Rajeev Namdeo Rana lidhorI

सोमवार, 26 जुलाई 2021

मगौरा (बुंदेली दोहा संकलन ई बुक)- संपादक- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)


                             मगौरा
                 (बुंदेली दोहा संकलन) ई_बुक
          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
                  
                            मगौरा
                 (बुंदेली दोहा संकलन) ई_बुक

          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
                                  
प्रकाशन-जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़
© कापीराइट-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

ई बुक प्रकाशन दिनांक 26-07-2021
        टीकमगढ़ (मप्र)भारत-472001
         मोबाइल-9893520965

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              अनुक्रमणिका-
01- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी' (टीकमगढ़)(म.प्र.)
02-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा(म.प्र.)
03हरि राम तिवारी 'हरि',खरगापुर,टीकमगढ़(म.प्र)
04-प्रदीप खरे 'मंजुल', टीकमगढ़ (मप्र)
05-राज गोस्वामी,दतिया (मप्र)
06-प्रभुदयाल श्रीवास्तव, टीकमगढ़,(म.प्र.)
07-संजय श्रीवास्तव, दिल्ली (मबई)
08-श्याम मोहन नामदेव,देरी, टीकमगढ़(म.प्र.)
09-अशोक पटसारिया,लिधौरा (टीकमगढ़) 
10- कल्याणदास साहू "पोषक",पृथ्वीपुर(निवाड़ी)(म.प्र.)
11- एस. आर. 'सरल', टीकमगढ़ (मप्र)
12- सुसंस्कृति सिंह, भोपाल (मप्र)
13- रामेश्वर गुप्त, 'इंदु', बड़ागांव,झांसी (उ.प्र.)
14-सीताराम तिवारी 'दद्दा', टीकमगढ़,(म.प्र.)
15-गुलाब सिंह यादव 'भाऊ', लखौरा टीकमगढ़
16- रामगोपाल रैकवार टीकमगढ़ मप्र
17-अवधेश तिवारी,छिन्दवाड़ा,(म.प्र.)
18- मनोज कुमार सोनी ,रामटोरिया
19- डॉ सुशील शर्मा, गाडरवाड़ा
20- डॉ रेणु श्रीवास्तव, भोपाल
21-राजेन्द्र यादव "कुँवर",कनेरा बडा मलहरा
22-परम लाल तिवारी,खजुराहो
23-रामानंद पाठक 'नंद', नैगुवा

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1-राजीव नामदेव "राना लिधौरी" , टीकमगढ़ (मप्र)


**राना बुंदेली दोहावली बिषय-मगौरा*

*1*

मूंग मगौरा भात है,
बसकारे में ऐन।
चटनी संगे खात है।
सूटे दिन अरु रैन।।
***

*2*

डढेलया फिर तेल के,
मिलत बजारे खूब।
बेइ मगौरा धर दये,
नहीं बिके दिन डूब।।
**26-7-2021

*@ राजीव नामदेव "राना लिधौरी" टीकमगढ़*
           संपादक "आकांक्षा" पत्रिका
जिलाध्यक्ष म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (मप्र)-472001
मोबाइल- 9893520965
Email - ranalidhori@gmail.com
Blog-rajeevranalidhori.blogspot.com
(मेरी उपरोक्त रचना मौलिक एवं स्वरचित है।)


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2-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा, टीकमगढ़ (मप्र)

     
       ##दोहे#
               #मगौरा#
                    #1#
गयीं मगौरा छानबे,गौरा शिव के संग।
गौरा खाबें मगौरा,शिव जी छानें भंग।।
                    #2#
बनत मगौरा मूंग सें, हो सरसों का तेल।
फूली दार पिसाय कें,करौ मसाले मेल।।
                    #3#
पैलौ अक्षर काट दो,गौरा बनें सुजान।
मध्य अक्षर खों मार दौ,मर होबै बेजान।।
                    #4#
खांय मगौरा मगन रँय, बूढ़े वारे ज्वान।
बरा संग में बुझा दो,हो खासी पहचान।।
                    #5#
होंय मगौरा चिटपिटे,खूब मसाले दार।
फिर फटकारौ पेट भर,नौनी चटनी डार।।

              ###
-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा, (टीकमगढ़)

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3-हरि राम तिवारी 'हरि',खरगापुर, टीकमगढ़ (म.प्र)
दोहे   बुंदेली शब्द, "मगौरा"
१.
रिमझिम रस बुदियां परे, चढ़ी करैया तेल।
मूंग मगौरा कुरकुरे,चटनी संगें मेल।।
२.
मांग और दो और दो, कर रए सबई पुकार।
लगें मगौरा चटपटे, खावें असुंआ डार।।
३.
बब्बा बैठे खाट पे, उनकें नइयां दांत।
खांय मगौरा कुचर कें,एक पांत में भांत।।
४.
बब्बा से बऊ कै रई,मीठी लप्सी लेव।
लड़का बिटियां मांग रए,हमें मगौरा देव।।
लडुआ मांगे गणपती, शंकर मांगे भांग।
मां गौरा से षटबदन, करें मगौरन मांग।।😃😃
###
जय जय सियाराम
-हरि राम तिवारी 'हरि'
खरगापुर, जिला टीकमगढ़ मध्य प्रदेश



