Rajeev Namdeo Rana lidhorI

शनिवार, 29 मई 2021

दौंदरा (बुंदेली दोहा संकलन ई-बुक) राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'



                             दौंदरा
                  (बुंदेली दोहा संकलन) ई बुक
          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

                              दौंदरा
                  (बुंदेली दोहा संकलन) ई बुक
          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

प्रकाशन-जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़
© कापीराइट-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

ई बुक प्रकाशन दिनांक 29-05-2021
        टीकमगढ़ (मप्र)भारत-472001
         मोबाइल-9893520965

😄😄😄 बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़😄😄😄


              अनुक्रमणिका-

1परम लाल तिवारी, खजुराहो (मप्र)
2-अशोक पटसारिया 'नादान' लिधौरा (टीकमगढ़) 
3- एस. आर. 'सरल', टीकमगढ़ 
4-कल्याणदास साहू "पोषक",पृथ्वीपुर(निवाड़ी)(म.प्र.)
5-प्रभुदयाल श्रीवास्तव, टीकमगढ़,(म.प्र.)
6- संजय श्रीवास्तव, मवई (दिल्ली)
7-डां. शरद नारायण खरे, मंडला
8-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा(म.प्र.)
9-प्रदीप खरे 'मंजुल', टीकमगढ़ (मप्र)
10-डां सुशील शर्मा, गाडरवाड़ा 
11-रामानन्द पाठक,नैगुवा(म.प्र.)
12-रामेश्वर गुप्त, 'इंदु', बड़ागांव,झांसी (उ.प्र.)
13- राजेन्द्र यादव 'कुंवर', बड़ा मलहरा
14-शोभाराम दांगी इंदु, नदनवारा (मप्र)
15-राज गोस्वामी,दतिया(मप्र)
16- गुलाब सिंह यादव 'भाऊ', लखौरा, टीकमगढ़

अप्रतियोगी

17- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी' (टीकमगढ़)(म.प्र.)
18- रामगोपाल रैकवार, टीकमगढ़(मप्र)

😄😄😄 बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़😄😄😄

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1- श्री परम लाल तिवारी,खजुराहो(मप्र)

प्रथम स्थान प्राप्त दोहा-

चौपट कर डारी फसल,
देंय दौंदरा ढोर।
इतै उतै छुट्टा फिरें,
पिड़ें किवरिया टोर।।
      -परम लाल तिवारी, खजुराहो

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2-अशोक पटसारिया नादान ,लिधौरा ,टीकमगढ़ (मप्र)


द्वितीय स्थान प्राप्त दोहा

खा रय अपने देश कौ, 
गा रय उनकौ गान।
कब तक झेलै दोंदरा,
अपनों हिंदुस्तान।।
   ***
               -अशोक नादान ,लिधौरा, टीकमगढ़ 

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3-एस आर सरल,टीकमगढ़(मप्र)

तृतीय स्थान प्राप्त 

कोरोना दँय दौदरा,
दैशत दँय दिन रात।
घर बाहर ऐसे लगै,
 बिगना टोरै खात।।       
               ***
 मौलिक एवं स्वरचित
     -एस आर सरल,टीकमगढ़      
        
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4-कल्याणदास साहू "पोषक", पृथ्वीपुर, (निवाड़ी)

तृतीय स्थान प्राप्त 

खूब दौंदरा देत हैं , 
जब आ जात चुनाव ।
मजा करत हैं जीत कें , 
फिर नइं लेतइ नाव ।।
***
 -कल्याण दास साहू "पोषक"पृथ्वीपुर,निवाडी़ (मप्र)
  ( मौलिक एवं स्वरचित )

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5-प्रभुदयाल श्रीवास्तव, टीकमगढ़,(म.प्र.)


