नाम श्री मोतीलाल नेहरू (1861-1931) था, जो पेशे से एक एक स्व-निर्मित धनी बैरिस्टर थे, जो एक कश्मीरी पंडित समुदाय से थे। इनका माता का नाम स्वरूपरानी थुस्सू (1868-1938) था, जो लाहौर में बसे एक प्रसिद्ध कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थीं।
जवाहरलाल नेहरू की दो बहने थी। उनकी बड़ी बहन विजया लक्ष्मी (जो संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं)। उनकी सबसे छोटी बहन कृष्णा हुथीसिंग जो पेशे से एक प्रसिद्ध लेखिका बन गईं। यह नेहरू जी की जीवनी में लिखा हुआ है अब सच क्या है यह तो नहीं पता
यह आलेख तो मोतीलाल नेहरू और उनके पूर्वजों से जुड़ा हुआ है।
*देश हित में इस लिंक के माध्यम से जवाहर लाल नेहरू का सच जान लो ------*🔥
*सनातनी हिन्दुओं को मुगलों और अंग्रेजों के बाद इन फर्जी नेहरू खानदान और फर्जी कश्मीरी खानदान के लोगों ने गजवाहिन्द करने के लिए भारत से भी सभी हिन्दुओं को मारकर खत्म करने हेतु झूठे इतिहास के बल पर बांट रहे हैं जागो सनातनी हिन्दुओं जागो -----------
🔥 *नोट- इस सन्देश को देश हित में जरूर शेयर करें !* 🔥
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7-
8.
*कुतुबुद्दीन घोड़े से गिर कर मरा,*
यह तो सब जानते हैं,
*लेकिन कैसे?*
यह आज हम आपको बताएंगे..
वो वीर महाराणा प्रताप जी का 'चेतक' सबको याद है,
लेकिन 'शुभ्रक' नहीं!
तो मित्रो आज सुनिए
*कहानी 'शुभ्रक' की......*
सूअर कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया,
और
*उदयपुर के 'राजकुंवर कर्णसिंह' को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।*
*कुंवर का 'शुभ्रक' नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,*
जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।
एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई..
और सजा देने के लिए 'जन्नत बाग' में लाया गया।
यह तय हुआ कि
*राजकुंवर का सिर काटकर उससे 'पोलो' (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा..*
.
कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े 'शुभ्रक' पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ 'जन्नत बाग' में आया।
'शुभ्रक' ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा,
उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे।
जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया,
तो 'शुभ्रक' से रहा नहीं गया..
उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया
और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए,
*जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए!*
इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए..
.
मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और 'शुभ्रक' पर सवार हो गए।
'शुभ्रक' ने हवा से बाजी लगा दी..
*लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!*
राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया,
*तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।*
*सिर पर हाथ रखते ही 'शुभ्रक' का निष्प्राण शरीर लुढक गया..*
*भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता*
क्योंकि वामपंथी और मुल्लापरस्त लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं!
जबकि
*फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।*
*नमन स्वामीभक्त 'शुभ्रक' को 🐎🙏
पढ़कर सीना चौड़ा हुआ 🥰
9..
*कुतुबुद्दीन घोड़े से गिर कर मरा,*
यह तो सब जानते हैं,
*लेकिन कैसे?*
यह आज हम आपको बताएंगे..
वो वीर महाराणा प्रताप जी का 'चेतक' सबको याद है,
लेकिन 'शुभ्रक' नहीं!
तो मित्रो आज सुनिए
*कहानी 'शुभ्रक' की......*
सूअर कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया,
और
*उदयपुर के 'राजकुंवर कर्णसिंह' को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।*
*कुंवर का 'शुभ्रक' नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,*
जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।
एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई..
और सजा देने के लिए 'जन्नत बाग' में लाया गया।
यह तय हुआ कि
*राजकुंवर का सिर काटकर उससे 'पोलो' (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा..*
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कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े 'शुभ्रक' पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ 'जन्नत बाग' में आया।
'शुभ्रक' ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा,
उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे।
जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया,
तो 'शुभ्रक' से रहा नहीं गया..
उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया
और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए,
*जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए!*
इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए..
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मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और 'शुभ्रक' पर सवार हो गए।
'शुभ्रक' ने हवा से बाजी लगा दी..
*लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!*
राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया,
*तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।*
*सिर पर हाथ रखते ही 'शुभ्रक' का निष्प्राण शरीर लुढक गया..*
*भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता*
क्योंकि वामपंथी और मुल्लापरस्त लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं!
जबकि
*फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।*
*नमन स्वामीभक्त 'शुभ्रक' को 🐎🙏
पढ़कर सीना चौड़ा हुआ 🥰
10-
आपको याद होगा की इंदिरा गाँधी, करपात्री जी महाराज के पास आशीर्वाद लेने गई तब करपात्री जी ने कहा आशीर्वाद तो दूँगा लेकिन सरकार बनते ही पहले गौ हत्या के विरुद्ध कानून बना कर गौ हत्या बंद करनी होगी।
इंदिरा ने हामी भरी, दो महीने बाद करपात्री जी इंदिरा से मिले, उनका वादा याद दिला कर गौ हत्या के विरुद्द कानून बनाने के लिए कहा तो इंदिरा जी ने कहा कि महाराज जी अभी तो मैं नई हूँ, कुछ समय दीजिए। कुछ समय बाद करपात्री जी फिर गए और कानून की मांग की लेकिन इंदिरा ने फिर टाल दिया।
कई बार मिलने वादा याद दिलाने के बाद भी जब इंदिरा ने गौ हत्या बंद नहीं की, कानून नहीं बनाया तो 7 नवम्बर 1966, उस दिन कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, देश का संत समाज, शंकराचार्य, अपने छत्र आदि छोड़ पैदल ही, आम जनता के साथ, गायों को आगे कर संसद कूच किया।करपात्री जी के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय के सातों पीठों के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, मध्व संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज, निहंग व हजारों की संख्या में नागा साधुओं को पंडित लक्ष्मीनारायण जी चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे।
लालकिला मैदान से आरंभ होकर चावड़ी बाजार होते हुए पटेल चौक से संसद भवन पहुंचने विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया। रास्ते में घरों से लोग फूल वर्षा रहे थे।
हिंदू समाज के लिए ऐतिहासिक दिन था, सभी शंकराचार्य और पीठाधिपति पैदल चलते हुए संसद भवन के पास मंच पर समान कतार में बैठे।
उसके बाद से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चौक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी, जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गौ हत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे। उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी और गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री थे।
इस सिंहनाद को देख कर इंदिरा ने सत्ता के मद में चूर होकर संतों, साधुओं, गायों और जनता पर अंधाधुंध गोलियों की बारिश करवा दी, हजारों गाय, साधु, संत और आमजन मारे गए। गौ रक्षा महाभियान समिति के तत्कालीन मंत्रियों में से एक और पूरी घटना के गवाह, प्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक आचार्य सोहनलाल रामरंग के अनुसार इस गोलीबारी में कम से कम 10 हजार से अधिक मार दिये गये।
इंदिरा ने ढकने के लिए ट्रक बुलाकर मृत, घायल, जिंदा सभी को उसमें ठूंसा जाने लगा। जिन घायलों के बचने की संभावना थी, उनकी भी ट्रक में लाशों के नीचे दबकर मौत हो गई। आखिरी समय तक पता ही नहीं चला कि सरकार ने उन लाशों को कहां ले जाकर फूंक डाला या जमीन में दबा डाला। पूरे शहर में कर्फ्यू लागू कर दिया।
*तब करपात्री जी महाराज ने मरी हुई गायों के गले से लिपट कर रोते हुए कहा था कि "हम तो साधु हैं, किसी का बुरा नहीं करते लेकिन तूने माता समान निरपराध गायों को मारा है,* *जा इसका फल तुझे भुगतना पड़ेगा, मैं श्राप देता हूँ कि एक दिन तेरी देह भी इसी प्रकार गोलियों से छलनी होगी और तेरे कुल और दल का विनाश करने के लिए मैं हिमालय से एक ऐसा तपस्वी भेजूँगा जो तेरे दल और कुल का नाश करेगा"।*
जिस प्रकार करपात्री जी महाराज का आशीर्वाद सदा सफल ही होता था उसी प्रकार उनका श्राप भी फलीभूत होता था।
इस घटना की चर्चा गावँ गावँ में बच्चे बच्चे की जुबान पर थी और सभी *इंदिरा को गालियां, बददुआएं दे रहे थे कि "हत्यारी ने गायों को मरवा दिया इसका भला नहीं होगा* , *भगवान करे ये भी इसी प्रकार मरे। भगवान इसका दंड जरूर देंगे"।*
अब इसे संयोग कहेंगे या *करपात्री जी महाराज का श्राप कि इंदिरा का शरीर ठीक गोपाष्टमी के दिन उसी प्रकार गोलियों से छलनी हुआ जैसे करपात्री जी महाराज ने श्राप दिया था*
और *अब नरेंद्र दामोदरदास मोदी* के रूप में वह तपस्वी भी मौजूद है जो *कांग्रेस का विनाश कर रहा है* , जिसका खुला आव्हान है
"कांग्रेस मुक्त भारत"
*सोचिये क्या ये संयोग है* ❓
1- संजय गांधी मरे आकाश में तिथि थी गोपाष्टमी ,
2- इन्दिरा गाँधी मरी आवास में तिथि थी गोपाष्टमी,
3- राजीव गाँधी मरे मद्रास में तिथि थी गोपाष्टमी
*साधु संतों का श्राप व गौमाता की करुण पीड़ा ने इंदिरा को मारा* ।
#गौवंश
#गौसेवा
#गौ_माता_राष्ट्र_माता
🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽
11-
मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि वही दे सकता है जिसमें अभी भी बौना डीएनए सक्रिय हैं।
भारत से एक प्यादा उठाया जाता है। विदेश में पढ़ाया जाता है। फिर देश में बहुत उच्च पदों पर प्रतिष्ठित कर उससे मनमाफिक कर्म करवाये जाते हैं।
उक्त व्यक्ति वही था।
1981 में देश को अतिशय बर्बाद करने वाली नीतियां बनाकर यह कृत्रिम स्थिति लाई गई कि 1992 में लुटे पिटे, भिखमंगे देश को थाली में परोसकर विदेशी कम्पनियों को परोसा गया।
यह कोई आर्थिक उपलब्धि नहीं थी, भूखे भेड़ियों के सामने देश को नोंचने हेतु फेंक दिया गया था। यह भारत की अलौकिकता ही है कि वह आपदा को भी अवसर में बदल देता है। जिन बौनों की छाती में उस पुतलेनुमा आकृति के लिए दूध उतर रहा है वे जान लें।
जिसकी बेटी कभी नालंदा नहीं गई पर नालंदा यूनिवर्सिटी की कुलपति थी। जिसने जीवन भर भारत के सबसे भ्रष्ट परिवार की #रीढ़विहीन_जीहजूरी की, जिसके पॉवरफुल रहते हुए उसी की कम्युनिटी के गले मे टायर डालकर जलाया गया पर वह बोल न सका।
जिसके प्रधानमंत्री रहते भारत में घोटालों की बाढ़ आ गई। "सोए गोरी का यार बलम तरसे" वाली स्थिति थी। कनिमोझी से कलमाड़ी तक मालामाल हो रहे थे। कांग्रेसी प्रवक्ता वकीलिनियों को जज बना रहे थे, आप रेनकोट पहनकर नहा रहे थे।
जिसके वित्तमंत्री रहते, बजट में से राजीव गांधी फाउंडेशन नामक एनजीओ को 1991 में 100 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया था, बाद में जिस pm के ऊपर सुपर pm और छाया मंत्रिमंडल बिठाया गया, जिसमें डीप स्टेट के प्यादे और बड़ी बिंदी गैंग की भरमार थी।
जिसने रुपये का सर्वाधिक अवमूल्यन किया।
जिसके बनाये ncert के टॉक्सिक पाठ्यक्रम को आज तक जहरमुक्त नहीं किया जा सका।
जिसने सच्चर कमेटी मात्र इसलिए बनाई कि एक और विभाजन की भूमिका बन सके, जिसने यह कानून बनाया कि दंगा कोई करे, दोषी हिन्दू होगा, जिसने वक्फ बोर्ड को असीमित सम्पत्तियां एक झटके में ट्रांसफर कर दी,
जिसके समय मंत्री बनाने का कार्य पत्रकार करते थे,
जिसके लवाजमे के साथ एजेंडा पत्रकार विशेष खैरात से तुष्ट होते थे।
जिसने हिंदुओं को बदनाम करने के लिए , उन्हें भी जाहिल मुसलमानों जेहादियों की तरह आतंकी साबित करने के लिए भगवा आतंकवाद की थियोरी गढ़, देश पर आतंकवादी हमला करवाया।
जिसके शासन काल में बम विस्फोट का रिकॉर्ड बन गया, जिसे इंटरनेशनल लेवल पर पाकिस्तान जैसा पिद्दी देश गंवार औरत कह जाता था।
जिसने कश्मीर के दुर्दांत हत्यारे के साथ बैठकर चाय पी,
जो सदैव मौन रहता था।
जो मिमियाने में भी शरमाता था जबकि उसकी पार्टी का अदना सा व्यक्ति उसके केबिनेट के निर्णय को प्रेस कांफ्रेंस में फाड़ देता है और वह उसे वापस ले लेता है।
जिसने कहा "पैसा पेड़ पर नहीं उगता!"