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4-प्रदीप खरे 'मंजुल', टीकमगढ़ (मप्र)
 
बिषय..मगौरा
1-
दार दरे पीसें उये, लैबें नौन मिलाय। 
मिरची धनियां डार कें, सेंक मगौरा खाय।
2-
लागी लत मगौरा की, मैया लियौ बनाय। 
चटनी नौनी पीसियौ,ओई संगे खाय। 
3-
 प्याज कटी चटनी मिरच,संग मगौरा होय। 
तबियत सें सब खायकें, तान पिछौरा सोय।
4-
हरि मगौरा बेंचबें,अरु चिप्पे की चाट।
मथुरा की टिकियाँ भली, दोना लैबें चाट । 
5-
पानी बरसो हूक कें, लगत मगोरा खाय। 
डार दार मां फूलबे, लइयौ आज बनाय।
-***
-प्रदीप खरे मंजुल,टीकमगढ़ (म.प्र.)💐

           
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5--राज गोस्वामी,दतिया (मप्र)

खट्टी मीठी चाट संग खाबे कौ आनंद ।
 बने मगोरा खाय के चंगे हम सानंद ।।

दाल भात संग मीड के मिला मगोरा खाय ।
ताजे फुलका संग मे सब रस लगै समाय ।।

होत मगोरा नुनखुरे रूखे ही खब जात ।
 संग मे शक्कर हो डरी अजब मजा है आत ।।                                      ***
     -राज गोस्वामी,दतिया
         

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6-प्रभुदयाल श्रीवास्तव 'पीयूष', टीकमगढ़




       बुंदेली दोहे   विषय मंगौरा

दरबटना सें दरदरी, बांट मूंग की दार।
बैठ मंगौरा सेंक र‌ई,न‌ई नबेली नार ।।

माटी की त‌इया चड़ी,भर सरसों कौ तेल।
सिकत मंगौरा मूंग के,खालो  करौ न झेल।।

बने मंगौरा  प्याज की,बास फैल र‌इ ऐंन।
संगै चटनी कैंत  की  ,कर र‌इ मन बेचैंन।।

जीजा जू जे जे लियौ,मोय मंगौरा आज।
मन सें सेंके अपुन खों ,कै र‌इ न‌इ साराज।।

सिके मंगौरा कुरकुरे ,डर गव चड़तौ नोंन।
खाती बेरां पेट की  ,खबर राखबै कोंन।।
    
         ***

         -प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष टीकमगढ़

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7- संजय श्रीवास्तव, मवई (दिल्ली)

*बुंदेली दोहा*
            विषय - *मगौरा*

हास रस की चटनी सँग,
      ताजे दोहा पाव।
रुच-रुच कें पढ़, मजा लो,
     इनमें मन के भाव।।
*१*
ताते-ताते मगौरा,
     देख जिया ललचाय।
पेट भरत,मन नइं भरत,
     मन खों को समझाय।।
*२*
खाय मगौरा सूँट कें,
    दारू पी गय नीट।
उठे, चले, फिर गिर परे,
     टेड़ी हो गइ पींट।।
*३*
नाक मगौरा सी धरी,
       मौं पे चेचक दाग।
नार सुघड़ सुंदर मिली,
     ई खों कत सौभाग।।
*४*
खाय मगौरा चिरपरे,
    बरा, ठडूला, चाट।
ब्याव,विदा न देख पाय,
    फूफा पकरें खाट।।
*५*
रैबे, खाबे तरस रय,
       मर रय भूँखन पेट।
लुचइं, मगौरा,रसगुल्ला,
      घर में खा रय सेट।।

    संजय श्रीवास्तव, मवई
     २६-७-२१😊दिल्ली

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8-अशोक पटसारिया 'नादान' ,लिधौरा ,टीकमगढ़ 


        😊 मगौरा 😊
   
जीजा आज रुको घरै,
           तुमें हमाओ कौल।
दार मंगौरन की डरी,
         आजई कौ है डॉल।।

बनें मंगौरा कुरकुरे,
             चटनी संगै खाव।
रात काट लो तुम इतै,
        फिर भुनसारें जाव।।

स्वाद जीब कौ बनों रै,
        बार बार फिर आव।
पानी बरसत में लला,
        तनक मगौरा खाव।।

हरी मिर्च होबे तली,
        भुरकउअल हो नोंन।
खाव मगौरा सूँट कें,
            आगे पाछें कौन।।

बेरा पानू बूंद की,
        भींज जैव जजमान।
बनें मगौरा कुरकुरे,
           परवे डरौ मचान।।
         ***