दम सें दै लव  दोंदरा ,
दिन देखो ना रात।
खेत चिर‌इंयां चुन चुकीं,
अब पाछें पछतात।।  

         -प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष टीकमगढ़

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6- संजय श्रीवास्तव, मवई (दिल्ली)


दानव बन दयँ दौंदरा,
दमचौरा दिन-रात।
दहशत सें दुनिया दुखी,
कोरोना की घात।।

         -  संजय श्रीवास्तव, मवई (दिल्ली)

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7-डां. शरद नारायण खरे, मंडला(मप्र)
कोरोना कौ दौंदरा,
मिलै न भगतन गैल।
रो रये अफसर,मंतरी,
सबरे हो गये फैल।।
                 --प्रो.शरद नारायण खरे, मंडला

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8-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा(मप्र)
                    
गैलन गुजरें गुजरियाँ,
गेरत ग्वाल गुपाल।
दही देख दें दौंदरा,
नचा नचा नँदलाल।।
               -**
#मौलिक एवम् स्वरचित#
-जयहिंद सिंह 'जयहिन्द',पलेरा, (टीकमगढ़)

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9-प्रदीप खरे 'मंजुल', टीकमगढ़ (मप्र)


दरुआ देवै दौंदरा, 
दमचक रोज मचात।
देत दनादन दाबकैं,
दद्दा लट्ठ बजात।।
***
-प्रदीप खरे 'मंजुल',टीकमगढ़ मप्र💐

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10-डां सुशील शर्मा, गाडरवाड़ा (मप्र)



कोरोना को दोंदरा ,
सरकारें सब सोंय । 
मुतके सारे मर गए ,
लोगन आपो खोंय। 
 ***
               -डॉ सुशील शर्मा ,गाडरवारा

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11-रामानन्द पाठक नन्द,नैगुवा,(मप्र)


 कौरोंना दव दोंदरा,
मौतें भइ हजारन।
अब घर वेघर हो गये,
कैसें हुए निवारन।।
*****
                 -रामानन्द पाठक नन्द,नैगुवा,

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12-रामेश्वर प्रसाद गुप्त, बड़ागांव, झांसी


कोरोना को दौंदरा,
ऊपर सें तूफान।
मरे मिटे फिर कैउ घर, 
मिटे केउ अरमान।।
***

-रामेश्वर प्रसाद गुप्ता इंदु.,बडागांव झांसी (उप्र.)

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13-   -  राजेन्द्र यादव 'कुंवर', बड़ा मलहरा(मप्र)

  शिव शंभु की बरात में, 
दयें दौंदरा भूत।
भौंरा से मडरा रहे, 
लागी अंग भभूत।।
- ***
            ✍️-  राजेन्द्र यादव 'कुंवर', बड़ा मलहरा


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14-शोभाराम दांगी इंदु, नदनवारा (मप्र)

दयें "दौंदरा "कोरोना, 
तौऊ गम नइं खात ।
खोज मिटादव देस कौ, 
करदव सत्यानाश ।।                       
***
-शोभाराम दाँगी नंदनवारा

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15-राज गोस्वामी,दतिया

जौ कवियन कौ दौदरा, कविताई कौ खेल ।
 जो देखो अपनी कहत,बेजम ठेलाठेल ।। 
                   - राज गोस्वामी,दतिया

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16- गुलाब सिंह यादव 'भाऊ', लखौरा, टीकमगढ़
बाप मताई रोऊत है,
कैसे बचबै प्रान।
लरका बहुये आज की, 
दये दौंदरा तान।।
   -गुलाब सिंह यादव भाऊ,लखौरा टीकमगढ़

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अप्रतियोगी 

17- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)
*बिषय बुंदेली दोहे -"कुतका"

सप्लीमेंट्री अप्रतियोगी-
 
*1*
दये दौंदरा देत है,
कोराना है आज।
लूट मची चहु ओर है,
हो रव गुंडाराज।।
**29-5-2021

*@ राजीव नामदेव "राना लिधौरी" टीकमगढ़*
           संपादक "आकांक्षा" पत्रिका
जिलाध्यक्ष म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (मप्र)-472001
मोबाइल- 9893520965
Email - ranalidhori@gmail.com
Blog-rajeevranalidhori.blogspot.com
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18- रामगोपाल रैकवार, टीकमगढ़ (मप्र)

