मंगलवार, 11 मार्च 2014

राजीव नामदेव 'राना लिधौरी व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान

व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान राजीव नामदेव 'राना लिधौरी व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान
                               ( राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)

                                   
                                           
                आज भारत में नेता धरती के 'कलयुगी भगवान बन गये है या चमचों द्वारा बना दिये गये है, बात एक ही हैं. यह कलयुगी भगवान अपने सभी अच्छे-बुरे काम पैसों की दम पर कर-करा लेतेदेते 
हैं.और जो कुछ विशेष काम पैसों की दम पर नहीं होते, उन्हें वे अपने पाले गये चमचों एवं गुण्ड़ों आदि से कुछ अन्य विशेष प्रकार के तरीकों से करा लेते देते हैं. ये कलयुगी भगवान धन एवं अपने चमचों की अधिक संख्या (बहुमत) के प्रभाव से 'इन्द्रासन की तरह 'कुर्सासन को पाने के लिए सभी प्रकार के दाँव-पेंच अपनाते है एवं अंतत: 'कुर्सासन पाकर या हथियाकर ही दम लेते  हैं.
                अपने नेता काल को जो लगभग पाँच साल का होता है जिससे सिद्ध भी होता  हैं नेता काल है, जिसमें किये गये हज़ार झूठे वायदों में से दो-तीन जो धोखे से या र्इश कृपा से पूरे हो जाते है या किसी अन्य के द्वारा पूरे कर दिये जाते है लेकिन वह इसका श्रेय अपने ऊपर लेने से नहीं चूकते हैं. आगामी चुनाव के समय ये इन कथित कामों का जिक्र इतना बढ़ा-चढ़ाकर करते है अपनी स्वप्रशंसा करने के मौके कभी भी नहीं चूकते चमचों द्वारा भी करवाते रहते है.  गाँवों की मासूम जनता पर इसका असर शीघ्र पड़ जाता है वह उसे सच ही मान लेती है कहा भी गया है कि यदि 'सौ बार झूठ बोलों तो वह सच मान लिया जाता है. इन्हीं की दम पर वह पाँच साल बाद पुन: आगामी चुनाव में 'कुर्सासन पाने के लिए प्रयासरत रहते हैं. जो कार्य प्रारंभ करते  हैं. उन्हें अधूरा जानबूझकर छोड़कर आगामी काल में पूर्ण करने हेतु वोट माँगते हैं,
                ये कलयुगी भगवान काम तो 'रावण का करते है, किन्तु समझते है या प्रदर्शित करते है अपने आप को भगवान 'राम के समान. भाली भाली जनता को गुमराह करके झूठे वायदे एवं लालच देकर चुनाव के समय उन्हें खुश करने के लिए और अपना उल्लू सीधा करने के लिए अर्थात वोट झटकने के लिए वे उन्हे कुछ विशेष प्रकार के प्रसाद देते भी देते हैं,  प्रसाद उनकी हैसियत के हिसाब से या घर में उनके वोटरों की संख्या के आधार पर दिया जाता है. कुछ प्रमुख शैतानी प्रसाद तो चुनाव के समय लगभग सभी को आसानी से प्राप्त हो जाते है जैसे-कंबल,शराब एवं पैसा आदि. कुछ नेता अपने घर में या कार्यालय में ही भंडारा एवं मधुशाला खेल लेते  हैं,  ये खुली हुर्इ अवैध मधुशालाएँ आबकारी विभाग, पुलिस विभाग, चुनाव विभाग के अधिकारियों को दिखार्इ नहीं देती, क्योंकि उनकी आँखों में रिश्वत की पटटी बाँध दी जाती हैं या उस काल के प्रभाव से उनकी नज़र जाती रहती हैं.