           -अशोक पटसारिया 'नादान' ,लिधौरा, टीकमगढ़ 
                   
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9-कल्याणदास साहू "पोषक", पृथ्वीपुर, (निवाड़ी)


           

बरा - मगौरा नाव सुन , मौं में पानी आय ।
कोंरे - कोंरे  होत  हैं , ओंठन  लेव  मुराय ।।

उर्द - मूँग  की  दार  के , बनतइ जे  पकवान ।
बरा - मगौरा  दइ-बरा , त्यौहारन की शान ।।

पूजा  होवै  मैर  की , शुभ दिवाइ  देवठान ।
बरा - मगौरा सें पुजें , सबरे  देइ - दिमान ।।

घी चुपरी रोटी गरम , कढी़ - भात मन भाय ।
बरा - मगौरा के बिना , पंगत  नहीं  सुहाय ।।

नाते - रिश्तेदार  कौ , जे - जे कें मन मोय ।
खातिरदारी  में  कजन , बरा - मगौरा होय ।।

काढ़  मगौरा  तेल में , रय में बोरे जात ।
फूल जात जब खूब ही , मजा खाय में आत ।।   
 ***
 -कल्याण दास साहू "पोषक"पृथ्वीपुर,निवाडी़ (मप्र)
  ( मौलिक एवं स्वरचित )
             
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10-एस. आर. सरल, टीकमगढ़ (मप्र)


बुन्देली दोहा #मगौरा#

बनै मगौरा मूँग के,खा बैठे गरसैट।
अफरा चढ गव रात मे,परी पेट मे ऐठ।।

बनत मगौरा स्वादले,खातइ लै लै स्वाद।
चढी करइयाँ हर घरै,ठंडन उर  बरषाद।।

गरम मगौरा चिटपिटे,बुन्देली पकवान।
दोस्त यार सब लंच पै,रये मगोरा छान।।

गरम मगौरा देख कै,मों में पानी आय।
चटनी संगै डार कै,गरम मगोरा खाय।।

गरम मगौरा सूट कै,'सरल' दोस्त सँग खात।
अपने अपने हाल सब,आपस में बतरात।।    
       
       ###
     -एस आर सरल,टीकमगढ़      
        
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11-कविता नेमा,सिवनी (मप्र)््


कविता नेमा , सिवनी

1     
भौतई भौत सुन लई ,ज मंगौरों की बात ।
अब तो चैन परे नहीं  मन बहुतै ललचात।।
            2
   मंगाई दाल  मूंग की , फूलन डारी आज ।
सिलबट्टे पे  बांट  ल ई  छोडे सारे काज ।
        3
रखी कड़ाही  तेल की , सेक लए अतकार।
 संग चटनी  टमाटर की सब खाएं चटकार  ।।

-कविता नेमा , सिवनी
                
                             
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13-रामेश्वर प्रसाद गुप्त, बड़ागांव, झांसी


जय बुंदेली साहित्य समूह.
26/7/2021.
बुंदेली पांच दोहे-मगौरा.

आये रिस्तेदार कुछ, गव सूरज जब डूब।
खातिरदारी में घरे,बने मगौरा खूब।।

चटनी तीन प्रकार की, बनी चटपटी दार।
खरे मगौरा कुरकुरे, दे रय स्वाद अपार।।

घरे मगौरा जब बनें, खावे में खवजात।
देख बजारे फिर उने, फिरत रहे लिलयात।।

मौसम बन रव रोज ही, कबे मगौरा खांय।
भाव तेल के देख कें, मन मारे रै जांय।।

मैगाई ने छीन लये, सबके मन के स्वाद।
बनें मगौरा अब नहीं, की सें कंय फरियाद।।

***
-रामेश्वर प्रसाद गुप्ता इंदु.,बडागांव झांसी (उप्र.)

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14-सीता राम तिवारी दद्दा टीकमगढ़(मप्र)

      
1-
देख मगौरा दार के, 
मौं में पानी आत। 
खाबें जो कउं सामनें, 
देखत अपन ललात।।
2-
भुनसारे सें खाइयौ, 
चाय-मगौरा रोज।
बिना मगौरा नहिं मनें, 
घरे दिवारी दोज।।

***
-सीताराम तिवारी 'दद्दा', टीकमगढ़

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15-गुलाब सिंह यादव भाऊ, लखौरा (टीकमगढ़)

🌹🦚बुन्देली 🦚
बिषय-मगौरा 
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
सिल बट्टा से पिसओ,फुली मूँग की दार ।
बने मगौरा सान के,तेज मशालें डार ।।
          2
प्याज बड़ों सो काट के,धना खड़ो दो डार ।
कड़े मगौरा कड़क से,मेंथी तेल बगार।।
              3
इमली की चटनी बने ,थोरो सो गुर डार।
छुवा मगौरा खाईये ,गर्म होये ततार ।।
             4
टेर बुलाव पावने,चलो मगौरा खाये।
करो नाश्ता आनके ,फिर सपरन खो जाये।।
              5
दददा जात बाजार खो,मोड़ा जे पछ याव।
बेटा घर खो लोटवो ,तुमे मगौरा लाव ।।
             ***
गुलाब सिंह यादव भाऊ, लखौरा( टीकमगढ़)