जबकि उसके मंत्रिमंडल के लोग #पैरेलल_नोट_छापकर, गमलों की गोभी के नाम से मालामाल हो रहे थे।
पाकिस्तान की इकोनॉमी भारतीय नकली करेंसी से चलती थी, बैंक कंगाल हो गए थे, भगोड़े विदेशों में बस गए थे।
जिसने कहा "देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है" और हिन्दू सच में दोयम दर्जे का हो गया था।
जिसके कार्यकाल में देश के सर्वोच्च पदों वाले व्यक्तियों की जासूसी होती थी, सेना का मनोबल गिराया गया, विवादों में घसीटा गया, उसे आतंकवादियों के सामने लगभग निहत्था मरने के लिए छोड़ दिया गया, नक्सलवाद की विजय के गीत गाने वाले यूनिवर्सिटी चलाते थे, एनजीओ गैंग की पौ बारह थी, रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को आंसूगैस और लाठियां चलाई गईं, रामसेतु तोड़ने की योजना बनाई गई, अमरनाथ यात्रा को रोकने का षड्यंत्र हुआ, चारों तरफ मनमानी, अपराध और अत्याचार का तांडव था, कहीं से भी नहीं लगता था कि हिन्दू का भी कोई भविष्य है, वह व्यक्ति 10 वर्ष तक इस देश को 100 साल के रसातल में डुबोकर चला गया।
यह जो केजरीवाल नामक #बवासीर_है वह उसी की देन है।
मरने के बाद व्यक्ति की बुराई नहीं करनी चाहिए पर व्यक्ति के कार्यों की चर्चा अवश्य करनी चाहिए जो तथ्यों के आलोक में चीख चीख कर कह रहे हैं।
मनमोहन सिंह जी! आपकी उपलब्धि यही है कि आपने हताश निराश हिन्दुओं को नरेन्द्र मोदी को क्षितिज पर लाने के लिए विवश कर दिया जो कि यह आत्मघाती क्लांत कौम के लिए लगभग असंभव था।
जब भी तुलनात्मक चार्ट बनेगा, नरेन्द्र मोदी की विराटता और आपके अनुयायियों के बौनेपन से वह विभेद स्पष्ट दिखेगा!!
दिलीप आसनानी🙏🙏👍👌🌹
12-
बहुत कठोर पोस्ट है पर जानना जरूरी है...
- जिन्ना का दोष यही था,कि उसने मुसलमानों को सीधे कत्ले आम कर के पाकिस्तान लेने का निर्देश दिया था. वह चाहता तो यह क़त्ले आम रुक सकता था.लेकिन जिन्ना को तो मुसलमानों की ताकत दर्शानी थी.
- 16 अगस्त 1946 से दो दिन पूर्व ही जिन्ना नें "सीधी कार्यवाही" की धमकी दी थी.गांधी जी को तब तक यही उम्मीद थी कि जिन्ना सिर्फ बोल रहा है,देश के मुसलमान इतने बुरे नहीं कि 'पाकिस्तान' के लिए हिंदुओं का कत्लेआम करने लगेंगे.
पर गांधी यहीं अपने जीवन की
सबसे बड़ी भूल कर बैठे,
धर्म का नशा शराब से भी ज्यादा घातक होता है.
- बंगाल और बिहार में मुस्लिमों की संख्या अधिक थी और मुस्लिम लीग की पकड़ भी यहाँ मजबूत थी.
बंगाल का मुख्यमंत्री शाहिद सोहरावर्दी जिन्ना का वैचारिक गुलाम था, जिन्ना का आदेश उसके लिए खुदा का हुक्म था.
- पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश ) का मुस्लिम बाहुल्य जिला नोआखाली,यहाँ अधिकांश दो ही जाति के लोग थे ,गरीब हिन्दू तथा मुसलमान. हिंदुओं में 95 फीसदी पिछड़ी जाति के लोग थे,गुलामी के दिनों में किसी भी तरह पेट पालने वाले.
- लगभग सभी जानते थे कि जिन्ना का "डायरेक्ट एक्शन" यहाँ लागू होगा पर हिन्दुओं में शांति थी, आत्मरक्षा की भी कोई तैयारी नहीं.
कुछ गाँधी जी के भरोसे बैठे थे.कुछ को मुस्लिम अपने भाई लगते थे, उन्हें भरोसा था कि मुस्लिम उनका अहित नहीं करेंगे.
सुबह के दस बज रहे थे,सड़क पर नमाजियों की भीड़ अभी से ही इकट्ठी हो गयी थी.बारह बजते बजते यह भीड़ तीस हजार की हो गयी, सभी हाथों में तलवारें थीं.
मौलाना मुसलमानों को बार बार जिन्ना साहब का हुक्म पढ़ कर सुना रहा था, "बिरादराने इस्लाम, हिंदुओं पर दस गुणा तेजी से हमला करो "
- मात्र पचास वर्ष पूर्व ही हिन्दू से मुसलमान बने इन मुसलमानों में घोर साम्प्रदायिक जहर भर दिया गया था, इन्हें अपना पाकिस्तान किसी भी कीमत पर चाहिए था.
- एक बज गया,नमाज हो गयी,अब जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का समय था,इस्लाम के तीस हजार सिपाहियों ने एक साथ हिन्दू बस्तियों पर हमला शुरू कर दिया, एक ओर से, पूरी तैयारी के साथ ।
जैसे किसान एक ओर से अपनी फसल काटता है.जब तक एक जगह की फसल पूरी तरह कट नहीं जाती,तब तक आगे नहीं बढ़ता.
जिन्ना की सेना पूरे व्यवस्थित तरीके से काम कर रही थी. पुरुष, बूढ़े और बच्चे काटे जा रहे थे, स्त्रियों-लड़कियों का बलात्कार किया जा रहा था.
हाथ जोड़ कर घिसटता हुआ पीछे बढ़ता कोई बुजुर्ग,और छप से उसकी गर्दन उड़ाती तलवार.माँ माँ कर रोते छोटे छोटे बच्चे,और उनकी गर्दन उड़ा कर मुस्कुरा उठती तलवारें.
अपने हाथों से शरीर को ढंकने का असफल प्रयास करती बिलखती हुई एक स्त्री, और राक्षसी अट्टहास करते बीस बीस मुसलमान.
उन्हें याद नहीं कि वे मनुष्य भी हैं,उन्हें सिर्फ जिन्ना याद है,उन्हें बस पाकिस्तान याद है.
शाम हो आई थी ।
एक ही दिन में लगभग 15000 हिन्दू काट दिए गए थे,
और लगभग दस हजार स्त्रियों का बलात्कार हुआ था.
जिन्ना खुश था,
उसके "डायरेक्ट एक्शन" की सफल शुरुआत हुई थी।
अगला दिन, सत्रह अगस्त.मटियाबुर्ज का केसोराम कॉटन मिल,जिन्ना की विजयी सेना ने आज यहाँ हमला किया, मिल के मजदूर और आस पास के स्थान के दरिद्र हिन्दू.
आज सुबह से ही तलवारें निकली हुई थी.उत्साह कल से ज्यादा था,मिल के ग्यारह सौ मजदूरों,जिनमें तीन सौ उड़िया थे,उनको ग्यारह बजे के पहले ही पूरी तरह काट डाला गया,मोहम्मद अली जिन्ना जिन्दाबाद के नारों से आसमान गूंज रहा था.
पड़ोस के इलाके को बाद में देखने का फैसला किया ,फिलहाल अभी मजदूरों की स्त्रियों के साथ खेलने का समय था हजार स्त्रियों का शरीर.
अगले एक सप्ताह में रायपुर, रामगंज, बेगमपुर, लक्ष्मीपुर,लगभग एक लाख लाशें गिरी,तीस हजार स्त्रियों का बलात्कार हुआ, जिन्ना ने अपनी ताकत दिखा दी थी.
- हिन्दू महासभा "निग्रह मोर्चा" बना कर बंगाल में उतरी,और सेना भी लगा दी.कत्लेआम रुक गया.
बंगाल विधान सभा के प्रतिनिधि हारान चौधरी घोष कह रहे थे," यह दंगा नहीं, मुसलमानों की एक सुनियोजित कार्यवाही थी,एक कत्लेआम था "
गांधीजी का घमंड टूटा, पर भरम बाकी रहा.वे
वायसराय माउंटबेटन से कहते थे
"अंग्रेजी शासन की फूट डालो और राज करो की नीति ने ऐसा दिन ला दिया है कि अब लगता है या तो देश रक्त स्नान करे या अंग्रेजी राज चलता रहे"
सच यही था कि गांधी अब हार गए थे
और जिन्ना जीत गया था.
कत्लेआम कुछ दिन के लिए ठहरा भर था या शायद
अधिक धार के लिए कुछ दिनों तक रोक दिया गया था.
6 सितम्बर 1946.
गुलाम सरवर हुसैनी,मुस्लिम लीग का अध्यक्ष बना और शाहपुर में कत्लेआम दुबारा शुरू हो गया.
10 अक्टूबर 1946
कोजागरी लक्ष्मीपूजा के दिन ही कत्लेआम की तैयारी थी.नोआखाली के जिला मजिस्ट्रेट M J Roy रिटायरमेंट के दो दिन पूर्व ही जिला छोड़ कर भाग गए थे.
वे जानते थे कि जिन्ना ने 10 अक्टूबर का दिन तय किया है,और वे हिन्दू हैं जो लोग भाग सके हैं वे पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और आसाम के हिस्सों में भाग गए हैं ।
जो नहीं भाग पाए उन पर कहर बरसी, नोआखाली फिर जल उठा,लगभग दस हजार लोग दो दिनों में काट दिये गए.इस बार नियम बदल गए थे ।
पुरुषों के सामने उनकी स्त्रियों का बलात्कार हो रहा था,फिर पुरुषों और बच्चों को काट दिया जाता था अब वह बलात्कृता स्त्री उसी राक्षस की हुई जिसने उसके पति और बच्चों को काटा था.
एक लाख हिन्दू बंधक बनाए गए,उनके लिए मुक्ति का मार्ग निर्धारित था.गोमांस खा कर इस्लाम स्वीकार करो और जान बचा लो.
एक सप्ताह में लगभग पचास हजार हिंदुओं का
धर्म परिवर्तन हुआ,
जिन्ना का "डायरेक्ट एक्शन" सफल हुआ.
नेहरू और पटेल मन ही मन
भारत विभाजन को स्वीकार कर चुके थे.
आज सत्तर साल बाद
जिन्ना सेकुलर थे,ऐसा कहने वाले , भारत की धरती पर खड़े हो कर जिन्ना की बड़ाई करने वाले से बड़ा गद्दार इस विश्व में दूसरा कोई नहीं हो सकता.
इतिहास पढ़ो और थोड़ा सोचो,
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ताकि सेक्युलर हिन्दुओं को
पता तो चले कि कौन था जिन्ना.
नोआखाली दर्दनाक हत्याकांड
फिर भी इस देश में गांधी नेहरू जिन्ना महान है
13-
Akhilesh Yadav जी ने कल भाषण देते हुए कहा कि फूलन देवी पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुआ
लेकिन बड़ी सफाई से अखिलेश यादव ने यह छुपा लिया फूलन देवी पर अत्याचार किसने किया
आप फूलन देवी पर कुछ फैक्ट जानिए और आप चाहे तो जालौन जिले में फूलन देवी के गांव जाकर इस फैक्ट को पता कर सकते हैं कि फूलन देवी पर जुल्म और अत्याचार किसने की है
इसके सगे चाचा ने इसकी जमीन पर कब्जा कर लिया था..10 साल की उम्र में इसने अपनी मां से पूछा की मां हमारे चाचा के पास हमसे ज्यादा जमीन क्यों है तब इसकी मां ने बताया कि उन्होंने हमारी जमीन पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया है क्योंकि उनके लड़के हमसे ताकतवर हैं
तब ये 9 साल की उम्र में अपने चाचा का सर फोड़ दी थी क्योंकि यह एक बच्ची थी इसलिए कोई पुलिस केस नहीं हुआ था
10 साल की उम्र में फूलन देवी के बाप ने इसे एक 45 साल के बूढ़े को ₹3000 में बेच दिया था इसका बूढ़ा पति भी इसी के जाति का था और इसके ऊपर बहुत अत्याचार करता था
एक दिन फूलन देवी पति के अत्याचार से तंग आकर अपने मायके आ गई.. कुछ दिन के बाद इसके भाइयों ने इसे जबरदस्ती इसके पति के घर भेज दिया वहां जाकर पता चला कि उसके पति ने कोई और महिला से शादी कर ली है फिर इसके पति और इसके पति की दूसरी पत्नी ने इसे घर से भगा दिया फिर यह वापस अपने गांव आ गई
मायके में सगे भाइयों से इसका काफी झगड़ा हुआ तब उसके सगे भाइयों ने इसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट करवा दिया जिससे यह थाने में बंद हो गई तब गांव के ठाकुरों ने ही यह सोचकर इसका जमानत करवाया कि गांव की लड़की जेल में बंद हो तो यह गांव के लिए शर्मनाक बात है
एक दिन इसकी गांव में विक्रम मल्लाह नामक एक डकैत में धावा बोला और उसने फूलन देवी के साथ बलात्कार किया और विक्रम मल्लाह 4 दिन तक गांव में रुका छुपा रहा और जाते हुए वह फूलन देवी को भी अपने साथ बीहड़ में लेकर चला गया
विक्रम मल्लाह डकैतों की गैंग का सरदार नहीं था बल्कि सरदार बाबू गुर्जर था। एक दिन बाबू गुर्जर ने फूलन देवी का बलात्कार किया जिससे गुस्से में विक्रम मल्लाह ने बाबू गुर्जर की हत्या कर दी और पूरी गैंग की कमान अपने हाथ में ले लिया फूलन देवी विक्रम मल्लाह की रखैल बन गई उसके बाद फूलन देवी विक्रम मल्लाह के साथ अपने पति के गांव गई और अपने पति को और अपने पति के दूसरी पत्नी को मरणासन्न हालत तक पीटा और बीच-बचाव करने आए दो लोगों को गोली मार दी
डकैतों के एक दूसरे गैंग का मुखिया दादा ठाकुर जो मीणा/मैना था वह बाबू गुर्जर की हत्या से विक्रम मल्लाह से नाराज और दादा ठाकुर ने विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी
विक्रम मल्लाह की हत्या से नाराज होकर फूलन देवी ने मीणा जाति के गैंग के सदस्य ठाकुर लालाराम मीणा को मार दिया
इससे दादा ठाकुर ने एक गांव में घुसकर मल्लाह जाति के 25 लोगों को मार दिया
फूलन देवी को शक था गांव के छत्रिय यानी ठाकुर समाज के लोग दादा ठाकुर मीणा के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उसे संरक्षण देते हैं तब उसने बेहमई गांव में 22 ठाकुरों को गोलियों से भून डाला और एक 6 महीने की बच्ची को उठाकर आसमान में फेंक दिया जिससे वह बच्ची जमीन पर गिरी और उसकी गर्दन की हड्डी और रीढ़ की हड्डी टूट गई वह बच्ची आज भी जिंदा है लेकिन न चल सकती है ना बैठ सकती है वह बच्ची आज एक जिंदा लाश बन कर एक युवती बन चुकी है
यह सारे फैक्ट है
लेकिन मीडिया ने फूलन देवी को यह कहकर हीरोइन बना दिया कि उच्च जातियों के अत्याचारों से तंग आकर फूलन देवी ने बदला लिया
अब आप खुद विचार करिए कि फूलन देवी पर अत्याचार करने वाले कौन लोग थे
क्या फूलन देवी का पिता दोषी नहीं है जिसने फूलन देवी को 45 साल के बूढ़े को बेच दिया?