सप्लीमेंट्री अप्रतियोगी-

अप्रतियोगी दोहा-

ऐन मचाऔ दोंदरा,
जनता दीनो त्रास।
रावन-हिरनाकुस असुर,
ईसुर कीने नास।।
***

रामगोपाल रैकवार, टीकमगढ़
मौलिक-स्वरचित।

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                            दौंदरा
                (बुंदेली दोहा संकलन) ई बुक
          संपादक - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

प्रकाशन-जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़
© कापीराइट-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

         ई_बुक प्रकाशन दिनांक 29-05-2021
            टीकमगढ़ (मप्र)भारत-472001
                 मोबाइल-9893520965

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शुक्रवार, 28 मई 2021

मेरी डायरी- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

                          मेरी डायरी 

                                  -राजीव नामदेव'राना लिधौरी'

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                           मेरी डायरी 
                                       -राजीव नामदेव'राना लिधौरी'

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मेरी प्रिय डायरी  समग्र -राजीव नामदेव:राना लिधौरी'

मेरी प्रिय डायरी  (भाग-1 ) -राजीव नामदेव:राना लिधौरी'

                               दिनांक 23-5-2021 समय रात 9:30

मेरी प्रिय डायरी,
         आत्मिक प्रेम
      हे प्यारी सी डायरी, तो आज मैंने तुम्हें भी अपना बना ही लिया है।
जब अपना बना ही लिया तो चलो मैं सबसे पहले अपना परिचय ही दे देता हूं। मैं राजीव नामदेव "राना लिधौरी" टीकमगढ़ (मप्र) भारत का रहने वाला एक अदना सा इंसान हूं।
           किस्मत का मारा हूं एम.ए.हिंदी, बी.एससी.कृषि और पीजीडीसीए कम्प्यूटर से करने के बाद भी सरकारी नौकरी नहीं मिल पाई। वजह मैं लोकल मैं नौकरी करना चाहता था इसके दो प्रमुख कारण थे।
      पहला मैं घर में इकलौता लड़का था पिताजी जी बाहर जाने नहीं दिया। और दूसरा मैं एक साहित्यकार हूं मेरा जिले में साहित्यिक क्षेत्र में बहुत नाम है। इसलिए मैं खुद बाहर नहीं जाना चाहता था इसके बारे फिर किसी दिन विस्तार से लिखूंगा।
            बहुत पहले शिक्षाकर्मी की नौकरी मिल रही थी शहर से 30 किलोमीटर लेकिन उस समय शिक्षाकर्मी को मात्र 300रुपये मिलते थे और मैं लोकल मैं ही एक प्रायवेट स्कूल में पढ़ाता था वहां 1800रु मिलते थे।
         तो अब आप ही बताइए वो कौन मूर्ख होगा जो 1800रुपये की नौकरी छोड़ कर 300की करेगा वो भी रोज अपडाउन करके और वो भी पक्की नहीं थी। ये बात और है कि बाद में वही पक्की हो गयी।
      और हमने कुछ सालों तक पढ़ाकर अनुभव के आधार पर एक स्वयं का एक छोटा सा स्कूल खोल लिया।
लेकिन हाय री किस्मत दो साल भी ढंग से नहीं संचालित कर पाया कि कोरोनावायरस के कारण लाकडाउन में दो साल से हम ही डाउन हो गये। वो तो ईश्वर की थोड़ी सी कृपा रही कि स्कूल की स्वयं की बिल्डिंग है। वर्ना किराया देते देते मकान बिक जाता।
            तो मित्रों मैं इस मामले में लकी हूं कि कोरोनावायरस की चपेट में नहीं आया हूं और न ही मेरे परिवार का कोई भी सदस्य। हमने मास्क को नहीं छोड़ा और बहुत सावधानी रोज बरतते है इसीलिए अभी तक बचे है वर्ना मेरे हार्ट वाइपास सजर्री  सन् 2012 में हो हो चुकी है।
       फिलहाल मैं एक स्कूल संचालक हूं और एक साहित्यकार हूं। परिवार में बस  दो बेटियां हैं।  और माता-पिता सहित हमलोग कुल 6सदस्य है।
         ये तो हुआ मेरा संक्षिप्त परिचय। धीरे धीरे आप भी मुझे बहुत अच्छे से जानने लगेगें। मैं आपको सब कुछ बताते जाऊंगा।
        बस आप लोग मेरी डायरी को जरुर पढ़िएगा और कमेंट बॉक्स में बताये कि मेरी डायरी कैसी है।
बैसे सच कहूं तो पहली बार डायरी लिख रहा हूं। अब पता नहीं आपको पसंद आती है कि नहीं।
            बाक़ी अगले भाग में बातें होगीं।

   शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे।

आपका अपना ही-

-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'
संपादक-'आकांक्षा' पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,टीकमगढ़
पिन कोड-472001 (मप्र) भारत
मोबाइल-91+9893520965
Email- ranalidhori@gmail.com

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मेरी प्रिय डायरी  (भाग-2 ) (साहित्यिक परिचय)
                -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)

                            दिनांक 24-5-2021 समय रात 8:30

मेरी प्रिय डायरी,

         आत्मिक स्नेह

      हे मेरी प्यारी सी डायरी, कल पहले भाग मैंने अपना सामान्य परिचय दिया था। आज अपना साहित्यिक परिचय दे रहा हूं ताकि तुम मुझे किसी न किसी कोण से सदा याद रखो, मुझे भूलों नहीं।

साहित्यिक परिचय-
नाम :-राजीव नामदेव ‘‘राना लिधौरी’’
जन्म   :-15.06.1972 (लिधौरा)
माता-पिताः- श्रीमती मिथलेश,श्री सी.एल.नामदेव
पत्नी एवं संतानः- श्रीमती रजनी नामदेव ।
कु.आकांक्षा एवं कु. अनुश्रुति
शिक्षा   :-बी.एस.सी.(कृषि),एम.ए.(हिन्दी),पी.जी.डी.सी.ए.(कम्प्यूटर)
विधा :-कविता,ग़ज़ल,हायकू ,व्यंग्य, क्षणिका,लघुकथा,कहानी एंवं आलेख आदि।
प्रकाशन:-  1.अर्चना (कविता संग्रह,1997) 2.रजनीगंधा (हायकू संग्रह 2008)
     3-नौनी लगे बुदेली’ (विश्व में बुंदेली का पहला हाइकु संग्रह, 2010)
4.राना का नज़राना (ग़ज़ल संग्रह 2015द्ध 5.लुक लुक की बीमारी’(बुंदेली व्यंग्य संग्रह 2017
6 सहित्यिक वट वृक्ष’ (ई बुक) (गद्य व्यंग्य संग्रह 2018
7.‘सृजन’(संपादन) 8.आकांक्षा पत्रिका (संपादन 2002 से अब तक)9.‘संगम’ (संपादन) 10.अनुरोध (संपादन)
11.‘नागफनी का शहर (व्यग्ंय संकलन) 12.‘दीपमाला’(उपसंपादन) 13. जज़्बात(उपसंपादन)
14 ‘श्रोता सुमन’ (उपसंपादन)
15 पं. दुर्गाप्रसाद शर्मा अभिनंदन ग्रंथ (सह संपादन-2016)
ई-बुक- अब तक 41+13=54 ई-बुक्स का संपादन
एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगभग दो़ हज़ार रचनाओं का प्रकाशन, कवि-सम्मेलनों एवं मुशायरों  में शिर्कत।
अप्रकाशित:- ग्यारह अप्रकाशित संग्रह
संपादक:- ‘आंकाक्षा’ पत्रिका (सन् 2006 से आज तक)
प्रसारण :-ई टी.व्ही.,दूरदर्शन,सहारा म.प्र.,आकाशवाणी छतरपुर,केन्द्र से प्रसारण।
सम्मान :-18 प्रदेशों से 107 साहित्यिक सम्मान प्राप्त। म.प्र. एवं उ.प्र. केे महामहिम तीन राज्यपालों द्वारा सम्मानित।
विशेष  :-अब तक 271 साहित्यिक गोष्ठियों/कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन/आयोजन।
78 देशों के ब्लाग पाठक
संप्रति :-संपादक- ‘आकांक्षा’ पत्रिका,
जिला अध्यक्ष:- म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़ (सन् 2002 से आज तक)
जिला अध्यक्ष:- वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
पूर्व महामंत्री    : - अ.भा.बुन्देलखण्ड साहित्य एवं सस्ंकृति परिषद, टीकमगढ़ 
एडमिन- जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़