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16- रामगोपाल रैकवार टीकमगढ़ मप्र
दतिया में पीताम्बरा ,
धूमा माँ दरबार।
भोग मँगौरा कौ लगत
खाय न सधवा नार।।

बनै मँगौरा मूँग सें
भजिया भाजी डार।
खट्टी चटनी कैंथ की,
खाऔ बारम्बार।।

कवी मँगौरा चटपटे,
ऐंन सेंक रय आज।
खाव भाव की खटमिठू,
चटनी सँग  माराज।।
***
रामगोपाल रैकवार, टीकमगढ़

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17--अवधेश तिवारी,छिन्दवाड़ा

बरा मँगोरा गुलगुला,
भटा भात बन जाँय।
टाठी परसी हो धरी,(तो)
 का छोडें का खाँय।।
                    कल्लूके दद्दा
              -अवधेश तिवारी,छिन्दवाड़ा
                

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18-मनोज कुमार सोनी, रामटौरिया

पिच गई उंगू बाई की,बाँटत बाँटत दार,
बने मगौरा बाद में,पैल घली मोय मार।
***********************
चडी़ करैया तेल की,लगे मगौरा ढेर,
थर्रू लयें फिरबें सबइ,घेरा दयें लडे़र।
***********************
आज मगौरा बन रहे,गव पडौ़सी ताड़,
दोरें आबै उपत उपत,कैसऊ लगै जुगाड़।
*************************
बने मगौरा चिटपिटे,दाऊ ने खा लय यैन,
दिनभर लोटा लयें फिरे,जी में नइयाँ चैन।
***********************
मौलिक एवं स्वरचित
       -मनोज कुमार सोनी रामटौरिया

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19-डॉ सुशील शर्मा, गाडरवाड़ा

मँगोरा 

बरा मँगोंडों में दही ,उर चटनी दइ डार 
जाको सुंदर स्वाद है बाकी सब बेकार 

मूँग फुलो दर दर करी ,सिलबट्टा पे पीस। 
चटनी मिर्ची डार के ,बने मँगोड़ा तीस। 

माँग मँगोंडों की बहुत ,बड़ो खास पकवान। 
जेहे उम्दा ने लगें ,भोतइ बो नादान। 

बारे बूढ़े माँगते ,तले मँगोड़ा रोज। 
बाहे शत शत है नमन,करी जौन ने खोज। 
***
-डॉ सुशील शर्मा, गाडरवाड़ा

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20-डॉ रेणु श्रीवास्तव ,भोपाल 

दोहे विषय' मगौरा' 
✍️✍️✍️✍️✍️
1 भर बसकारे में बने, 
   जबई मगौरा खाव।
   ताते ताते मसक लो, 
   भूल बेयारी जाव।। 
  
2 कोरोना के काल में, 
   ऐसी विपदा आइ। 
   बरा मगौरा भूल गै, 
   गोली दवा दिखाइ।। 

3 दाल फुलै दो मूंग की, 
   मिक्सी देव चलाय। 
   प्याज मिरच अब काट के, 
   बनै मगौरा खाय।। 

4 ठरूला की ठसक में , 
   नन्ना दिनभर रांय। 
   गरम मगौरा देख कें, 
   मन मन में पछतांय।। 

5  मोड़ी मोड़ा आज के, 
    मैगी बरगर खांय ।
    बरा मगौरा देख कें, 
    नायं मायं खुर्यांय।। 
         ****
                    डॉ रेणु श्रीवास्तव ,भोपाल 

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21-राजेन्द्र यादव "कुँवर",कनेरा बडा मलहरा
समदी लाये सावनी, राखी को त्योहार।
बरा मगौंरन सें करो, समदी को सत्कार।।

कडी मगौंरा औ बरा, बुंदेली पकवान।
घुटीं दबा कें खात हैं, बूढ़े बारे ज्वान।।
***
-राजेन्द्र यादव "कुँवर",कनेरा बडा मलहरा
                  
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22--परम लाल तिवारी,खजुराहो
1
जलेबी और मगौरा,थे येई पकवान।
तुला तुला कै खात ते,बूढे़ वारे ज्वान।।

2
हतो भरोसा नाम को,मिठया इक होशियार।
बना मगौरा रखत तो,बेंचे भरके थार।।

3
बने मगौरा खूब हैं,खाओ भरकर पेट।
फिर फेतन में जाय कै,करो काम चरपेट।।

4
कहत बनें नहि स्वाद कछु,बने मगौरा नीक।
छक कै खाओ डर नहीं,पेट रहत है ठीक।।

5
पैले पीसो दार बहु,भरो कड़ाही तेल।
गरमागरम निकार कै,खाओ जम कै ढेल।।
**
-परम लाल तिवारी,खजुराहो