क्या फूलन देवी का चाचा दोषी नहीं है जिसने फूलन देवी के जमीन पर कब्जा किया?
क्या फूलन देवी के सगे भाई दोषी नहीं है जो उसे बार-बार उसके अत्याचारी पति के पास छोड़ आते थे?
क्या फूलन देवी का पति दोषी नहीं है जो उसके ऊपर अत्याचार करता था ?
क्या विक्रम मल्लाह दोषी नहीं है जिसने देवी का बलात्कार किया और उसे उठाकर बीहड़ लेकर चला गया और उसे अपराध की दुनिया में ढकेल दिया ?
लेकिन अफसोस लोगों को यही बताया जाता है दोषी तो उच्च वर्ग के लोग हैं। साभार -Jitendra Pratap Singh
#विचारों_की_प्रयोगशाला
*14-*
यह इतिहास बताता है कि अंग्रजों का दलाल चाटूकार कौन था ?
लन्दन के बकिंघम पैलेस में ब्रिटेन की महारानी/महाराजा से ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि लेने की प्रक्रिया अत्यन्त अपमानजनक है। यह उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ब्रिटेन के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है और इसके पश्चात् उसे महारानी/महाराजा के समक्ष सिर झुकाकर एक कुर्सी पर अपना दायाँ घुटना टिकाना पड़ता है। ठीक इसी समय महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति की गरदन के पास दोनों कन्धों पर नंगी तलवार से स्पर्श करते हैं। तत्पश्चात् महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ‘नाइटहुड’ पदक देकर बधाई देते हैं।
यह प्रक्रिया सैकड़ों वर्ष पुरानी है और भारत में जिस जिसको यह उपाधि मिली वो सभी ‘सर’ इस प्रक्रिया से गुजरे थे।
ब्रिटेन अपने देश और अपने उपनिवेशों में अपने चाटुकारों को ब्रिटेन के प्रति निष्ठवान बनाने के लिए ऐसी अनेक उपाधियाँ देता रहा है। नाइटहुड (सर) की उपाधि उनमें सर्वोच्च होती थी।
गुलाम भारत में ब्रिटिश शासकों द्वारा देश के अनेक राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् आदि ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने के बाद ही ‘नाइटहुड’ से सम्मानित किए गए थे।
इतिहास बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत उसी को नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित करती थी जिसे वो अपना वफादार चाटूकार दलाल मुखबिर मानती थी। हालांकि औपचारिक रूप से कहा यह जाता था कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह उपाधि दी जाती है। इसीलिए कभी कभी दिखावे के लिए कुछ वैज्ञानिकों चिकित्सकों शिक्षाविदों को भी यह उपाधि दे दी जाती थी।
कुछ अपवादों को छोड़कर देश के लगभग सभी राजा महाराजा नवाब और सेठ साहूकार आदि ब्रिटिश शासकों के तलुए चाटा करते थे। यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है।
अतः उनको दरकिनार कर के आइए जानिए तत्कालीन राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे बड़े नामों को जिन्होंने ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेकर नाइटहुड (सर) की उपाधि ब्रिटिश दरबार में घुटना टेक कर ग्रहण की थी।
पहला नाम:
सन 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोजशाह मेहता बने थे। मेहता जी ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतने जुझारू तरीके से लड़ी थी कि 1904 में ब्रिटिश शासकों ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।
दूसरा नाम:
सन 1900 में नारायण गणेश चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। वह देश के प्रति कितना वफादार था और अंग्रेजों के प्रति कितना वफादार था यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साल भर बाद ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने नारायण गणेश चंदावरकर को 1901 में बॉम्बे हाईकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया था। देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए बनी कांग्रेस के उस राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायण गणेश चंदावरकर ने जज बनकर अंग्रेजों की इतनी गज़ब सेवा की कि 1910 में ब्रिटिश शासकों ने नारायण गणेश चंदावरकर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से नवाजा था। 1913 में जज के पद से रिटायर होने के बाद यह चंदावरकर फिर कांग्रेस का बड़ा नेता बन गया था।
तीसरा नाम:
1907 और 1908 में लगातार 2 बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रासबिहारी घोष ने कांग्रेस के झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतनी जोरदारी और ईमानदारी से लड़ी थी कि सन 1915 में ब्रिटिश शासकों ने रासबिहारी घोष को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।
चौथा नाम:
सन 1897 में अंग्रेज़ सरकार का एडवोकेट जनरल चेत्तूर संकरन नायर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। नायर ने कांग्रेस के झंडे तले देश की आज़ादी की लड़ाई इतने भीषण तरीके से लड़ी थी कि अंग्रेजों ने 1904 में उसको कम्पेनियन ऑफ इंडियन एम्पायर की तथा 1912 में नाइटहुड (सर) की उपाधि देकर समान्नित तो किया ही था साथ ही साथ 1908 में ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया था। 1915 में वह उसी पद से रिटायर हुआ था।
यह चार नाम किसी छोटे मोटे कांग्रेसी नेता के नहीं बल्कि कांग्रेस के उन राष्ट्रीय अध्यक्षों के हैं जिन्होंने ब्रिटिश दरबार में घुटने टेक कर ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार रहने की कसम खायी थी।
अतः आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पेशे से वकील इन राजनेताओं ने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया था जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी गदगद हो गयी थी कि उन्हें नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित कर डाला था ?
अंग्रेजों के वफादार रहे कुछ और नामों के ऐसे उदाहरण भी हैं जिनको आजादी मिलने के बाद महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए।
आइए उनमें से कुछ नामों से आज आप भी परिचित होइए...
पहला नाम है फ़ज़ल अली का। इसे अंग्रेजों ने पहले खान साहिब फिर खान बहादुर की उपाधि दी और फिर 1942 में नाइटहुड (सर) की उपाधि से तब नवाजा गया था जब देश "अंग्रेजों भारत छोड़ो" आन्दोलन की तैयारी कर रहा था।
लेकिन 1947 में आज़ादी मिलने के बाद नेहरू सरकार ने इस फ़ज़ल अली को उड़ीसा का गवर्नर बनाया फिर असम का गवर्नर बनाया। फ़ज़ल अली 1959 में असम के गवर्नर के रूप में ही मरा था।
एन गोपालस्वामी अय्यंगर नाम के एक नौकरशाह की ब्रिटेन के प्रति वफादारी से अंग्रेज़ हुक्मरान इतना गदगद थे कि अंग्रेजों ने 1941 में उसको नाइटहुड (सर) की उपाधि से तो नवाजा ही था साथ ही साथ दीवान बहादुर, आर्डर ऑफ दी इंडियन एम्पायर, कम्पेनियन ऑफ दी ऑर्डर ऑफ दी स्टार ऑफ इंडिया सरीखीे 7 अन्य उपाधियों से भी नवाजा था।
1947 में देश को आज़ादी मिलते ही बनी पहली कांग्रेस सरकार का प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस गोपालस्वामी अय्यंगर पर इतना मेहरबान हुआ था कि उसे बिना विभाग का मंत्री बनाकर अपनी केबिनेट में जगह दी फिर 1948 से 1952 तक देश का पहला रेलमंत्री नियुक्त किया तत्पश्चात 1952 में उसे देश के रक्षामंत्री सरीखा महत्वपूर्ण पद सौंप दिया था।
पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी इसलिए बस इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं। क्योंकि अपने चाटूकार वफादारों दलालों को ब्रिटिश हुक्मरान राय बहादुर, साहेब बहादुर, खान बहादुर सरीखी उपाधियों से भी सम्मानित करती थी। उपरोक्त उपाधि पाने वालों की सूची में दर्ज तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के नाम भी यदि लिखूंगा तो पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी।
अतः केवल सर्वोच्च उपाधि नाइटहुड (सर) के इन उदाहरणों के उल्लेख के साथ ही यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि 1947 से पहले ब्रिटिश हुकूमत का वफादार होने का मतलब ही हिंदुस्तान का गद्दार होना होता था।
अतः कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि ब्रिटिश शासकों ने RSS के, हिन्दू महासभा के कितने नेताओं/कार्यकर्ताओं को नाइटहुड (सर) या राय बहादुर, साहेब बहादुर, खान बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था ?
मित्रों इसका जवाब शून्य ही है।
अतः इस सच्चाई व ऊपर उल्लिखित नाइटहुड (सर) की उपाधि पाए नामों को पढ़कर यह आप स्वयं तय कर लीजिए कि 1947 से पहले अंग्रेजों का वफादार दलाल मुखबिर कौन था ?
नीचे दाहिना घुटना टिकाकर सम्मान लेने की प्रक्रिया का छायाचित्र।
✍️वीरेंद्र द्विवेदी
शनिवार बैशाख कृष्ण त्रयोदशी २०८२
@highlight
साभार
*15*
हिंदू जब मुस्लिम हो जाता है तो कितना घातक होता है ?
एक थे *राघवराम कौल* काश्मीरी ब्राह्मण, जिनको गौ मांस खिलाकर मुस्लिम बनाया गया था ! इनके पुत्र का नाम शेख इब्राहीम था।
शेख इब्राहीम के पुत्र का नाम शेख अब्दुल्ला !
शेख अब्दूल्ला के पुत्र का नाम फारुक अब्दूल्ला, फारुक अब्दूल्ला के पुत्र है उमर अब्दूल्ला।
ये है राघव राम कौल का अब्दूल्ला परिवार।।जब तक इनकी ताकत थी काश्मीर में इन्होंने भी लोगों के साथ वही व्यवहार किया है, वही नैरेटिव चल रहा था, डोगरा सिंधी कश्मीरी पंडित बाल्मीकि समाज, सब के मांस को नोच नोच कर खाया, पलायन हत्या से भरा काश्मीर के इतिहास का 70 साल।
एक थे चितपावन ब्राह्मण जिनका नाम तुलसीराम था ! उन्होंने टीपू सुल्तान से बचने के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया था और अपने गांव ओवैस को उन्होंने अपना सरनेम ओवैसी बना लिया ! उन्ही तुलसीराम के पुत्र का नाम अब्दुल वाहिद ओवैसी था !
अब्दूल वाहिद के पुत्र का नाम सुल्तान ओवैसी था ! सुल्तान ओवैसी के पुत्र का नाम सलाहुद्दीन ओवैसी था !
सलाहुद्दीन ओवैसी के पुत्र का नाम असद्दुदीन ओवैसी और अकबरूद्दीन ओवैसी। और विडंबना देखिये कि ओवैशी ब्रदर जिस गोडसे से घृणा करते हैं ये उसी समाज से है, यानि दोनो चितपावन ब्राहम्ण। इनका भी यही सोच दूसरे लोगों को डराना और हर साल 15 मिनट का समय मांगना।
एक थे मुहम्मद अली जिन्ना जो पाकिस्तान के बाप कहे जाते थे !
इनके भी पिता का नाम- पुंजालाल ठक्कर था !
परदादा का नाम- *प्रेमी जी भाई मेग जी ठक्कर था, दादा का नाम चुन्ना भाई प्रेमजी भाई ठक्कर था ! जो एक गुजराती हिंदू थे । ये पैसे के लिए धर्म छोड़ दिए ! इनका भी वही नैरेटिव था और आज भी है ! स्वंय तो पैसे के लिए कटोरा पकड़ लिये दूसरों को भी पकड़ाए।
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के लगभग सभी मुसलमानों के पूर्वज वास्तव में हिन्दू ही थे जो मुग़ल शासकों के भय व उनके द्वारा लोभ वश मुस्लिम बन गए।
आज उन्हीं की संतान अनजाने में इस्लाम के नाम पर आतंक अथवा मारकाट कर रहे हैं। काश कि वे अपने पूर्वजों की गलती को सुधार, घर वापसी कर उनकी आत्मा को शांति पहुंचाने का कार्य करते।
ईश्वर एक है तो धर्म भी एक ही होगा। सत्य शास्वत और सनातन होता है, धर्म भी शास्वत और सनातन होता है।
धर्म के नाम पर कल या आज पैदा होने वाले मज़हब, मत सम्प्रदाय - शास्वत नहीं, सनातन नहीं, धर्म न हैं न ही हो सकते हैं। जो इन्हें ही धर्म मानते हैं, वे ऐसा अज्ञानवश मानते है।
सनातन ही सत्य है वही रहेगा 🙏_
*🚩सनातन संस्कृति 🚩*
साभार व्हाट्स एप
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भाजपा बस एक छोटा सा काम करे!
एम.ओ. मथाई की किताब “Reminiscences of the Nehru Age” पर लगा बैन हटा ले!
बिकने दे भारत में और कुछ फ्री बटवा दें!
चार दिन में कांग्रेसी सड़कों पर नाचते मिलेंगे?
सच्चाई दुनियां न जान जाए इसीलिए तो मथाई की पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया गया था।
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नोट - एम ओ मथाई के साथ इंदिरा के अवैध संबंध रहे थे। बारह वर्षों तक।
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इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू राजवंश कोअनैतिकता को नयी ऊँचाई पर पहुचाया...