                एक बार के एक चुनाव में दक्षिण भारत के एक कलयुगी भगवान ने वोटरों को रिझाने के लिए एक गाँव में प्रत्येक घर में एक-एक टी. व्ही. तक मुक्त में बाँट दी थीं. वर्तमान में सिम, मोबाइल,घड़ी, टयूबवैल, कर्जे का भुगतान भी प्रसाद रूप में बाँट देते हैं, परन्तु मज़े कि बात यह रही कि वे इतना अधिेक प्रसाद देने के बाद भी अपने भक्तों के वोट प्राप्त नहीं कर पाये और चुनाव हार गये.
                नेताओं के वोट माँगने या प्रसाद देने के तरीके भी भिन्न-भिन्न है. जैसे कुछ नेता हाथ-पाँव जोड़ कर या कुछ तोड़कर या तोड़ने की धमकी देकर भी वोट माँगते हैं. तो कुछ नेता कँंबल, भोजन, शराब, साड़ी,चाँदी के बिछियाँ, पायलें सौ, पाँच सौ एवं हज़ार तक के नोट आदि चुनाव के समय बाँटते फिरते दिख जायेगे. भले ही बाद में वे सूद समेत चंदे के रूप में उनसे कर्इ गुने अधिक (चक्रवृद्धि ब्याज) वसूल कर लेते हैं. कुछ बहुत ही चालाक किस्म के कलयुगी भगवान आपके प्रिय जैसे महिलाओं को पति की कसम, आदमी को उनके बेटों की कसमें रखाकर वोट हथियाने की कोशिश करते
हैं, खासकर गाँवों की भोली जनता उनके जाल में जल्दी फँस जाती हैं, और उन्हीं को अपना वोट देकर जिता भी देती हैं, क्योंकि हमारे यहाँ पर झूठी कसमें खाने से जिसकी भी कसम खायी या रखी या दी जाती है, उसको बहुत नुकसान होता है, ऐसा कहा एवं माना जाता है. गाँवों की वोटरी जनता भले ही झूठी कसमें भगवान के डर से न खाये, किन्तु इन्हीं झूठी कसमें खा-खाकर अदालतों में सैंकड़ों लोग अपराधी होते हुए भी छूट जाते हैं, सुना गया है कि अदालत, नेता, बाबू, सरकार, वकीलों एवं दुकानदारों की तो रोजी -रोटी ही इन झूठी कसमों के दम पर ही चलती हैं.
                      कुछ भी हो, लेकिन इन कलयुगी भगवान को, आज वो सभी सुख-सुविधाएँ इस धरती पर मिलती है,जो शायद इन्द्र को स्वर्ग लोक में भी न मिलती हो. ऊपर वाले असली भगवान तो दैत्य,राक्षस आदि से डरते भी
हैं ,लेकिन ये धरती के कलयुगी भगवान किसी से भी नहीं डरते। हाँ, चुनाव के समय जरूर कुछ समय के लिए ये जरूर अपने क्षेत्र के मतदाताओं से डरते है,लेकिन वे इन्हें प्रसन्न करने के विभिन्न तरीके भी जानते हैं. उन्हें अच्छी तरह से पता होता है कि कौन सा भक्त किस प्रकार के प्रसाद से प्रसन्न हो जायेगा और उसे अपने बस में करने का मंत्र उन्हें अच्छी तरह से आता है. वे उस मंत्र को अपने चेलों को अच्छी तरह से समझा एवं सिखा देते है. शिविर,कार्यशाला लगाकर ट्रेण्ड कर देते हैं. वे इस मंत्र का प्रयोग केवल पाँच वर्ष में ही चुनाव आने पर करते हैं और जीत कर या हारकर इन पाँच वर्षो तक वे अपने इन मंत्रों को सिद्ध करने में दुबारा लगे रहते हैं.
                                     राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
                                      संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
                                      अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
                                    शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
                                       पिन:472001 मोबाइल-9893520965
                                    E Mail-   ranalidhori@gmail.com
                                 Blog - rajeev rana lidhori.blogspot.com

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