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23-रामानंद पाठक 'नंद', नैगुवा

मगोरा पर दोहा
             1
बनत मगौरा दार के,पिसा मसाले लेव। 
बैठ पालथी मार कें,घर में सब जन जेव।
                2
दार मूंग के मगौरा,होतइ पाचक ऐंन ।
चाय जितेक तुम ख लियो,छिनें न पल भर चेंन।
                   3
दिन डूबत आ पावनें,रात करें विश्राम।
बना मगौरा भोर सें,खाकें कर आराम।
                    4
रिम झिम टिमकवै पानी,मौसम में बदलाव।
दार फुला पीसौ उयै,बना मगौरा खाव।
                   5
बुन्देली ब्यंजन में,रत ऊमें आनंद।
जिस विधी बनें मगौरा,बता दये हैं नंद।।
**
-रामानन्द पाठक नन्द,नैगुवा

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                             मगौरा
                 (बुंदेली दोहा संकलन) ई_बुक

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रविवार, 25 जुलाई 2021

ईद का चांद काव्य संकलन ई-बुक-संपादन-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)


                             ईद का चांद
                  (काव्य संकलन) ई बुक
          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
                  
                       ईद का चांद
                  (काव्य संकलन) ई बुक
                            
                 
        संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

प्रकाशन-जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़
© कापीराइट-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

ई बुक प्रकाशन दिनांक 25-07-2021
        टीकमगढ़ (मप्र)भारत-472001
         मोबाइल-9893520965

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              अनुक्रमणिका-
01- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी' (टीकमगढ़)(म.प्र.)
02-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा(म.प्र.)
03 प्रदीप गर्ग 'पराग', फरीदाबाद (हरियाणा)
04-प्रदीप खरे 'मंजुल', टीकमगढ़ (मप्र)
05-राज गोस्वामी,दतिया (मप्र)
06-प्रभुदयाल श्रीवास्तव, टीकमगढ़,(म.प्र.)
07-जनक कु.सिंह बाघेल, भोपाल
08-श्याम मोहन नामदेव,देरी, टीकमगढ़(म.प्र.)
09-अशोक पटसारिया,लिधौरा (टीकमगढ़) 
10- कल्याणदास साहू "पोषक",पृथ्वीपुर(निवाड़ी)(म.प्र.)
11- एस. आर. 'सरल', टीकमगढ़ (मप्र)
12- सु संस्कृति सिंह, भोपाल (मप्र)
13- रामेश्वर गुप्त, 'इंदु', बड़ागांव,झांसी (उ.प्र.)
14-सीताराम तिवारी 'दद्दा', टीकमगढ़,(म.प्र.)
15-गुलाब सिंह यादव 'भाऊ', लखौरा टीकमगढ़


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1-राजीव नामदेव "राना लिधौरी" , टीकमगढ़ (मप्र)


**बुंदेली व्यंग्य कविता- "ईद कौ चांद"*

जब सें दई है हमने उदारी।
वे ईद कौ चांद हो रय।।
वापिस मांगो तो खिसिया रय।
घर पौचों तो दुकत फिर रय।।
राम-श्यामा अब नई हो रयी।
मोबाइल पै बात नै हो रयी।।
रिश्तों में अब खटास पर रयी।
मैंगाई जा भारी पर रयी।।
कीसें कय अरु कौ है सुन रऔ‌।
लाठी बारे की भैंस हो रयी।।
पेट्रोल देखो हवा में उड़ रऔ।
फटफटिया घरै धरी रो रयी।।
आ गऔ देखो कैसों ज़मानौ।
जींस पैर कै मौंडा हो रयी।।
इक दूजे के गोड़े ताने।
राजनीति मिदरवा हो रयी।।
***
*@ राजीव नामदेव "राना लिधौरी" टीकमगढ़*
           संपादक "आकांक्षा" पत्रिका
जिलाध्यक्ष म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (मप्र)-472001
मोबाइल- 9893520965
Email - ranalidhori@gmail.com
Blog-rajeevranalidhori.blogspot.com
(मेरी उपरोक्त रचना मौलिक एवं स्वरचित है।)


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2-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा, टीकमगढ़ (मप्र)

     
       #रविवार#दिनाँक 25.07.21#
#बिशैष हिन्दी/बुन्देली लेखन#
#बिषय...ईद का चाँद#
*************************