इंदिरा को ऑक्सफोर्ड विश्व विद्यालय में भर्ती कराया गया था,
लेकिन वहाँ से जल्दी ही पढ़ाई में खराब प्रदर्शन और ऐयाशी के कारण बाहर निकाल दी गयी,
उसके बाद उसको शांति निकेतन विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था,
लेकिन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें उसके दुराचरण के लिए बाहर कर दिया,
शान्ति निकेतन से बाहर निकाले जाने के बाद इंदिरा अकेली हो गयी,
राजनीतिज्ञ के रूप में पिता राजनीति के साथ व्यस्त था,
और
मां तपेदिक से स्विट्जरलैंड में मर रही थी....
उनके इस अकेले पन का फायदा फ़िरोज़ खान नाम के व्यापारी ने उठाया,
फ़िरोज़ खान मोतीलाल नेहरु के घर पर महंगी विदेशी शराब की आपूर्ति किया करता था....
फ़िरोज़ खान और इंदिरा के बीच प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो गए...
महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल डा० श्री प्रकाश नेहरू ने चेतावनी दी, कि फिरोज खान के साथ अवैध संबंध बना रहा था,,,
फिरोज खान इंग्लैंड में तो था और इंदिरा के प्रति उसकी बहुत सहानुभूति थी,
जल्द ही वह अपने धर्म का त्याग कर,एक मुस्लिम महिला बनीं और लंदन के एक मस्जिद में फिरोज खान से उसकी शादी हो गयी,
इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू ने नया नाम मैमुना बेगम रख लिया....
उनकी मां कमला नेहरू इस शादी से काफी नाराज़ थी, जिसके कारण उनकी तबियत और ज्यादा बिगड़ गयी...
नेहरू भी इस धर्म रूपांतरण से खुश नहीं थे, क्युंकी इससे इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना खतरे में आ गयी तो,
नेहरू ने युवा फिरोज खान से कहा कि अपना उपनाम खान से गांधी कर लो,परन्तु इसका इस्लाम से हिंदू धर्म में परिवर्तन के साथ कोई लेना~ देना नहीं था,
यह सिर्फ एक शपथ पत्र द्वारा नाम परिवर्तन का एक मामला था, और फिरोज खान फिरोज गांधी बन गया है,
हालांकि यह बिस्मिल्लाह शर्मा की तरह एक असंगत नाम है, दोनों ने ही भारत की जनता को मूर्ख बनाने के लिए नाम बदला था, जब वे भारत लौटे,एक नकली वैदिक विवाह जनता के उपभोग के लिए स्थापित किया गया था,,,
इस प्रकार, इंदिरा और उसके वंश को काल्पनिक नाम गांधी मिला....
नेहरू और गांधी दोनों फैंसी नाम हैं... जैसे एक गिरगिट अपना रंग बदलती है, वैसे ही इन लोगो ने अपनी असली पहचान छुपाने के लिए नाम बदले....
के.एन.राव की पुस्तक "नेहरू राजवंश"
(10:8186092005 ISBN) में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है संजय गांधी फ़िरोज़ गांधी का पुत्र नहीं था,
जिसकी पुष्टि के लिए उस पुस्तक में अनेक तथ्यों को सामने रखा गया है,
उसमें यह साफ़ तौर पे लिखा हुआ है की संजय गाँधी एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस नामक सज्जन का बेटा था, दिलचस्प बात यह है की एक सिख लड़की मेनका का विवाह भी संजय गाँधी के साथ मोहम्मद यूनुस के घर में ही हुआ था,
मोहम्मद यूनुस ही वह व्यक्ति था जो संजय गाँधी की विमान दुर्घटना के बाद सबसे ज्यादा रोया था....
यूनुस की पुस्तक"व्यक्ति जुनून और राजनीति" (persons passions and politics) (ISBN-10 : 0706910176) में साफ़ लिखा हुआ है की संजय गाँधी के जन्म के बाद उनका खतना पूरे मुस्लिम रीति रिवाज़ के साथ किया गया था,
कैथरीन फ्रैंक की पुस्तक "the life of Indira Nehru Gandhi"
(ISBN : 9780007259304) में इंदिरा गांधी के अन्य प्रेम संबंधो के कुछ पर प्रकाश डाला है, यह लिखा है, कि इंदिरा का पहला प्यार शान्तिनिकेतन में जर्मन शिक्षक के साथ था...
बाद में वह एम.ओ मथाई, (पिता के सचिव) धीरेंद्र ब्रह्मचारी (उनके योग शिक्षक) के साथ और दिनेश सिंह (विदेश मंत्री) के साथ भी अपने प्रेम संबंधो के लिए प्रसिद्द हुई...
पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा गांधी के मुगलों के लिए संबंध के बारे में एक दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया अपनी पुस्तक~
"profiles and letters" (ISBN : 8129102358) में किया, यह कहा गया है, कि 1968 में इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री के रूप में अफगानिस्तान की सरकारी यात्रा पर गयी थी,,,
नटवर सिंह एक आई एफ एस अधिकारी के रूप में इस दौरे पे गए थे, दिन भर के कार्यक्रमों के होने के बाद इंदिरा गांधी को शाम में सैर के लिए बाहर जाना था,
कार में एक लंबी दूरी जाने के बाद, इंदिरा गांधी बाबर की कब्रगाह के दर्शन करना चाहती थी,हालांकि यह इस यात्रा कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया,,,
अफगान सुरक्षा अधिकारियों ने उनकी इस इच्छा पर आपत्ति जताई पर इंदिरा अपनी जिद पर अड़ी रही,,,
अंत में वह उस कब्रगाह पर गयी, यह एक सुनसान जगह थी,,, वह बाबर की कब्र पर सर झुका कर आँखें बंद करके खड़ी रही और नटवर सिंह उसके पीछे खड़े थे,
जब इंदिरा ने उसकी प्रार्थना समाप्त कर ली तब वह मुड़कर नटवर से बोली, आज मैंने अपने इतिहास को ताज़ा कर लिया,
"Today we have had our brush with history"
यहाँ आपको यह बता दे, की बाबर मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक था,,, और नेहरु खानदान इसी मुग़ल साम्राज्य से उत्पन्न हुआ,,,
इतने सालो से भारतीय जनता इसी धोखे में है की नेहरु एक कश्मीरी पंडित था,,, जो की सरासर गलत तथ्य है,,,
इस तरह इन नीचो ने भारत में अपनी जड़े जमाई जो आज एक बहुत बड़े वृक्ष में तब्दील हो गया है,
जिसकी महत्वाकांक्षी शाखाओं ने माँ भारती को आज बहुत जख्मी कर दिया है बाकी देश के प्रति यदि आपकी भी कुछ जिम्मेदारी बनती हो, तो अब आप लोग ''निःशब्द'' ना बनियेगा, इसे फैला दीजिए हर घर में!!!
फेसबुक पर जितेन्द्र अग्रवाल/ घनश्याम अग्रवाल की वाल से साभार कॉपी पेस्ट 💐🌹
*17*
#पाकिस्तान में जब किसी सुंदर लड़की की मौत होती है तो उसके परिजन महीनों उसकी कब्र की पहरेदारी करते हैं
क्योंकि सुंदर लड़की की कब्र को भी खोदकर हवसखोर मुर्दा लड़की के शरीर के साथ भी बलात्कार करते है,
#नेक्रोफिलिया
नेक्रोफिलिया एक मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति #शव यानी लाश यानी #डेड बॉडी के साथ #बलात्कार करता है,,
अगर मनोवैज्ञानिकों की मानें तो सामान्य रूप से यह बीमारी हर 10 लाख व्यक्तियों में से एक को होती है,, लेकिन #इस्लाम में हर #पाँचवा व्यक्ति नेक्रोफिलिया का शिकार है,,
यानी जिंदा तो जिंदा अगर लड़की की लाश भी मिल गई या खुद भी उसकी हत्या करनी पड़ी है तो भी बलात्कार जरूर करेंगे
मिस्र की साम्राज्ञी #क्लियोपेट्रा ने जो मौत चुनी उससे दुनिया स्तब्ध थी आखिर क्यों एक औरत नग्न अवस्था में अपने #स्तन पर #सांप से डसवाएगी,,लेकिन वो जानती थी कि जिसने मिस्र पर हमला किया है वे इस्लामिक फ़ौज के लोग हैं,,
स्तन पर डँस मरवाने से पूरे शरीर में जहर फैल जाएगा,,तो कोई इंफेक्शन के डर से उसकी मृत देह के साथ #बर्बरता नहीं कर पाएगा,, साथ ही स्तन को मुँह में लेकर कुचल नहीं पाएगा,, वहशियों का क्या वे किसी भी हद तक जा सकते हैं,,
फिर भी आपको बता दूं कि इतिहासकार कहते हैं कि उसके शव के साथ #तीन हज़ार बार बलात्कार किया गया था,,,
#महारानी #पद्मावती ने भी लड़कर मरने के बजाय जौहर चुना,, अभी जब पिछले दिनों फ़िल्म आई तो कितने लोगों ने कहा कि वो तो योद्धा थी,,
लड़कर क्यों नहीं मरी??
जौहर क्यों चुना??
तो इसका स्प्ष्ट कारण था #ख़िलजी और वैसे ही #इस्लामिक दरिंदो की फ़ौज,,
महारानी जानती थी की अगर लड़ते हुए उसने और उसकी साथी औरतों ने जान दी तो उसके शरीर के साथ क्या होगा,,
बल्कि दुनिया इस असलियत को जानती है सिर्फ हमारे बच्चों से इसे छुपाया गया है,,नेक्रोफिलिया,,
बस बहन बेटियों को इतना ही सन्देश देना चाहता हूं कि देखो मेरी बहनों,, जो
पूरे विश्व में अपनी #दरिंदगी और हवस के लिए प्रसिद्ध हैं,, जो शव को भी बिना बलात्कार नहीं छोड़ते,,
अगर तुम लोग इस चक्कर में आ गई कि सब एक जैसे नहीं होते तो याद कर लेना #क्लियोपेट्रा और महारानी पदमावती जैसी हजारों वीरांगनाओं जो जोहर की आग में समा गई
बस इतना सन्देश आज हम मां बहन बेटियों को देना चाहते हैं,, आप भी अपने बच्चों को आगाह करके बचा सकते हैं,,
बच्चे समझने को #तैयार हैं,, बस हम तैयार नहीं हैं सही शब्दों में समझाने के लिए....
फेसबुक से साभार
*18*
19. #नया_एटीट्यूड
हिंदुओं में एक एतिहासिक बीमारी रही है और वह है अतिनैतिकतावाद की बीमारी और यह इस हद तक है कि हमने अपने आप्त महापुरुषों तक को नहीं छोड़ा।
-विष्णु भगवान वैसे तो ठीक हैं लेकिन असुरों के साथ बहुत छल किया।
-रामजी वैसे तो ठीक हैं लेकिन शूर्पणखा की नाक काटकर ठीक नहीं किया।
-कृष्ण वैसे तो ठीक हैं पर महाभारत में द्रोण, कर्ण, दुर्योधन के विरुद्ध अनैतिक चालें चलीं।
हमारे गांधी बाबा तो इतने आत्ममुग्ध थे कि छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह को भी पथभ्रष्ट बताते थे।
उत्तर सबके विस्तार से दे सकता हूँ लेकिन अभी सिर्फ एक उत्तर दूँगा कि जिनको धर्म का मर्म नहीं पता होता वही ऐसी मूर्खतापूर्ण आलोचना करते हैं।
ऐसी आलोचनाओं के कारण हिंदुओं में आत्महीनता का रोग पनप गया जबकि दूसरी ओर देखिये--
-क्या उन्होंने छः साल की बच्ची से निकाह और नौ साल की होने पर उसके साथ सैक्स करने पर आज तक कोई सवाल उठाया है?
- क्या उन्होंने आज तक यहूदी कबीले बनू कुरैजा के जेनोसाइड के लिए मुहम्मद की स्वीकृति को दोषी ठहराया?
-क्या उन्होंने आज तक भारत सहित विश्व भर में तोड़े गये मंदिरों, क्रूर हत्याकांडो व हिंदुओं पर अत्याचारों के लिए के लिए क्षमा मांगी है?
नहीं!
आत्मसंकुचित होना तो दूर बल्कि वे इन्हें उचित ठहराते हैं औरर अकड़ते ही नहीं बल्कि इसे फिर दुहराने का संकल्प दिखाते हैं।
अभी दो बरस पहले इजरायली स्त्रियों के साथ बलात्कार कर उनके नग्न जीवित व मृत शरीरों की परेड कराई गई और गाजा के नरपिशाचों ने अल्लाह हो अकबर का बर्बर अट्टहास किया लेकिन जब इजरायल अपने बंधकों को ढूंढ रहा है तो सभी को मानवता याद आ रही है।
--
सभी जानते हैं कि जब-जब भारत और पाकिस्तान का किसी भी खेल का कोई मैच होता है तो उनके हिसाब से यह कोई खेल प्रतियोगिता नहीं बल्कि मुस्लिमों व काफिरों का द्वन्द्व होता है और इसकी हार जीत महज खेल की हार जीत नहीं होती।
यह मनोवैज्ञानिक युद्ध का एक भाग है जिसे हिंदू भी समझने व जवाब देने लगे हैं।
आप इस्लाम को तब तक नहीं हरा सकते जब तक कि आप भी उसके मन में वही पराजयबोध और हीनताबोध नहीं भर देते जो उन्होंने आठ सौ साल तक हिंदुओं में भरा था।
और ऐसे में कप्तान सूर्यकुमार यादव का निर्णय सिर्फ एक क्रोधाभिव्यक्ति नहीं बल्कि एक शानदार साइकलॉजिकल मूव है जिसने पाकिस्तान ही नहीं बल्कि भारत में बसे मुस्लिमों को तिलमिलाकर रख दिया है क्योंकि अब उनके पास खुद को संतोष देने का यह बहाना भी नहीं बचा कि भारत की जीत में मुस्लिमों का भी योगदान है क्योंकि टीम में कोई मुस्लिम सदस्य था ही नहीं।
उनकी दृष्टि में यह काफिर मूर्तिपूजकों के विरुद्ध इस्लाम की करारी हार थी।
इसीलिये कल की पाकिस्तान की हार केवल पाकिस्तानियों की हार नहीं थी बल्कि मुस्लिमों की निगाह में 'उम्मा' की हार थी।
यही कारण है कि इस बार तिलमिलाहट और ज्यादा थी और ऊपर से सूर्य कुमार यादव द्वारा पाकिस्तान का तिरस्कार, कुलदीप की आक्रामकता एवं बुमरा का ब्रह्मोस द्वारा हिटिंग का जेस्चर मुस्लिमों के मन में हीन भावना भर रहा है जिससे वह बुरी तरह हिले हुए हैं।
सदैव की भांति अरब, तुर्क व मुगल बादशाहों के हरमों से निकले मुस्लिम, उनके मानसिक गुलाम कांग्रेसी व लिबरल्स के पेट में दर्द हो रहा है कि मोदी ने इनकी आक्रामकता को एप्रीशिएट किया है।
मोदी और समझदार हिंदू पक्ष इस मनोवैज्ञानिक बढ़त के महत्व को समझते हैं और हर वास्तविक हिंदू में इसे देखना चाहते हैं।
नीचे चित्र में बुमरा का जेस्चर सिर्फ एक तात्कालिक आवेग नहीं बल्कि हिंदुओं के बदलते एटीट्यूड का प्रतीक है।
मैं सिर्फ यही कहूँगा, "बड़ी मुश्किल से आया है यह एटीट्यूड। नहीं, इसे मत छोड़ना लड़को।"
✍️ देवेन्द्र सिकरवार
फेसबुक से साभार
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21-
22.कमाल है मुस्लिम जातियां :-
अरबी जमात खुद को तुर्क, यूरोप वाले, यहाँ यानि दक्षिण एशियाई, आदि जगहों के मु स्लि म से नश्लन उच्च दर्जे का मानते हैं....