पता    :-नई चर्च के पीछे,शिवनगर कालौनी,कुंवरपुरा रोड,टीकमगढ़ (म.प्र.)पिनः472001 भारत
मोेबाइल :-09893520965  
E Mail- ranalidhori@gmail.com
Blog - (1) rajeevranalidhori.blogspot.com
(2) ranalidhori15.blogspot.com

           पढ़कर हंसना नहीं ये तो मेरा क्षणिक परिचय है और भी है बहुत कुछ है मेरे अंदर जो बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा है।
फिर  कभी बताऊंगा।

बैसे सच कहूं तो पहली बार डायरी लिख रहा हूं। अब पता नहीं आपको पसंद आती है कि नहीं।
            बाक़ी अगले भाग में बातें होगीं।

शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे।

आपका अपना -

-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'
संपादक-'आकांक्षा' पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,टीकमगढ़
पिन कोड-472001 (मप्र) भारत
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मेरी प्रिय डायरी  (भाग-3)
(कोरोनाकाल में मेरी कुछ उपलब्धियां)
                -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)

                            दिनांक 26-5-2021 समय रात 9:30

मेरी प्रिय डायरी,

         आत्मिक स्नेह
यूं तो कोराना काल बहुत दुखदायी है। लेकिन मैं आज सकारात्मक सोच के साथ आपको मेरी कुछ प्रमुख उपलब्धियां बता रहा हूं कि मैंने इस कठिन दौर में भी घर पर रह कर लाकडाउन का पालन करते हुए बहुत कुछ सीखा है। जैसे - सबसे पहले     1-मैंने मोबाइल पर आकर्षक सम्मान पत्र बनाना एवं डिजाइन बनाना सीख लिया है जिसे बनाने में बज़ार में लगभग 200-300रुपए लगते हैं।
          2- मैंने घर पर ही सेविंग करना दाढ़ी बनाना भी सीख लिया है। पहले मैं सेलून पर बनवाता था। अब लाकडाउन के बाद घरपर ही अपने हाथ से बनाता हूं।
     3- ई-बुक बनाना भी सीख लिया है अब तक 60 से अधिक ई-बुक्स लाकडाउन में ही बना ली है।
4- व्हाट्स ऐप पर एक ग्रुप "जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़" नाम से बनाकर पर हिंदी एवं बुंदेली में दैनिक साहित्य लेखन कर रहा हूं।
5- लाक डाउन से पहले मैं साहित्य में दोहा नहीं लिख पाता था लेकिन अड बहुत बढ़िया तरीके से सीख गया हूं विगत 11माह से प्रतिदिन 3-5 दोहे दिये गये बिषय पर लिखकर अब तक लगभग 400 दोहे लिख चुका हूं। शीघ्र ही दोहे की एक हिंदी में और एक बुंदेली में पुस्तक छपवाने का विचार है।
6- लाक डाउन में आपनी तीन पुस्तकें एक बाल कविता संग्रह,एक लघुकथा संग्रह और एक लोककथा संग्रह, तैयार करके छपने को प्रेस में भेज दी है।
7-घर की बालकनी और छत पर बागवानी करके फूलों से सजा दिया है छत पर गमले में तोरई लगायी जो कि अब फलने लगी है। घर के बगीचे में इस साल अमरूद के साथ साथ पपीते भु खूब फले है। खूब छककर खाये और पडौसियों को भी खिलाये। इस दोरान घर पर ही चायपत्ती एवं प्याज से खाद बनाना सीखा अब बगीचे में वही डालता हूं।
8- जहां लाक डाउन में लोगों का घर में पड़े -पड़े आराम करते हुए वजन बढ गया वहीं मैंने अपनी छत पर ही सुबह शाम नियमित घूमकर बिना डाइटिंग किये सात महीने में लगभग 10किलो कम कर लिया है।
9- बगीचे और घर की छत पर पक्षियों के लिए नियमित ताजा जल भरा तथा गेहूं, चावल, पोहा आदि स्वयं अपने हाथ से रखा, मेरे छोटे से बगीचे में गिलहरी, गोरैया,तोता, कवूतर, कौआ,कोयल, मधुमक्खी, तितलियां, बिल्ली,आदि ने स्कोरे मेसे जल पिया है। तोते और गिलहरियों ने तो खूब अमरूद खाये। तो गेट पर तीन-चार गाय और दो कुत्तों ने रोटियां, सब्जियां के छिलके खाने रोज आने का नियम बना रखा है। गाये तो इतनी होशियार है कि वे बाहर का लोहे का बड़ा सा गेट अपने सिर व सींग से बजाती है। बिना खाने वापिस नहीं जाती है। घर में ऊपरी हिस्से में वेंटीलेटर पर एक जोड़ी जंगली कबूतर कई से रहता है। तो नीचे किचन के एक्जास्ट फैन वाले गोल हिस्से में गोरैया चिड़िया सपरिवार रहती है। नीचे सूखी नाली के पास ही एक बिल्ली रोज रात में सोती है। इन सबको देखकर मन आनंदित होता है। पूरा टैंशन दूर हो जाता है। दिल को एक सुकून मिलता है।
  10-और सबसे बड़ी बात की इस भयानक महामारी कोरोना  से खुद को एवं परिवार को अबतक बचाये रखा है। जबकि कभी किराने फल सब्जी लेने भी घर से बाहर जाना पड़ा लेकिन मैंने डबल मास्क लगाया और पूरी सावधानी बरती। पर वापिस आने पर सेनेटाइजर का उपयोग किया फिर स्नान किया।
और भी बहुत कुछ सीखा है। चलिए अब हमारे सोने का समय हो गया है। बाकी बातें अगले भाग में करेंगे एक नये बिषय के साथ।
शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे।