          #ईद का चाँद#
धुन....चंदन सा बदन,चंचल चितवन,धीरे से तेरा ये मुस्काना। 

ओ मेरे सनम,तुझे मेरी कसम,
जीवन के हमसफर बन छाना।
दिखते दो हैं,पर एक हैं हम,
तुम ईद के चाँद ना बन जाना।।
                    #1#
जब जब जातीहूँ उपवन में,
मुझे तेरी याद सताती है।
तड़पन मन में तब उठती है,
कोयलिया राग सुनाती है।।
मधुवन की राधा मैं तेरी,
तूं श्याम है मेरा दीवाना।दिखते...
                      #2#
मुझे याद सताती है दिन भर,
गिन गिन तारे काटें रातें।
तेरी झाँकी झाँकूं में जब,
तस्वीर करे तेरी बातें।।
तब दिल को धीर बँधाता है,
मंद मंद तेरा मुस्काना।दिखते.....
                    #3#
मन मेरा मान सरोवर है,
मैं उसमें गिरती धारा हूँ।
तूं सरिता का चंचल पानी,
मैं उसके लिये किनारा हूँ।।
मैं लगूं लाजबन्ती तेरी,
शरमाऊं तो मत घवराना।दिखते..
                    #4#
मैं अगर चाँदनीं हूं तेरी,
तूं चाँद मेरा कहलायेगा।
बो शरद पूर्णिमा कब आये,
जब प्यार सुधा बरसायेगा।।
जयहिन्द शिखा शीतल होगी,
जिसमें न जले कोई परवाना।
दिखते दो..........

#मौलिक एवम् स्वरचित#
-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा, (टीकमगढ़)

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3-- प्रदीप गर्ग 'पराग', फरीदाबाद (हरियाणा)

ईद का चांद

तक रहे चांद ईद का,अब्बू हो या मुनिया
दीदार को रहती है बेताब ये दुनिया।

बरसों से किया तरसे ,प्यारी सी दीद के
दे दी है मात तुमने ,चंदा को ईद के।

बाहर भी निकला करो,छोड़ो घर की मांद
बने हुए हो आप तो, मियां ईद का चांद।

     - प्रदीप गर्ग 'पराग', फरीदाबाद
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4-प्रदीप खरे 'मंजुल', टीकमगढ़ (मप्र)
 

बिषय..ईद का चांद

 चांद ईद का लगते हो तुम, 
कितने प्यारे लगते हो तुम।
नजर हटे न चेहरे से तेरे , 
सबसे न्यारे लगते हो तुम।।
बलखा के तेरा यूं चलना।
सुरमयी आंखों का मटकना।।
ओठों पर मुस्कान है बिखरी , 
अब भी क्वारे लगते हो तुम।
चांद ईद का लगते हो तुम,
सबसे प्यारे लगते हो तुम।।
लट काली झटका कर चलती,
अंखियां भी मटका कर चलती।
लाली  लगा ओठन पर चलती, 
आंखन कोर निकारे हो तुम।
चांद ईद का लगते हो तुम, 
सबसे प्यारे लगते हो तुम।।
कभी कभी मुझे तेरा ये दिखना, 
प्यार भरे अल्फाज भी लिखना। 
दिखना, दिखकर ओझल होना,
अदा खूब, बहारें हो तुम।।
चांद ईद का लगते हो तुम,
कितने प्यारे लगते हो तुम।।

-***
-प्रदीप खरे मंजुल,टीकमगढ़ (म.प्र.)💐

           
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5--राज गोस्वामी,दतिया (मप्र)

*चाँद*
*******
सबका मैं  आम हूँ  सबका मैं खास ।
बच्चों  का मामा हूँ चंद्रलोक वास ।।
हूँ  शरद की चाँदनी  सुरनाद हूँ  ।
मैं चाँद  हूँ.. मैं  चाँद हूँ  ।।
होती है राय जहां  उगना है कर्म ।
कोई ना जात मेरी भाषा न धर्म ।।
ग्रहण  हूँ नक्षत्र हूँ  संवाद हूँ ।
मैं चाँद  हूँ.. मैं  चाँद हूँ  ।।
सिर पर न बाल मेरे घुंघट  न लाज ।
जान नही पाया है कोई मेरा राज ।।
भाग्यवादी हूँ बड़ा अपवाद हूँ  ।
मैं चाँद  हूँ.. मैं  चाँद हूँ  ।।
करवा की चौथ मुझे करते सब याद ।
होती है फलीभूत मनौतियाँ  मुराद ।।
ईद हूँ - बकरीद हूँ फरियाद हूँ  ।
मैं चाँद  हूँ.. मैं  चाँद हूँ  ।।
मुड़ मुड़  के लोग मुझे देखते अनेक ।
कोई छुपा रुस्तम  तो कोई दिलफेक ।।
गुलबदन जौहरा जबी  नौशाद हूँ  ।
मैं चाँद  हूँ.. मैं  चाँद हूँ  ।। 
**
     -राज गोस्वामी,दतिया
         

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6-प्रभुदयाल श्रीवास्तव 'पीयूष', टीकमगढ़




