Rajeev Namdeo Rana lidhorI

बुधवार, 12 अगस्त 2026

'अनुश्रुति' बुंदेली त्रैमासिक ई पत्रिका (टीकमगढ़) अंक-(20) जुलाई -सितंबर-2026 संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

'अनुश्रुति' बुंदेली त्रैमासिक ई पत्रिका (टीकमगढ़)
 अंक-(20) जुलाई -सितंबर-2026
 संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

1 टिप्पणी:

Lakhan lal pal ने कहा…

अनुश्रुति त्रैमासिक ईपत्रिका का जुलाई-सितंबर 2026 अंक बुंदेली बोली में प्रकाशित हुआ है। इसके संपादक आदरणीय राजीव नामदेव 'राना लिधौरी' जी है। बुंदेली लोकगीतों की विभिन्न विधाओं की रचनाओं का चयन उत्कृष्ट है।
इस अंक में प्रदीप खरे 'मंजुल' जी के दोहे, शोभाराम दांगी जी की कजरी, भगवान सिंह लोधी जी की रचना 'तरां तरइयां' पाठक को लुभाती हैं।
रचनाएं अच्छी है पर इन रचनाओं में एकाध जगह 'श' का प्रयोग जायका बिगाड़ देता हैं। साहित्यकारों को भाषा विज्ञान की ओर भी ध्यान देना चाहिए। लोकबोलियों के साहित्य में श, क्ष, ज्ञ, श्र,ण आदि अक्षरों का प्रयोग नहीं होता है। इनके स्थान पर अन्य अक्षर प्रयोग में लाए जाते हैं। बुंदेली, अवधी,ब्रज आदि बोलियों में उपर्युक्त अक्षर वर्जित है।
सियाराम अहिरवार की रचना 'सावन सैरौ' बुंदेली लोकधुन पर आधारित है। अगर मैं भूल नहीं रहा हूं तो यह धुन लमटेरा वाली है। प्रमोद मिश्र की चौकड़िया 'पढ़ लो' उपदेश के साथ हास्य उत्पन्न करती है।
अनवर खान साहिल जी की बुंदेली गजल -
"एक दो पूरा चारौ हो रओ..."
बहुत उम्दा ग़ज़ल है। ऐसी ग़ज़लें बुंदेली को समर्थ बनाने में बहुत सहायक है।
राना लिधौरी' जी हाइकु में सिद्धहस्त हैं। इनके हाइकु नवोदित साहित्यकारों के लिए पाठशाला से कम नहीं है।
संपादकीय पर बात किए बिना समीक्षा अधूरी रह जाएगी। आपने संपादकीय के माध्यम से साहित्यकारों के लिए तथा बुंदेली को बढावा देने के लिए कुछ टिप्स दिए हैं। कुछ शिकवे शिकायतें भी है। मुझे लग रहा है कि अब समझावन को छोड़कर संपादकीय का एक विषय होना चाहिए जिस पर पूरा लेख उसी पर केंद्रित रहे। पत्रिका प्रौढ़ हो चुकी है, तो संपादकीय लेख भी इसी स्तर के होने चाहिए।
समग्र रूप से देखा जाए तो पत्रिका का यह अंक अच्छा बन पड़ा है।
पत्रिका के संपादक एवं रचनाकारों को मेरी ओर से बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🌹