आपका अपना-

-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'
संपादक-'आकांक्षा' पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,टीकमगढ़
पिन कोड-472001 (मप्र) भारत
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Email- ranalidhori@gmail.com
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4)
मेरी प्रिय डायरी  (भाग-4) (पाप या पुण्य)
                -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)

                            दिनांक 27-5-2021 समय रात 9:30

मेरी प्रिय डायरी,

         आत्मिक स्नेह
     कभी कभी हमें पता नहीं नहीं चलता कि हम पुण्य कमा रहे है कि पाप। आपको स्वयं की एक घटना बता रहा हूं फिर आप निर्णय करना कि मैंने क्या कमाया पुण्य या पाप।
               हुआ यूं कि मैं अपने बगीचे में गुलाब के गमले में चाय बनाने के बाद जो चाय पत्ती बचती है उसे धूप में सुखा कर फिर  गमलों में डाल देता हूं यह गुलाब के लिए एक बेहतरीन खाद है जो कि हमें घर में ही मुफ्त में मिल जाती है। तो इस बार अभी गर्मियों में मैंने अपने छत पर जीना के नीचे धूप से बचाने के लिए पौधौं को रख दिया तब एक दिन मैंने कुछ चाय पत्ती गुलाब के गमले में डाल दी और फिर पानी डाल दिया।
                  शाम को जब मैं छत पर घूमने गया तो देखा कि उस गमले में मिट्टी में कुछ चींटियां दिखी जो संभवतः उस डली हुई चाय पत्ती को खा रही थी, जो कि चाय बनाते समय शक्कर डालने से उसमें मीठा पन अभी भी रहा होगा।
        यह देखकर मुझे खुशी हुई कि चलो इन चींटियों को खिलाने का कुछ पुण्य तो मिलेगा ही। यह सोचकर आत्मिक प्रसन्नता हुई। दो तीन दिनों में इन चींटियों की संख्या बहुत बढ़ गयी।
एक दिन सुबह जब मैं पौधों को पानी देने के लिए आया तो देखा कि गौरैया चिड़िया गमले में बैठकर मजे से चींटियां खा रही थी। ये देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। दिल ने कहा इन चींटियों की हत्या का तो तुम्हारे सिर आयेगा। तुम्हीं ने तो गमले में चाय पत्ती डाली थी नहीं डालते तो चींटियां भी नहीं आती।
    अब मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा हूं कि मैंने पुण्य कमाया है कि पाप। मैंने ठीक किया या गलत।
अब आप सुधी पाठक ही बताये मैंने पाप अधिक कमाया कि पुण्य।
आपके विचार मुझे संबल देगे। आगे दिशा भी देंगे इसलिए कृपया अपने विचार और मत अवश्य कमेंट्स बाक्स में जरूर लिखिएगा ।
धन्यवाद बस आज इतना ही शेष फिर..
 
शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे।

आपका अपना-

-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'
संपादक-'आकांक्षा' पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,टीकमगढ़
पिन कोड-472001 (मप्र) भारत
मोबाइल-91+9893520965
Email- ranalidhori@gmail.com
Blog- rajeevranalidhori.blogspot.com
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मेरी प्रिय डायरी  (भाग-5) (मेरा खेल जीवन)

                -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)

                            दिनांक 28-5-2021 समय रात 10:30

मेरी प्रिय डायरी,
         आत्मिक स्नेह
   चलिए आज हम आपको अपने खेल जीवन के बारे में कुछ रोचक जानकारी देते है। कक्षा आठवीं से मैंने स्कूल में खेलना सीखा मेरे प्रमुख खेल बैंडमिंटन, बास्केटबॉल टेविल टेनिस और क्रिकेट रहे है थोड़ी बहुत फुटबॉल भी खेली है। लेकिन एक दिलचस्प बात बताये कै मेरे पिताजी ने मेरा नाम राजीव एक हाकी खिलाड़ी को देखकर रखा था क्या है कि टीकमगढ़ में अखिल भारतीय श्री वीर सिंह जू देव हाकी टूर्नामेंट हर साल होता है। उसमें अनेक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी आते हैं। सन् 1972 में जब टूर्नामेंट हुआ तो एक हाकी खिलाड़ी राजीव कुमार आये थे उन्होंने ने बहुत बढ़िया खेल दिखाया था उसी से प्रभावित होकर पापा जी ने मेरा नाम भी राजीव रख दिया था जबकि मेरी राशि का नाम हरि शंकर है।
                 और सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि मैंने जीवन में कभी हाकी नहीं खेली है। हां लेकिन एक बात जरूर है कि हथ साल हाकी टूर्नामेंट देखने जरूर जाता हूं सेमीफाइनल और फाइनल तो अभी नहीं चूकता हूं।
                खैर स्कूल के मैदान में हर रविवार का पूरा दिन क्रिकेट के नाम रहता था मैं बैटिंग तो राइट हैंड से करता था लेकिन बालिग लेफ्ट हाथ से करता था। मैं उस समय तामिया तहसील  जिला छिंदबाडा में एक बेहतरीन लेग स्पिनर था।
             सुबह 6 बजे से 8 बजे एवं शाम को 4:30से 6बजे तक बास्केटबॉल प्रतिदिन खेला करता था। हम लोग बहुत बढ़िया बास्केटबॉल खेलते थे। उस समय सन् 1988 में  जिला स्तरीय प्राइज मनी टूर्नामेंट दस हजार रुपए का होते थे हमारी टीम तहसील की थी और हमें जिला स्तर पर छिंदवाड़ा खेलने जाना पड़ता था। हम लोग केवल पहली वार ही फाइलन में हारे थे उसके बाद लगातार तीन बार हम लोगों ने फाइनल जीत कर दस दस हजार की राशि जीती थी पहले बार की राशि से हमें स्कूल के प्राचार्य और कोच द्वारा टेक सूट उपहार में मिले थे फिर दूसरी बार की राशि से मैदान जो कच्चा था उसे सीसी बना दिया गया है मैं टीम का तीन साल कक्षा 18,11,12 में कप्तान रहा। मैंने लेफ्ट हैंड से खेलते हुए  कई बार सेंटर लाइन से बास्केट किये हैं।
                हमें दो कोच एक श्री साहू जी और एक चंडीगढ़ के सरदार जी सिखाते थे उनकी मेहनत औ हमारी प्रेक्टिस से मेरा जूनियर वर्ग में तीन  वार संभागीय स्तरीय खेल एवं एक बार स्टेट लेविल तक हुआ था। हमने खूब बास्केटबॉल खेला।