यानि एक अरब किसी तुर्क से भी रोटी बेटी का रिश्ता नहीं रखता...
ऐसे ही तुर्क वाले भी दो होते हैं एक तो तुर्की के तुर्क और दूसरे डुप्लीकेट यानी कि मध्य पूर्व के....
भारत आये तुर्क हमलावर मध्यपूर्व के ही थे...
अब ये अरब, असली और डुप्लीकेट तुर्क मिलकर अफगान, मंगोल हमले के दौरान हुए हू तू तू से जन्मे मुग़ल, उजबेक, कज़ाक, ताज़िक, और साथ ही रुसी चेचन आदि को दोयम मानते हैं..... ये हमेशा लड़ने मरने को तो इन्ह आगे करते हैं पर इन्ह खुद के बराबर कभी नहीं रखते..... इनसे कभी इनका रिश्ता राब्ता नहीं होता..
अब ये ऊपर वाले सारे के सारे... खुद को हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, इंडोनेसिया आदि के अपने दीनी बिरादर को कभी खुद के बराबर नहीं रखते..... इनकी ग्रेड सबसे निचली है...
इन्ह कोई खुद के बराबर न बैठता...
इनमें भी सबसे मजेदार एक और फेक्ट है....
अरबी दीनियों में भी दो ग्रुप हैं.... वैसे तो कई हैं पर मूल रूप से दो हैं....
एक होते है प्योर ब्लड.... नाम से आप अंदाजा लगा सकते हैं.... जिनके नाम के साथ बाप के नाम आते हैं
"बिन" शब्द का अर्थ होता है "का बेटा" और बिंत का "की बेटी" जैसे सलमान बिन सऊद मतलब सलमान सऊद का बेटा....... सऊदी, UAE, इराक, कुवैत, ओमान आदि में आपको ये बिन और बिंत वाले लोगों का वर्चस्व मिलेगा.....
दूसरे होते है "अल" वाले यानी इनके नाम के साथ बाप के नाम की जगह गाँव का नाम इनके शहर का नाम जुड़ता है.... पुराने समय में कबीले का जुड़ता था...
जैसे किसी का नाम सलमान अल कुवैती है.. मतलब सलमान जो कुवैत का है..... अब ये अल वाले जो हैं इनकी अलग भसड़ होती है... होता ये था की कबीले के हरम में जो मुख्य पत्नियां होती थीं... वेलिड निकाह वाली उनकी औलाद बिन और बिंत का सम्मान पाती थी.. पर जो रखैल, ग़ुलाम औरतों से पैदा हो जाते थे उन्हें बाप के नाम की जगह कबीले का नाम गाँव का नाम मिलता..... आपको अरब जगत में सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन में आपको ये "अल" वालों का वर्चस्व मिलेगा....
अब आप एक बात पर गौर करें .... ये जहाद के चनुने, आतंकवाद ये आपको जो टॉप ग्रेड है "बिन" "बिंत" उनमें काफ़ी कम दिखेगी.... ये सिर्फ फंडिंग करते हैं..
और बाकियों को कहते हैं चढ़ जा बेट्टा सूली पर भली करेंगे ताला चाबी.....
मज़ाल नहीं को "अल" वाला आज भी खुद के नाम में "बिन या बिंत" जोड़ ले....
असली जाति व्यवस्था और सामंतवाद तो ये है गुरु..
भें••• तुम ठाकुर के कुए को रोते हो बिधर तो पूरा समंदर ठाकुर का..... बाकियों को सिंगट्टा....
Sanjiv Lovepreet भाई की धमाकेदार पोस्ट.
Kumar Kalhans फेसबुक से साभार
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23-तिस्ता जावेद सीतलवाड़**अमिताभ बच्चन का बंगला मुंबई के जुहू स्थित तारा रोड पर स्थित है – यह एक बड़ा बंगला है।*
*अमिताभ बच्चन के बंगले के बाद, यहाँ सिर्फ़ 2-3 बड़े उद्योगपतियों के बंगले हैं।*
*उस रोड पर एक भव्य बंगला है। उस बंगले का नाम "निरंतर" है।*
*यह बंगला अमिताभ बच्चन के बंगले से तीन गुना बड़ा है। इस बंगले में लगभग 3 एकड़ का लॉन है और यह बेहद आलीशान है।*
मुंबई के जुहू जैसे संभ्रांत इलाके में इतना आलीशान बंगला है, यह सुनकर कोई भी हैरान हो जाएगा!
*लेकिन यह बंगला किसी सुपरस्टार या उद्योगपति का नहीं है।*
क्या आप जानते हैं कि इस बंगले का मालिक कौन है?
*तिस्ता जावेद सीतलवाड़* – सिर्फ़ एक सामाजिक कार्यकर्ता!
अब आगे अंत तक धैर्य से पढ़िए _ आंख कान मस्तिष्क सब खुलने लगेंगे
2004 से 2012 के बीच, उन्हें विदेशों से करोड़ों डॉलर का फंड मिला
किसलिए?
*गरीबों के उत्थान के लिए?*
लेकिन एक बात और है...
ये लोग इतने भारत विरोधी क्यों हैं?
उनके पूर्वजों ने यह बीज बोया था।
*यहां से*
*पढ़िए वो इतिहास जो कॉंग्रेस ने हम से छुपाया*
हंटर आयोग - यह वह जाँच समिति थी जिसने जनरल डायर को क्लीन चिट दी थी। वही डायर जिसने जलियाँवाला बाग हत्याकांड में गोलीबारी का आदेश दिया था।
*इस आयोग के सदस्य हरिलाल चिमनलाल सीतलवाड़, यानी तीस्ता सीतलवाड़ के परदादा थे।*
*यानी उपरोक्त वर्णित भव्यता से परिपूर्ण बंगले के वर्तमान मालिकों के __ पूर्वज*
यह हरिलाल के पुत्र - मोतीलाल चिमनलाल सीतलवाड़, यानी तीस्ता के दादा - थे जिन्होंने जनरल डायर को बरी किया था।
*स्वतंत्रता के बाद, नेहरू ने इन्हीं मोतीलाल सीतलवाड़ को भारत का अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया।*
*यह नेहरू की अंग्रेजों के प्रति निष्ठा का जीता जागता प्रमाण है।*
कहानी यहीं खत्म नहीं होती...
*अब आगे पढ़िए *
जब जनरल डायर पर मुकदमा चल रहा था, तब दीवान बहादुर कुंज बिहारी थापर ने अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी दिखाते हुए जनरल डायर के लिए डेढ़ लाख रुपये इकट्ठा किए और उन्हें कृपाण और पगड़ी पहनाकर सम्मानित भी किया।
यही कुंज बिहारी थापर हैं - *करण थापर* के परदादा।
थापर परिवार ब्रिटिश काल में, खासकर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, सैनिकों और सामग्री की आपूर्ति करके अमीर बना।
आज, जब थापर परिवार अपनी वफ़ादारी दिखाता है, तो यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि कृपाण और पगड़ी कहाँ से आई।
यह सब स्वर्ण मंदिर के प्रबंधन में हुआ, जहाँ *सुजान सिंह* और *शोभा सिंह* नाम के दो ठेकेदार मुख्य ठेकेदार थे।
जब अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की, तो इन दोनों ने सभी निर्माण ठेके संभाले।
शोभा सिंह के पुत्र *खुशवंत सिंह* एक प्रसिद्ध लेखक और इंदिरा गांधी के समर्थक थे। उन्होंने आपातकाल के पक्ष में लेख लिखे।
खुशवंत सिंह के पुत्र - *राहुल सिंह* - एनडीटीवी पर तीस्ता सीतलवाड़ और अरुंधति रॉय जैसी हस्तियों का महिमामंडन करके भारत विरोधी विचारों को बढ़ावा देते रहते हैं।
थापर परिवार की बात करें तो...
करण थापर के पिता *प्राणनाथ थापर* 1962 के चीन युद्ध के कमांडर थे - एक ऐसा युद्ध जिसमें भारत हार गया था।
इससे पहले, जनरल के.एस. थिमय्या ने लेफ्टिनेंट जनरल एस.पी.पी. थोराट को अपना उत्तराधिकारी बनाने की सिफ़ारिश की थी।
लेकिन नेहरू ने उस सिफ़ारिश को अस्वीकार कर दिया और प्राणनाथ थापर को नियुक्त किया।
- ब्रिटिश विचारधारा का एक और उदाहरण।
इतना ही नहीं - प्राणनाथ थापर के भाई *मायादास थापर, बेटी* का नाम *रोमिला थापर* है, जिनके नाम पर भारतीय स्कूली इतिहास की किताबों का नाम रखा गया है।
यह नियुक्ति भी नेहरू ने ही की थी।
हैरानी की बात है कि 1962 के युद्ध में हारने वालों के नाम इन इतिहास की किताबों में नहीं मिलते।
सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ये किताबें उनकी भतीजियों ने लिखी थीं!
यह वही अमीर परिवार है - जो ब्रिटिश काल में रिश्वत लेकर अमीर बना था - आज भी भारत के इतिहास और पहचान पर कब्ज़ा जमाए हुए है।
ये वही लोग हैं जो खुद को प्रगति का एकाधिकार मानते हैं।
ये वही लोग हैं जो झूठ फैलाते हैं और भारत की असली पहचान को उभरने से रोकते हैं।
आज़ादी के बाद, नेहरू और कांग्रेस ने इन्हीं लोगों को महत्वपूर्ण पद देकर ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा।
तीस्ता सीतलवाड़ जेल गईं, यह सिर्फ़ एक धोखेबाज़ का पतन नहीं था... बल्कि एक पूरी परजीवी व्यवस्था का पतन था - जिसकी जड़ें कई पीढ़ियों पहले जमी थीं।
विश्व मार्यम फेसबुक वाल से साभार ...
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पाकिस्तान में जब किसी सुंदर लड़की की मौत होती है तो उसके परिजन महीनों उसकी कब्र की पहरेदारी करते हैं,,,,
नेक्रोफिलिया-- मैं अक़्सर बेटियों से पूछने लगा हूँ ,,।।
आज मैंने योगशिविर समय से आधा घण्टा पहले खत्म कर दिया,,अब चूंकि शिविर में सिर्फ बेटियां आई थी तो उनसे एक आसान सा सवाल किया मैंने,,
नेक्रोफिलिया क्या है,,,,,,??
और आपको जानकर हैरानी होगी कि 250 बेटियों में ये बात किसी को नहीं पता,,यहाँ तक कि उनकी वार्डन और अध्यापिका को भी नहीं मालूम,,हो सकता है आपमें से भी बहुतों को न पता हो,,
अब जब बच्चों में जिज्ञासा जग गई तो कइयों ने पूछा कि क्या है नेक्रोफिलिया?? गुरूजी आप ही बता दीजिए,,
सुनो मेरी बहनों--नेक्रोफिलिया एक मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति शव यानी लाश यानी डेड बॉडी के साथ बलात्कार करता है,,।।
अगर मनोवैज्ञानिकों की मानें तो सामान्य रूप से यह बीमारी हर 10 लाख व्यक्तियों में से एक को होती है,, लेकिन चूस्लाम में हर दसवां व्यक्ति नेक्रोफिलिया का शिकार है,,
यानी जिंदा तो जिंदा अगर लड़की की लाश भी मिल गई या खुद भी उसकी हत्या करनी पड़ी है तो भी बलात्कार जरूर करेंगे,,
मिस्र की साम्राज्ञी क्लियोपेट्रा ने जो मौत चुनी उससे दुनिया स्तब्ध थी,, आखिर क्यों एक औरत नग्न अवस्था में अपने स्तन पर सांप से डसवाएगी,,लेकिन वो जानती थी कि जिसने मिस्र पर हमला किया है वे इस्लामिक फ़ौज के लोग हैं,,
स्तन पर दंस मरवाने से पूरे शरीर में जहर फैल जाएगा,,तो कोई इंफेक्शन के डर उसकी मृत देह के साथ बर्बरता नहीं कर पाएगा,, साथ ही स्तन को मुँह में लेकर कुचल नहीं पाएगा,, वहशियों का क्या वे किसी भी हद तक जा सकते हैं,,
फिर भी आपको बता दूं कि इतिहासकार कहते हैं कि उसके शव के साथ तीन हज़ार बार बलात्कार किया गया था,,,
रानी पद्मावती ने भी लड़कर मरने के बजाय जौहर चुना,,अभी जब पिछले दिनों फ़िल्म आई तो कितने लोगों ने कहा कि वो तो योद्धा थी,,लड़कर क्यों नहीं मरी??जौहर क्यों चुना??