       ईद का चांद

छत पर आईं देखने, चांद चांद सी हूर।
उसे देख कर ईद का, चांद हुआ बे नूर।।

रुख से हटा नकाब तो,हुई सुहानी दीद।
चांद दिखा तो मन ग‌ई,बे मौसम की ईद।।

चंदा देखन ईद कौ, चंदा छत पै आइं।
हमें ईद के चांद की, उनमें दिखर‌इ,झांइं।।

भौत दिनन के बाद में,दरसन हो र‌ए आज।
काए ईद के चांद से, हो र‌ए हौ महाराज।।
         ***

         -प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष टीकमगढ़

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7- जनक कु.सिंह बाघेल, भोपाल

आँखों का तारा 

है आँखों का तारा मेंरा , राम ये दुलारा मेंरा ,
वल्कल धारण कर , कैसे वन जात है ।।
आकर सुमित्रा देखो , लछिमन साथ देखो ,
चीर वस्त्र धारि कर , सिया चली जात हैं ।।
नहले पे दहला दे , क्रूर ये कैकेयी देखो , 
अंकुश लगाय राज , वन भेजवात है ।।
राम – राम राव रटें , भूमि पे बिहोश पड़े ,
अपना सा मुह लेके , कैसे विलपात हैं ।।
विधि का विधान देखो , मंथरा का ज्ञान देखो , 
अवध का हाल जैसे , नाग डसे जात है ।।
***
-जनक कु.सिंह बाघेल, भोपाल



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08-श्याम मोहन नामदेव,देरी, टीकमगढ़(म.प्र.)
 *नमन मंच – जय बुन्देली साहित्य समूह*
*दिनांक – 25/07/2021, रविवार*
*आयोजन – कविता सृजन*
*विषय – ईद के चाँद*
**********************************
सखी री, श्याम स्वप्न में आये।
कह गए थे प्रतिनिशि सपने में, आऊंगा ना आये।।
बैरन  हो गयी  नींद हमारी,  लेटूँ  नींद न आये।।
आज  बड़ी उत्कंठा थी मन,   विरह बड़ा तड़पाये।।
हो गए *ईद के चाँद* सांवरे,  बड़े दिनों में आये।।

*✍️ श्याम मोहन नामदेव, देरी
      देरी, जिला – टीकमगढ़, म.प्र.

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9-अशोक पटसारिया 'नादान' ,लिधौरा ,टीकमगढ़ 


        
💐चंद शेर आपकी नज़र💐
      ***  *  ***  *  ***
      😊ईद का चांद😊
  
ऐसा भी क्या है ईद के,
               उस चांद में मियां।
हमको हमेशा उसकी तरह, 
                      मान रहे हो।।

तुम ईद का हो चांद तो,
                  बेताब यहां हम।
छत पर कभी आया करो,
                  दीदार के लिए।।

ए मेहजबीं निकली भी तो,
              आफ़ताब की तरह।
हम ईद के भी चांद को,
                  बेताब बहुत थे।।

मेहरुन्निशा माहेजबीं, 
               मुमताज महल हो।
ए नाज़नीं फिर ईद का,
               क्यूं चांद बनी हो।।

ए नाज़नीं रुखसार से,
           चिलमन हटा के देख।
वैसे तो चांद ईद का,
        निकला हुआ है आज।।

कहते थे कि तुम ईद के,
               हो चांद के मानिंद।
लो हम सरे बाज़ार ,
                सरी राह खड़े हैं।।

गुलज़ार चमन था कभी,
             सजतीं थी महफिलें।
वो ईद के भी चांद हुए,
                  गर्दिशों को देख।।

तुम माहेताब महजबीं,
                 मेहरुन्निशा भी हो।
कहने को तो हम ईद के भी,
                       चांद नहीं हैं।।

कुछ लोग खुदा बन गए,
                  कुछ रहनुमा बने।
निकला है चांद ईद का,
               दिल्ली से खबर है।।

बैसे तो आबे जम जम भी,
                 झरता है चांद से।
हम ईद के उस चांद से,
                   आगे नहीं गए।।
          **** * ****
माहेजबीं= चांद सा माथा,
मेहरुन्निशा = खूबसूरत
मुमताज़=  विशिष्ठ गणमान्य
नाज़नीं  = नखरे वाली सुंदर
आबे जम जम =अमृत 
गर्दिश =बुरे दिन
मानिंद = जैसा
रुखसार= गाल 
चिलमन =झीना पर्दा
आफ़ताब =सूर्य
रहनुमा = अगुआ मार्गदर्शक

****
           -अशोक पटसारिया 'नादान' ,लिधौरा, टीकमगढ़ 
                   
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10-कल्याणदास साहू "पोषक", पृथ्वीपुर, (निवाड़ी)


           