तो इसका स्प्ष्ट कारण था ख़िलजी और वैसे ही इस्लामिक दरिंदो की फ़ौज,,रानी जानती थी की अगर लड़ते हुए उसने और उसकी साथी औरतों ने जान दी तो उसके शरीर के साथ क्या होगा,,बल्कि दुनिया इस असलियत को जानती है सिर्फ हमारे बच्चों से इसे छुपाया गया है,,नेक्रोफिलिया,,
बस बेटियों को इतना ही सन्देश दिया कि देखो मेरी बहनों,, जो पूरे विश्व में अपनी #दरिंदगी और हवस के लिए प्रसिद्ध हैं,, जो शव को भी बिना बलात्कार नहीं छोड़ते,,
अगर तुम लोग इस चक्कर में आ गई कि सब एक जैसे नहीं होते तो याद कर लेना #क्लियोपेट्रा और रानी पदमावती को,,,
बस इतना सन्देश आजकल मैं मां बहन बेटियों को दे रहा हूँ,,, आप भी अपने बच्चों को आगाह करके बचा सकते हैं,,
बच्चे समझने को #तैयार हैं,, बस हम तैयार नहीं हैं सही शब्दों में समझाने के लिए।।
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गुजरात हाई कोर्ट ने बेट द्वारका के 2 द्वीपों पर कब्जा जमाने के सुन्नी वक्फ बोर्ड के सपने को चकनाचूर कर दिया है इस समय गुजरात का यह विषय बहुत चर्चा में है सोशल मीडिया के माध्यम से हम लोगों को मालूम पड़ गया वरना पता ही नहीं चलता...!!
कैसे पलायन होता है और कैसे कब्जा होता है लैंड जिहाद क्या होता है वह समझने के लिए आप बस बेट द्वारिका टापू का अध्ययन कर लें तो सब प्रक्रिया समझ आ जायेगी कुछ साल पहले तक यहाँ कि लगभग पूरी आबादी हिन्दू थी यह ओखा नगरपालिका के अन्तर्गत आने वाला क्षेत्र है जहाँ जाने का एकमात्र रास्ता पानी से होकर जाता है इसलिए बेट द्वारिका से बाहर जाने के लिए लोग नाव का प्रयोग करते हैं यहाँ द्वारिकाधीश का प्राचीन मंदिर स्थित है कहते हैं कि 5 हजार साल पहले यहाँ रुक्मिणी ने मूर्ति स्थापना करी थी...!!
समुद्र से घिरा यह टापू बड़ा शांत रहता थालोगो का मुख्य पेशा मछली पकड़ना था धीरे धीरे यहाँ बाहर से मछली पकड़ने वाले मुस्लिम आने लगे दयालु हिन्दू आबादी ने इन्हें वहाँ रहकर मछली पकड़ने की अनुमति दे दी धीरे धीरे मछली पकडने के पूरे कारोबार पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया बाहर से फंडिंग के चलते इन्होंने बाजार में सस्ती मछली बेची जिससे सब हिन्दू मछुआरे बेरोजगार हो गये अब हिन्दू आबादी ने रोजगार के लिए टापू से बाहर जाना शुरू किया लेकिन यहां एक और चमत्कारी प्रयोग हुआ बेट द्वारिका से ओखा तक जाने के लिए नाव में 8 रुपये किराया लगता था अब क्योंकि सब नावों पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया था तो उन्होंने किराये का नया नियम बनाया जो हिन्दू नाव से ओखा जायेगा वह किराये के 100 रुपये देगा और मुस्लिम वही 8 रुपये देगा अब कोई दिहाड़ी हिन्दू केवल आवाजाही के 200 रुपये देगा तो वह बचायेगा क्या....??
इसलिए रोजगार के लिए हिन्दुओ ने वहाँ से पलायन शुरू कर दिया अब वहाँ केवल 15 प्रतिशत हिन्दू आबादी रहती है रोजगार के 2 मुख्य साधन मछली पकड़ने का काम और ट्रांसपोर्ट दोनो हिन्दुओ से छीन लिया गया जैसे बाकी सब जगह राज मिस्त्री, कारपेंटर, इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री, ड्राइवर, नाई व अन्य हाथ के काम 90% तक हिन्दुओ ने उनके हवाले कर दिये हैं...!!
अब बेट द्वारिका में तो 5 हजार साल पुराना मंदिर है जिसके दर्शन के लिए हिन्दू जाते थे तो इसमें वहां के जिहादियों ने नया तरीका निकाला क्योंकि आवाजाही के साधनों पर उनका कब्जा हो चुका था तो उन्होंने आने वाले श्रद्धालुओं से केवल 20-30 मिनट की जल यात्रा के 4 हजार से 5 हजार रुपये मांगने शुरू कर दिये इतना महंगा किराया आम व्यक्ति कैसे चुका पायेगा इसलिए लोगो ने वहां जाना बंद कर दिया अब जब वहाँ पूर्ण रूप से जिहादियों की पकड़ हो गई तो उन्होंने जगह जगह मकान बनाने शुरू किये, देखते ही देखते प्राचीन मंदिर चारों तरफ से मजारों से घेर दिया गया वहाँ की बची खुची हिन्दू आबादी सरकार को अपनी बात कहते कहते हार चुकी थी, फिर कुछ हिन्दू समाजसेवियों ने इसका संज्ञान लिया और सरकार को चेताया सरकार ने ओखा से बेट द्वारिका तक सिग्नेचर ब्रिज बनाने का काम शुरू करवाया बाकी विषयो की जांच शुरू हुई तो जांच एजेंसी चौंक गई....!!
गुजरात में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका स्थित बेट द्वारिका के दो टापू पर अपना दावा ठोका है वक्फ बोर्ड ने अपने आवेदन में दावा किया है कि बेट द्वारका टापू पर दो द्वीपों का स्वामित्व वक्फ बोर्ड का है गुजरात उच्च न्यायालय ने इस पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि कृष्ण नगरी पर आप कैसे दावा कर सकते हैं और इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया बेट द्वारका में करीब आठ टापू है, जिनमें से दो पर भगवान कृष्ण के मंदिर बने हुए हैं...!!
प्राचीन कहानियां बताती हैं कि भगवान कृष्ण की आराधना करते हुए मीरा यहीं पर उनकी मूर्ति में समा गई थी बेट द्वारका के इन दो टापू पर करीब 7000 परिवार रहते हैं, इनमें से करीब 6000 परिवार मुस्लिम हैं यह द्वारका के तट पर एक छोटा सा द्वीप है और ओखा से कुछ ही दूरी पर स्थित है वक्फ बोर्ड इसी के आधार पर इन दो टापू पर अपना दावा जताता है यहां अभी इस साजिश का शुरुआती चरण ही है कि इसका खुलासा हो गया सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इस चरण में कुछ लोग, ऐसी जमीनों पर कब्जा करके अवैध निर्माण बना रहे थे जो रणनीतिक रूप से भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता था अब जाकर सब अवैध कब्जे व मजारें तोड़ी जा रही हैं...!!
माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी की कृपा से अब सी लिंक का उद्घाटन हो गया है, मुसलमानों के नौका यानि छोटे पानी के जहाज से यात्रा करवाने का धंधा भी चौपट होने जा रहा है...!!
बेट द्वारिका में आने वाला कोई भी मुसलमान वहाँ का स्थानीय नहीं है सब बाहर के हैं फिर भी उन्होंने धीरे धीरे कुछ ही वर्षों में वहां के हिन्दुओ से सब कुछ छीन लिया और भारत के गुजरात जैसे एक राज्य का टापू सीरिया बन गया....!!
सावधान व सजग रहना अत्यंत आवश्यक है ज्यादा से ज्यादा शेयर करें...!!
"राष्ट्रहित सर्वोपरि"
-आमोद सिंह की फेसबुक वॉल से साभार
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अभिनेता अनुपम खेर के तीखे सवाल सुनकर, सुप्रीम कोर्ट के "जजों" का माथा ठनका--.
11 मई से, "तीन तलाक" के मुद्दे की, सुनवाई के लिए, 5 जज़ों की टीम बैठी थीं.......!
सुनवाई के पहले ही दिन कोर्ट नें कहा था, कि :----अगर, "तीन तलाक" का मामला इस्लाम धर्म का हुआ .....तो, उसमें हम दखल नही देंगे....
इसपर बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर नें तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए, कहा :--ठीक है, माई लॉर्ड,
अगर आप- "धर्म" के मामले में दखल नही देना चाहते, तो :--जलीकट्टू, दही हांड़ी, गो हत्या, राम मंदिर जैसे :--- कई "हिंदुओ" के मामले हैं,
जिसमें आप बेझिझक दखल देते हैं.....।क्या - "हिंदू धर्म" आपको धर्म नही लगता ????? या फिर, आप मुसलमानों की धमकियों से डरते हैं ????? अगर आप कुरान में लिखे होनें से, तीन तलाक को मानते हैं ......तो :---
"पुराण" में लिखे, "राम के अयोध्या में पैदा होनें को" क्यों नही मानते????हमें भी बताइए, यह सिर्फ मैं, नही ......पूरा देश जानना" चाहता है।!!
गाय का मांस खाना या ,ना खाना उनकी मर्जी पर छोङ देना चाहिये ....लेकिन, सुअर का मांस वो नही खायेगें ....क्योंकि, ये उनके धर्म के खिलाफ है ???? शनि शिंगनापुर मंदिर में, महिलाओं काे, प्रवेश ना देना महिलाओं पर अत्याचार है .....
जबकि, हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश देना, या ना देना, उनके धर्म का आंतरिक मामला है ??? पर्दा प्रथा एक "सामाजिक बुराई" है .....लेकिन, बुर्का उनके "धर्म का हिस्सा" है ????
जल्लीकट्टू में, "जानवरों पर अत्याचार" होता है....लेकिन, "बकरीद" की "कुर्बानी", इस्लाम की शान है ???? दही हांडी एक खतरनाक खेल है ....
जबकि, इमाम हुसैन: की याद में, "तलवारबाजी" उनके धर्म का मामला है ???? शिवजी पर दूध चढाना ... "दूध की बर्बादी" है ....लेकिन मजारों पर चादर चढाने से मन्नतें पूरी होती है ????
हम दो हमारे दो... हमारा परिवार नियोजन है ....लेकिन, उनका- "कीङे-मकौङों" की तरह, बच्चे पैदा करना अल्लाह की नियामत है ??? भारत तेरे टुकङे होगें, ये कहना -अभिव्यक्ति की आजादी है ...
और इस बात से देश को कोई खतरा नही है....और वंदे मातरम कहने से, इस्लाम खतरे में, आ जाता है ????
सैनिकों पर पत्थर फैंकने वाले, भटके हुऐ नौजवान है .और अपने बचाव में, एक्शन लेने वाले सैनिक मानवाधिकारों के दुश्मन हैं????
एक दरगाह पर विस्फोट से हिन्दु आंतकवाद शब्द गढ दिया गया और जो रोजाना जगह जगह बम फोङतें है, उन आंतकवादियों का कोई धर्म ही नही है ????.
क्या हाल कर दिया है, दलाल मीडिया और सेकुलर जजों ने, हमारे देश का, .......यदि समाज से असमानता दूर करनी होतो समान भाव से देखना चाहिये ।
यदि आपको ये सही लगता हे तो कृपया इसे आगे रिपोस्ट कर दें अन्यथा इग्नोर कर दें ।
जय हिन्द, जय भारत.........🚩🚩🚩
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अभिनेता अनुपम खेर के तीखे सवाल सुनकर, सुप्रीम कोर्ट के "जजों" का माथा ठनका--.
11 मई से, "तीन तलाक" के मुद्दे की, सुनवाई के लिए, 5 जज़ों की टीम बैठी थीं.......!
सुनवाई के पहले ही दिन कोर्ट नें कहा था, कि :----अगर, "तीन तलाक" का मामला इस्लाम धर्म का हुआ .....तो, उसमें हम दखल नही देंगे....
इसपर बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर नें तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए, कहा :--ठीक है, माई लॉर्ड,
अगर आप- "धर्म" के मामले में दखल नही देना चाहते, तो :--जलीकट्टू, दही हांड़ी, गो हत्या, राम मंदिर जैसे :--- कई "हिंदुओ" के मामले हैं,
जिसमें आप बेझिझक दखल देते हैं.....।क्या - "हिंदू धर्म" आपको धर्म नही लगता ????? या फिर, आप मुसलमानों की धमकियों से डरते हैं ????? अगर आप कुरान में लिखे होनें से, तीन तलाक को मानते हैं ......तो :---
"पुराण" में लिखे, "राम के अयोध्या में पैदा होनें को" क्यों नही मानते????हमें भी बताइए, यह सिर्फ मैं, नही ......पूरा देश जानना" चाहता है।!!
गाय का मांस खाना या ,ना खाना उनकी मर्जी पर छोङ देना चाहिये ....लेकिन, सुअर का मांस वो नही खायेगें ....क्योंकि, ये उनके धर्म के खिलाफ है ???? शनि शिंगनापुर मंदिर में, महिलाओं काे, प्रवेश ना देना महिलाओं पर अत्याचार है .....
जबकि, हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश देना, या ना देना, उनके धर्म का आंतरिक मामला है ??? पर्दा प्रथा एक "सामाजिक बुराई" है .....लेकिन, बुर्का उनके "धर्म का हिस्सा" है ????
जल्लीकट्टू में, "जानवरों पर अत्याचार" होता है....लेकिन, "बकरीद" की "कुर्बानी", इस्लाम की शान है ???? दही हांडी एक खतरनाक खेल है ....
जबकि, इमाम हुसैन: की याद में, "तलवारबाजी" उनके धर्म का मामला है ???? शिवजी पर दूध चढाना ... "दूध की बर्बादी" है ....लेकिन मजारों पर चादर चढाने से मन्नतें पूरी होती है ????