चतुराई की खाँद महोदय ।
सबसें बडी़ चिराँद महोदय ।।

उल्टी - सूदी धांदें अपनीं ।
भौत करत हैं दाँद महोदय ।।

हाँत जोर कें दरसन दय हैं ।
भये ईद कौ चाँद महोदय ।।

बंगला  गाडी़  वारे  होगय ।
बगरावें  ऐंठाँद  महोदय ।।

पैल  गरे  सें  लगा  लेत  ते ।
अब करतइ घिनियाँद महोदय ।।

भाषा मजहब जाति वाद की ।
फैलावें  छिछराँद  महोदय ।।

कभउँ-कभउँ मुरगा-दारू की ।
छोड़त  हैं  झुक्काँद  महोदय ।।

 ***
 -कल्याण दास साहू "पोषक"पृथ्वीपुर,निवाडी़ (मप्र)
  ( मौलिक एवं स्वरचित )
             
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11-एस. आर. सरल, टीकमगढ़ (मप्र)


🌷ईद की चाँद 🌷

अखियाँ तरस गई दर्शन खौ।
ऐसी का  खटयाँद हो गई।
मात पिता की भौत लाड़ली,
बिन्नू ईद की चाँद हो गई।।

का ऐसी कर्री कौरी भइ,
कै बातन में झल्लाँद हो गई।
कौन बात पै कबै बिगर गई,
सो सबसे चटकाँद हो गई।।

बँग्गा कौन बनौ नइँ बिन्नू,
सो ऐसी  घिनयाँद हो गई।
चन्दा से मुखड़ा पै बिन्नू,
अब कैसी छुछराँद हो गई।।
 
कौन बात पै तनातनी भइ,
काय पै कूँदा फाँद हो गई।
सो भौत दिनन में आई बिन्नू,
सबखौ ईद की चाँद हो गई।।

       ###
     -एस आर सरल,टीकमगढ़      
        
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12- सु संस्कृति सिंह, भोपाल (मप्र)


                  ईद का चांद
              🌹🌹🌹🌹🌹

अब क्या है सोचना
चाहे जो अंजाम हो
करना है दीदार तेरा 
पर तुम ईद का चांद हो

मिलती नज़रे  मानो ,
ईदी  मिल जाती है 
ईद के चांद सी 
हमारी कीमत बढ़ जाती है

सांसे न थम जाएं रिश्तों की
अपनों से मिलते रहा करो
अपनापन बढ़ाना है तो 
ईद के चांद मत बने रहो
***

                             स्वरचित रचना
                          सुसंस्कृति सिंह ,कृति 
                           🌷भोपाल 🌷


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13-रामेश्वर प्रसाद गुप्त, बड़ागांव, झांसी


जय बुंदेली साहित्य समूह.
25/7/2021.
गजल. 

मीत जाने कहाँ खो गये।
ईद के चांद वो हो गये।।

महफिलें आज सूनी पडी़।
दोस्त आते नहीं जो गये।।

वक्त बदला यहाँ इस तरह।
कैद घर में स्वयं हो गये।।

मिल रही है सजा हर तरफ।
बीज जैसे जहाँ बो गये।।

कांच पत्थर बटोरे बहुत।
जिंदगी सिर्फ हम ढो गये।।

दर्द किसको सुनायें यहाँ।
जो सुने और खुद रो गये।।

अब जगा दो मुझे इंदु यूँ।
हम अगर जो कहीं सो गये।।

***
-रामेश्वर प्रसाद गुप्ता इंदु.,बडागांव झांसी (उप्र.)

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14-सीता राम तिवारी दद्दा टीकमगढ़(मप्र)

      बिषय..ईद का चांद

ईद का चांद निकला,
आया मुस्काता छत पर।
इठलाया, कुछ इतराया,
देखा पल भर मुझे नजर। 
न जी भर के देखा, 
न बात की।
आरजू बन गई है,
अब मुलाकात की।।
बेदर्द बड़ी जालिम,
बरपा गई कहर।।
बला की थी उसकी,
हेरन तिरछी नजर की।
सुध भूल गये अब तो,
अपनी डगर की। 
क्या खूब है ईद का चांद भी,
मिल न सकी हमारी, 
उससे कभी नजर।।

***
-सीताराम तिवारी, टीकमगढ़
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15-गुलाब सिंह यादव भाऊ, लखौरा (टीकमगढ़)

🌹बुन्देली 🌹
  चौकडिया 
बिषय ईद का  चाँद 
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
सब अपनी  नजर लगारये 
न ईद  चाँद  दिखारये 
भीड़  लगी  है  सड़क दोर पर
    उठा के हात  बतारये 
कोऊ  कहत अबै न दिखबै 
  कोऊ कहत दिखारये 
कहत भाऊ  जो चाँद दिखे न
   हम नई खाना खारये ।।
      ***

गुलाब सिंह यादव भाऊ, लखौरा( टीकमगढ़)

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                            ईद का चांद
                  (काव्य संकलन) ई बुक
          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

प्रकाशन-जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़
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         ई_बुक प्रकाशन दिनांक 25-07-2021
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