हम दो हमारे दो... हमारा परिवार नियोजन है ....लेकिन, उनका- "कीङे-मकौङों" की तरह, बच्चे पैदा करना अल्लाह की नियामत है ??? भारत तेरे टुकङे होगें, ये कहना -अभिव्यक्ति की आजादी है ...
और इस बात से देश को कोई खतरा नही है....और वंदे मातरम कहने से, इस्लाम खतरे में, आ जाता है ????
सैनिकों पर पत्थर फैंकने वाले, भटके हुऐ नौजवान है .और अपने बचाव में, एक्शन लेने वाले सैनिक मानवाधिकारों के दुश्मन हैं????
एक दरगाह पर विस्फोट से हिन्दु आंतकवाद शब्द गढ दिया गया और जो रोजाना जगह जगह बम फोङतें है, उन आंतकवादियों का कोई धर्म ही नही है ????.
क्या हाल कर दिया है, दलाल मीडिया और सेकुलर जजों ने, हमारे देश का, .......यदि समाज से असमानता दूर करनी होतो समान भाव से देखना चाहिये ।
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शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई....??
और अब सनातन संस्कृति के लोग खुद ही शिवलिंग को शिव् भगवान का गुप्तांग समझने लगे है और दूसरों को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं। परन्तु सही तथ्यों को जानना बहुत जरूरी है...कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं...छोटे छोटे बच्चों को बताते हैं कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते हैं । उनको संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है और अपने बच्चों को सनातन संस्कृति के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है । इसे देववाणी भी कहा जाता है। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है जबकी जनेन्द्रिय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है..शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक..इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक..अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग” के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए? शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत। शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता । दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों यवनों के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में Mगलों और षडयंत्रKaरी अंग्रेजों के द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ है ..जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं, उदाहरण के लिए यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो सूत्र का मतलब डोरी/धागा गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि ।
उसी प्रकार “अर्थ” शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब, आशय, अभिप्राय (मीनिंग) भी ..ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय, चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है । धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है।तथा कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam) ...ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं: ऊर्जा और प्रदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। विज्ञान का भी यही सिद्धांत है e=mc२....इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं। ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.
The universe is a sign of Shiva Lingam
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी है। अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान हैं। अब बात करते है योनि शब्द पर- मनुष्ययोनि, पशुयोनी, पेड़-पौधों की योनी, जीव-जंतु योनि.....योनि शब्द का संस्कृत में प्रादुर्भाव, प्रकटीकरण अर्थ होता है....जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है नासमझ बेचारे। इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनि बताई जाती है।यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रकार के जीव (पेड़, कीट, जानवर, मनुष्य आदि) है।
#मनुष्य_योनि ...पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है।अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। तो कुल मिलकर अर्थ यह है:- लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक, दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई , बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं । हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके । लेकिन कुछ विकृत मुग़ल काल व गंदी मानसिकता बाले गोरे अंग्रेजों के गंदे दिमागों ने इस में गुप्तांगो की कल्पना कर ली और झूठी कु त्सित कहानियां बना ली और इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया ...आज भी बहुतायत हिन्दू इस दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ है। हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित है।जोकि हमारे पूर्वजों ,संतों ,ऋषियों-मुनियों तपस्वीयों की देन है।आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अदभुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर रिसर्च कर रहा है...
ऊं नम: शिवाय, हर- हर महादेव 🔱💖😌🙏🕉️
कान्वेंट शब्द पर गर्व न करें...
सच समझें कॉन्वेंट का मतलब क्या है?
‘काँन्वेंट’ ! सब से पहले तो यह जानना आवश्यक है कि, ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।
ब्रिटेन में एक कानून था, " लिव इन रिलेशनशिप " बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।
अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज हैं , उनके लिए ये काँन्वेंट बने।
उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयो में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है ना ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज।
इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन् 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और
भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था।
परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।
जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था,
इसी कानून के तहत भारत में
कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वो लिखता है कि
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे।
इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में भी कुछ पता नहीं होगा।
इनको अपने मुहावरे ही नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”
उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा।
अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म हो, दूसरों पर क्या असर पड़ेगा ?
लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”।
दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है?
शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे।
ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी।
अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।
भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए…
जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं।
आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे- "बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल", माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल"।
अब इन मूर्खो को कौन समझाए कि, भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना?
दुर्भाग्य की बात यह है कि, जिन चीजों का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने वो सभी चीज़ों को पोषित और संचित किया फिर भी हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलाम सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।
आइए आगे से जब भी हमसे कोई आश्रय कॉन्वैंट स्कूल की बात कहेगा या करेगा तो उसे उपरोक्त तथ्यों से परिचित अवश्य कराएंगे।
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इस्लामिक रीति रिवाज हिन्दुओ के उलटे क्यों ?
चूँकि मुहम्मद साहब खुद हिंदु थे,उनका पूरा खान्दान भी हिंदु था इसलिए उन्होंने जब अपना नया मुसलमान धर्म बनाया तो अपने सारे नियम-कानून हिंदु-धर्म के विपरीत कर दिया उन्होंने,भले ही वो मानवता के अहित में ही क्यों ना हो.कुछ तो उन्होंने किया और कुछ तो अपने-आप हो गए.कुछ नियम तो काफी हास्यास्पद भी हैं लेकिन उनपर ईस्लाम को हिंदु से श्रेष्ठ साबित करने का इतना जुनून सवार था कि सारी सीमाएँ ही तोड़ते चले गए वो..इसलिए सिर्फ मर्यादाओं को तोड़ना ही इस्लाम धर्म का उद्देश्य बनकर रह गया.नियम को उल्टा करने का एक प्रमुख कारण उनका डर भी था.चूँकि वो जन्मजात हिंदु थे इसलिए अपने आप को हिंदु से अलग साबित करने के लिए पूर नियम ही उल्टा कर दिया.
अब कुछ बिन्दुओं पर दृष्टिपाद करिए और अंदाज लगाईए कि कितने विपरीत है दोनों धर्म.-
{{क}} पुराण और कुराण -सबसे पहले धर्म-ग्रंथों के नाम ही बिल्कुल उल्टे हैं और यहीं से सब कुछ उल्टा होना शुरु हुआ..अब स्पष्ट है कि अच्छा का उल्टा करना हो तो बुरा ही करना पड़ेगा कुछ और तो कर नहीं सकते.इस कारण जो थोड़ी बहुत बुराईयाँ थीं हिंदु धर्म में वो तो अच्छाई बनकर इनके धर्म में आ गई पर हिंदु धर्म अच्छाईयों से भरी पड़ी थीं इसलिए उसको उल्टा करने के चक्कर में बुराईयों से भर लिया इन्होंने अपने धर्म-ग्रंथों को..ध्यान दीजिए कि "कु" उपसर्ग हमेशा किसी धातु को बुरा बनाने के लिए लगया जाता है जैसे रुप का कुरुप,कुकर्म,समय का कुसमय,इसी प्रकार कुलंगार,कुलच्छिणी,कुसंगत आदि.
विचार तो उल्टे हैं ही इनके सारे रीति-रिवाज और क्रिया-कलाप भी उल्टे--
हिंदु लोग अपने बच्चे का जन्म के ३ साल पश्चात मुण्डन संस्कार करवाते हैं जिसमें सर के अशुद्ध बाल को छीलकर उसे साफ कर देते हैं लेकिन ये अपने तीन साल के बच्चे का लिंग छीलकर छिलन-संस्कार करते हैं जिसमें स्वच्छ त्वचा को हटा दिया जाता है जो बच्चे के कोमल लिंग की रक्षा करने के लिए होता है वहाँ पर,और लिंग को खुला छोड़ दिया जाता है गंदा होते रहने के लिए.यहीं से मुस्लिम बच्चों के अंदर मार-काट और कुंठा की भावना का जन्म होता है..ये बात इतनी छोटी नहीं है जितने प्रतीत होती है.ध्यान देने वाली बात ये है कि हिंदुओं का ध्यान शरीर के मस्तिष्क यानि सबसे उपरी भाग पर केंद्रित होता है जिसके कारण वो उन्नति के मार्ग पर अग्रसर रहते हैं जबकि मुस्लिमों का ध्यान शरीर के सबसे निचले भाग लिंग पर केंद्रित होती है जिस कारण ये अवनति के पथ पर अग्रसर रहते हैं..हिंदु अपने मन को शुद्ध-पवित्र कर अपने ध्यान को एक बिंदु पर केंद्रित करने लायक बनाते हैं ताकि वो आत्म-साक्षात्कार कर सके पर हमारे मुसलमान भाई अपना सारा ध्यान संभोग पर ही केंद्रित रखते हैं और सारा जीवन संभोग करते-करते और बच्चे पैदा करते-करते ही बिता देते हैं..सुना है इनके पैगम्बर साहब भी संभोग करते-करते ही मर गए थे..और इन्हें जिस स्वर्ग का लालच देकर आत्म-घाती बम तक बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है उस स्वर्ग में भी इन्हें संभोग और मांस-भक्षण का ही लालच दिया जाता है..
कितना विशाल अंतर है दोनों धर्मों में -जहाँ हिंदु धर्म में शारीरिक सुख त्याज्य,घृणा और सबसे निचले स्तर का सुख है वहीं मुसलमान भाईयों के लिए यह परम और अंतिम सुख है.हिंदुओं की बातें स्वर्ग और नर्क से शुरु होती हैं पर मुस्लिम भाईयों की बातें यहीं आकर खत्म हो जाती हैं...
हिंदु अगर सूक्ष्म बातों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो ये स्थूल बातों पर..हिंदु अगर मानसिक और आत्मिक सुख की बात करते हैं तो ये शारीरिक सुख की...
चलिए सूक्ष्म बातें बहुत हो गई अब कुछ स्थूल बातें करते हैं......
{{ग}}हिंदु मर्द मूँछों को अपनी शान समझते हैं इसलिए उसे बढ़ाते हैं तथा दाढ़ी को साफ कर देते हैं पर हमारे मुसलमान भाई मूँछों को ही साफ कर देते हैं तथा दाढ़ी को शान समझकर रख लेते हैं ..यहाँ भी मैं यही कहूँगा कि इन्होंने निचले भाग को प्राथमिकता दी..
{{घ}}हिंदु गौ-पूजा करते हैं पर ये गायों को हत्या करते हैं वो भी बकरीद के दिन..क्योंकि बकरीद अर्थात बकर+ईद.अरबी में गाय को बकर कहा जाता है और ईद का अर्थ पूजा होता है.ईद संस्कृत शब्द ईड से बना है जिसका अर्थ पूजा होता है..अब बताइए जिस दिन इन्हें गाय की सेवा करके पुण्य प्राप्त करना चाहिए उस दिन ये गाय की हत्या करते हैं..
{{ङ}}हिंदुओं के लिए स्वच्छता का अर्थ जहाँ पूरे शरीर की शुद्धि के साथ-साथ मन की शुद्धि होती है वहीं इनके लिए शुद्धता का अर्थ सिर्फ लिंग को पेशाब करने के बाद मिट्टी के ढेले या ईंट के टुकड़े से घिस लेने भर से है और ध्यान देने वाली बात ये है कि ये मिट्टी के ढेले या ईंट के टुकड़े बहुत ही गंदे होते हैं क्योंकि ये पेशाब करने के जगह के आस-पास से ही उठाए जाते हैं...जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि इनका पूरा ध्यान जीवन भर सिर्फ लिंग पर ही केंद्रित होता है इस बात का ये बहुत ही हास्यास्पद और दुःखद उदाहरण है कि इनकी नजर में हिंदु नापाक और मुसलमान पाक होते हैं सिर्फ इसलिए कि मुसलमान पेशाब के बाद लिंग को मिट्टी से घिस लेते हैं और हिंदु नहीं घिसते इसलिए..बाँकी ये पखाने के बाद अपने गुदा को ना भी धोयें तो कोई बात नहीं,गुदा अगर धो भी लिया है तो हाथ को मिट्टी या साबुन से नहीं भी धोयें तो कोई बात नहीं,सप्ताह भर ना भी नहायें तो कोई बात नहीं--ये पाक हैं क्योंकि अपने लिंग को मिट्टी से घिसते हैं पर हिंदु बाँकी कोई भी स्वच्छता अपना ले वह नापाक है सिर्फ इसलिए कि उसने पेशाब के बाद अपना लिंग नहीं घिसा...कितनी मूर्खताभरी बातें हैं ये..
एक और बातें मुझे एक व्यक्ति ने बताई थी जो भौतिकी के बहुत ही विद्वान शिक्षक तो थे ही एक बहुत ही अच्छे तथा समझदार इंसान थे..वो वजू के बारे में बता रहे थे कि शुद्ध होने के लिए ठेहुने से नीचे पैर को धोना चाहिए,केहुनी से नीचे के हाथ वाले भाग को और गर्दन से उपर वाले भाग को.बस हो गए तैयार नवाज पढ़ने के लिए..यहाँ तक तो ठीक है लेकिन इसके बाद जो उन्होंने कहा उस बात पर मैं अपने आपको हँसने से नहीं रोक सका..आगे उन्होंने कहा कि अगर अपानवायु छूट जाय तो वजू टूट जाता है और उसके बाद फिर से ये उपर बताई गई विधि अपनानी होगी..अब बताईए हवा अगर कमर के नीचे से निकले तो उससे ठेहुना के नीचे पैर वाला हिस्सा और केहुनी के नीचे का हाथ वाला हिस्सा धोने का क्या तुक बनता है.....
अफसोस कि ऐसी बेतुकी बातें ईश्वरीय वाणी कहलाती हैं..।।
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ब्राम्हणों को सबसे पहले यह बात समझनी चाहिए कि भगवान परशुराम बाल ब्रम्हचारी थे। जिनका विवाह ही नहीं हुआ था, तो उनका वंशज होने जैसा कोई सवाल ही नहीं है।
ठीक इसी प्रकार यादव भाइयों को भी यह बात समझने की जरूरत है कि भगवान श्रीकृष्ण का पूरा वंशज ही गांधारी के श्राप से नष्ट हो गया था, तो आज किसी कृष्ण वंश के होने का कोई सवाल नहीं है।
दोनों ही अवतार भगवान विष्णु के हैं और दोनों पूजनीय । समस्त सृष्टि उनकी रचना है और सभी के सभी उन्हीं नारायण हरि के पुत्र। तो इसलिए यह मामला यहीं खत्म हो जाना चाहिए। क्योंकि हर कोई उसी परमपिता परमेश्वर का वंशज और अंश है।
फिर भी अगर कुछ लोगों को भगवान के अवतारों में जाति खोजने की चूल मची है तो उन्हें फैक्ट से रूबरू होना चाहिए कि इन दोनों के वंशज होने का वास्तविक मामला क्या है?
भगवान परशुराम भृगुवंशीय जमदग्नि ऋषि के पुत्र थे, जो भृगु ऋषि के वंशज थे और माता रेणुका क्षत्रिय थीं। इसलिए परशुराम में ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों के गुण थे।
भले ही परशुराम ने विवाह नहीं किया, लेकिन उनके धार्मिक और आध्यात्मिक प्रभाव के कारण ब्राह्मण समुदाय उन्हें अपने वंशज के रूप में मानता है।
स्पष्ट है कि ब्राह्मण परशुराम को अपना पूर्वज इसलिए नहीं मानते कि उनकी उत्पत्ति परशुराम की पत्नी से हुआ था, जो थीं भी नहीं। बल्कि इसलिए मानते हैं कि तब परशुराम का प्रभाव था और वे भृगु वंश के थे। बात परशुराम जी के प्रभाव का ही है।
वास्तविकता यह है कि परशुराम के चार बड़े भाई रुक्मवान, सुषेण, वसु और विश्वावसु थे। उनकी पत्नी भी थीं और पुत्र भी।
उनके प्रभाव के कारण ही परशुराम के उन्हीं भाइयों के पुत्र अन्य लोगों से यह कहते थे कि हम फला खानदान से आते हैं और चाचा परशुराम हैं हमारे, जैसे आज के वक्त में विधायक का भतीजा कहता है कि - चाचा विधायक हैं हमारे।
ब्राह्मण इसलिए परशुराम का वंशज नहीं कहा जाता कि उनके पूर्वजों ने परशुराम की पत्नी के गर्भ से जन्म लिया था। बल्कि इसलिए कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में भृगु वंश के ब्राह्मणों के यहां जन्म लिया था। thats it..
ठीक यही घटना कृष्ण के साथ की भी है। जहां भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में चंद्रवंशियों के यहां जन्म लिया था और ग्वालों के घर बाबा नन्द और मैया यशोदा के सरंक्षण में पले बढ़े। क्योंकि उनकी जान को खतरा उनके ही सगे चंद्रवंशी मामा कंस से था, जो पहले ही उनके 7 भाइयों और बहनों को मौत के घाट उतार चुका था।
कृष्ण ने भी बाद में कंस का वध कर दिया। पर ध्यान रहे कंस की मौत के बाद भी मथुरा का राजा वे नहीं बने। बल्कि कंस के ही पिता यानी उग्रसेन को बनाया। जिनका संतान केवल कंस ही नहीं, बल्कि बेटे न्यग्रोध, सुनामा, कंक, शंकु, अजभू, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और सुमुष्टिद आदि भी थे। तो पुत्री कंसा, कंसवती, सतन्तू, राष्ट्रपाली और कंका भी थीं।
उग्रसेन के उन बेटों की अपनी अपनी पत्नी और पुत्र भी थी और आज भी जरूर कहीं न कहीं होंगे? अगर परशुराम और राम का वंशज होने का दावा करने वाले लोग आज भी है। तो कंस का वंशज होने का दावा कितने लोग करते हैं,,,,? शायद एक भी नहीं।
सिम्पल सा जवाब है इसका। परशुराम की ही तरह, श्रीकृष्ण जी का भी प्रभाव । लोग उन्हीं से अपने को जोड़ेंगे। जो प्रभावशाली थे। उनसे नहीं, जो रगड़े गए थे। यहां चाचा भले विधायक ही नहीं। बल्कि केंद्रीय मंत्री ही हों। पर कोई नहीं कहता कि चाचा कंस विधायक या केंद्रीय मंत्री हैं हमारे।
श्रीकृष्ण का तो पूरा खानदान ही गांधारी के श्राप से नष्ट हो गया था। द्वारका भी कहीं समुद्र में डूब गई। पर तब भी सभ्यता पर प्रभाव सबसे ज्यादा कृष्ण का था। फिर उन पर दावा ठोकने वाले बचे कौन..?
साधारण सा जवाब है। वृन्दावन और नन्द गांव वाले ग्वाल। जो उनके बहुत नजदीक थे। जहां उन्होंने अपने बचपन की पूरी लीला रचाई। सबके प्रिय भी रहे।
मैया यशोदा .. जाने दो, उनके बारे में तो यह भी लिखने की हिम्मत नहीं होती कि ठाकुर जी का उनसे कोई रक्त संबंध नहीं था। यह प्रसंग पढ़ने पर तो मैं खुद भावुक हो जाता हूं, जब उनको पता चला कि कृष्ण की असली माता वो नहीं, देवकी हैं। कृष्ण को अब मथुरा जाना होगा।
पर बस यही कहूंगा कि अगर कोई ऐसा है जो कृष्ण से इतना प्यार करता हो, उनमें श्रद्धा रखता हो, ऐसा कोई ग्वाल बाल या व्यक्ति, जो किसी जाति धर्म का हो, जो कृष्ण में इतना विश्वास रखता हो तो मेरे लिए वही कृष्ण का वंशज है। क्योंकि भगवान का अंश हर एक में है।
बाकी कृष्ण के अन्य संबंध की बात की जाए तो यह केवल चंद्रवंश से ही नहीं, उनकी बुआ कुंती और बहन सुभद्रा से भी जुड़ती है, जो क्षत्रिय कुरु वंश की बहुएं थीं।
कुंती जहां पांडव की पत्नी थीं तो वहीं सुभद्रा पांडव पुत्र अर्जुन की पत्नी थीं। सुभद्रा वीर अभिमन्यु की माता तो कुंती युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की माता भी थी।
इसलिए कंस वंशज, ग्वाल वंशज और कुरु वंशज तीनों ही अपनी अपनी सुविधा अनुसार कृष्ण से अपना संबंध जोड़ने की कोशिश करते है और उनकी आपस में होड़ रहती है। पर नैरेटिव में ग्वालों का पलड़ा हमेशा भारी रहता है, जो स्वाभाविक भी है। that's it..
(वैसे मैने काशीनाथ सिंह का एक उपन्यास भी पढ़ा है, जिसका नाम "कृष्ण अंतिम दिनों में - उपसंहार" है। इसमें कृष्ण के महाभारत के बाद के दिनों को कथानक रूप दिया गया है। जिसमें उन्होंने लास्ट पेज में बताया है कि कृष्ण को जिस जरा नाम के बहेलिया ने तीर मारा था और जिसके लगने के बाद कृष्ण रूप में अवतार लिए विष्णु स्वयं अपना शरीर त्याग कर वापस अपने बैकुंठ लोक चले गए थे। वो बहेलिया उनका ही भाई था।
उन्होंने इस कहानी में बताया है कि कृष्ण के पिता वासुदेव एक बार जंगल में शिकार करने गए थे। वहां उन्हें एक आदिवासी कन्या मिली, जिस पर उनका दिल आ गया और दोनों का संसर्ग हुआ। जिससे जरा का जन्म हुआ। जब कृष्ण के चमकते हुए पैर को उसने हिरण की कस्तूरी समझ तीर मारा, तो तीर लगने के बाद वह बहेलिया उनके पास आया और बहुत दुखी हुआ, तो कृष्ण ने उसका परिचय भी पूछा। जिसका उत्तर मिलने के बाद वे काफी प्रसन्न हुए और कहा, अभी उनका वंश नष्ट नहीं हुआ और भाई बचा है। वे मुस्कराए और फिर अपने धाम चले गए।
(हालांकि ध्यान रहे ये केवल एक उपन्यास की कहानी है, जो मै केवल उस पुस्तक में लिखी कहानी के अनुसार बता रहा।कई अन्य जगह पर भी जरा बहेलिया के माता पिता का नाम नहीं मिलता। इसके विपरीत कई साधु संत अक्सर कथा कहते हैं, जिनके अनुसार जरा पिछले जन्म में बाली था, जिसे राम ने पेड़ की आड़ में छिपकर मारा था। कृष्ण जन्म में उन्होंने खुद ही उसका पश्चाताप करने के लिए पेड़ के नीचे जरा यानी बाली की तीर की वजह से दोबारा अपने बैकुंठ धाम जाने का मार्ग चुना था।।)
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जय श्री कृष्ण
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वाल्मीकि नारद घट योनि, निज निज मुखनि कही निज होनी
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उपर्युक्त चौपाई के अनुसार वाल्मीकि और नारद ने खुद बतलाया है कि उनका जन्म घट योनि से हुआ था. घट योनि का क्या अर्थ? इसे समझने के लिए बौद्ध कवियों द्वारा तैयार वज्र सूची उपनिषद पढ़ लीजिये.
घट योनि का तात्पर्य है - अवैध संतति होने के कारण इनकी मां ने घट में डालकर इन्हें नदी में बहा दिया था या किसी पेड़ की जड़ के पास रख दिया था. बच्चे का रुदन सुन कोई दूसरा व्यक्ति इन्हें उठाकर अपने घर ले आया था और पाल पोसकर बड़ा किया था.
मैं जानता हूँ कि लोग क़ाबिलियत छाँटने आ जायेंगे कि कुम्भज संज्ञा सिर्फ अगस्त्य की थी. लेकिन अगस्त्य कंभुज् (कं=जल, भुज् =भक्षण करने वाले ) कहलाते थे, कुम्भज नहीं जैसा प्रचारित किया जा रहा है.कुम्भज शब्द सभी अवैध संततियों का द्योतक था.
रामायण के रचयिता थे वाल्मीकि.विरोधी यहीं तक नहीं रुके. उन्होंने आगे व्याख्या की - वाल्मीकि का बचपन का नाम रत्नाकर था. बड़ा होकर यह व्यक्ति डाकू बन गया. तब नारद के उपदेश से इसका ह्रदय परिवर्तन हुआ. इसके बाद अपना पाप कटवाने के लिए इसने तपस्या शुरू की. तपस्या में इतना लीन हो गया कि दीमक ने इसके शरीर पर मिट्टी की बाम्बी बना दी थी. इसीलिए इसका नाम वाल्मीकि हुआ था.
भारत में गप्पियों की कभी कमी नहीं रही है. किसी जिन्दा मनुष्य के शरीर में दीमक लग जायेंगे - यह सम्भव ही नहीं है.दीमक को नमीदार दरार,, अंधेरा, 25°c से कम तापक्रम और भींगी लकड़ी चाहिये.मनुष्य के शरीर का तापक्रम 37°c होता है. इस तापक्रम पर दीमक जिन्दा ही नहीं रह सकता, न ही रानी दीमक प्रजनन कर सकती है. अतः वाल्मीकि के शरीर पर दीमक की बाम्बी बनने की बात पूरी तरह गलत है. वैसे, वाल्मीकि लैटिन मूल का है जो कहीं worm है, कहीं wurmiz और इसका अर्थ कीड़ा होता है.
प्रश्न है - वाल्मीकि नाम क्यों पड़ा? तो बंधु, वाल्मीकि शब्द आर्माइक( Aramaic ) का बिगड़ा रूप है.Seleucid empire के अंतर्गत जनता की भाषा Aramaic ही थी.इसी साम्राज्य में सिकंदर की विजय गाथा Aramaic भाषा में Romans के नाम से लिखी गयी थी.Aramaic कवि को ही वाल्मीकि कवि कहा गया था.
Seleucid empire की नींव Alexander the Great के Diadochi सेल्युकस ने रखी थी.संस्कृत में diadochi को ही दधीचि लिखा जा रहा है.
भारतीय पुराण कहते हैँ कि देवासुर संग्राम में देवों की जीत के लिए दधीचि ने अपने शरीर को हड्डी का ढांचा बना लिया था. यह देवासुर संग्राम Greco -Persian War ही था. इसमें विष का सेवन करने वाले शिव Socrates थे जिन्होंने किसी भी मनुष्य को पोप यानी ईश्वर का स्पोक्सपर्सन (spokes person ) मानने से इंकार कर दिया था. उनके अनुसार लोगों को आपस में बात करके ही सही और गलत का निर्णय करना चाहिए.उसने इसे Logus या Talk का नाम दिया. भारत में Talk की जगह तर्क शब्द लोकप्रिय हुआ.सुकरात को जहर देकर मारने का प्रयास हुआ था.
पोप संप्रदाय तर्क का विरोधी था. रामायण में इसे ही सुकेतु की पुत्री ताड़का कहा गया है. सुकेतु यानी सोक्रेट्स और ताड़का यानी तर्क विद्या या तर्क वेद.कहते हैँ कि रामचंद्र ने ताड़का वध किया था. वस्तुतः वेद (ज्ञान ) को वध कहा जा रहा है.विश्वामित्र ने रामचंद्र को तर्क वेद में पारंगत बनाया था और इसी विद्या के द्वारा वे मन में पैदा होने वाले शक शुब्हा का निराकरण करते थे.यह था सुबाहु(शुब्हा ) का सौ योजन दूर फेंका जाना.
इस तरह कवि वाल्मीकि डोम जाति के नहीं आर्माइक भाषा के कवि थे. उन्होंने किसी भारतीय रामचंद्र की नहीं, अलेक्जेन्डर की विजय गाथा लिखी थी. यह गाथा दो तेतरों के बीच हुए युद्ध की गाथा थी. दो तेतर यानी अलेक्जेन्डर तृतीय और डेरियस तृतीय. दो तेतर यानी तेतर युग जिसे अब त्रेता युग कहा जा रहा है .
जय श्रीकृष्ण
साभार -
रिटायर्ड आई पी एस सुधी की फेसबुक वाल से
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प्रस्तुति- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
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