               इसी प्रकार से मैं बैडमिंटन भी बहुत बढ़िया खेलता था मैं बायें हाथ से खेलता था और शोर्ट इतनी जोर से मारता था कि सामने वाले को रिटर्न करने का मौका ही नहीं मिल पाता था। बैडमिंटन में भी मैं दो बार संभाग स्तर तक खेल आया हूं।   
                         होंशगाबाद में संभागीय खेल होता था। मैं दो बार खेलने गया किन्तु हार गया कारण यह भी था कि तामिया में जहां मैं प्रैक्टिस करता था वहां इनडोर मैदान नहीं था। मुझे आउटडोर प्रैक्टिस करना पडती थी लेकिन जब जिला स्तरीय एवं संभाग में खेलने गया तो वहां मैच इनडोर स्टेडियम में हुए। बैडमिंटन में इनडोर और आउटडोर खेलने में बहुत अंतर होता है। यही वजह थी कि मैं बाहर हार जाता था। लेकिन उस समय ओपन टूर्नामेंट होते थे उसमें अनेक बार सिंगल्स जीता हूं डबल्स में भी मैं पीछे खेलता था और जब भी शटल थोड़ी ऊंची दिखी तुंरत साथी को छोड़ दें बोलकर एक जोरदार शोट मार देता था। यदि सामने वाले ने धोखे से सही रिटर्न कर दिया तो फिर दूगनी गति से फिर शोट मारता था कि सामने वाला देखता ही रह जाता था।
                   एक बार जब मै टीकमगढ़ आया तो मैं शुरू में सिविल लाइंस में एक जैन के मकान में किराए से रहता था वहीं पास में  बैडमिंटन का मैदान बनाकर हम लोग रोज रात में खेलते थे। एक दिन मेरे साथ खेलने वाले एक के कालेज के कुछ मित्र उससे मिलने आये तो उस समय मेरे 12 और उसके 2 प्वाइंट बने थे ये देखकर उसके मित्र उसे चिढ़ाने लगे तो उसने भी गुस्से में कह दिया तुम एक ही प्वाइंट बना लो तो मान जिय, उन्हीं मे से एक जो अच्छा खेलता होगा वह बोला मैं खेलता हूं और उसने रैकेट हाथ में ले लिया।
            तब वह पडौसी मेरे पास आकर कान में बोला भाई साहब हमारी कसम है इसके एक भी प्वाइंट नहीं बनने देना। सौभाग्य से मैंने उसके एक भी प्वांइंट नहीं बनने दिया वह 15:0 से हार गया तो बोला भाई साहब माफ करना मैंने आपको यहां पहली बार देखा है आप यहां के नहीं है। मैंने कहा मैं छिंदवाड़ा से आया हूं। अब जब कभी वह मुझे बाज़ार में मिलता है तो शर्म से मुंह झुका लेता है ‌। टेबिल टेनिस मैंने कालेज में खेली लेकिन उचित माहौल नहीं मिलने और समय नहीं मिलने के कारण इसमें आगे नहीं बढ़ पाया।
                 मेरे पास बैडमिंटन और बास्केटबॉल के  प्रमाण पत्र अभी तक सुरक्षित रखे है। लेकिन अब तो सब खेल छूट गया है।
तो ये तो था मेरे खेल जीवन की कुछ झलकियां।
                    शेष फिर कभी। आज बस इतना ही।
शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे।

आपका अपना-
-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'
संपादक-'आकांक्षा' पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,टीकमगढ़
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6)
मेरी प्रिय डायरी  (भाग-6) (मोबाइल को कोराना हुआ)
                -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)

                            दिनांक 31-5-2021 समय रात 10:30

मेरी प्रिय डायरी,
         आत्मिक स्नेह
                      कल रात जरा सी लापरवाही से मेरे मोबाइल को कोरोना हो गया। हुआ यूं कि मैं प्रतिदिन की तरह रात को 8 बजे अपने घर की बीच वाली छत पर एक-दो घंटे घूमता हूं। तब बीच में प्यास लगती है तो वहीं ऊपर ही पीने वाली टंकी से अलग से नल लगा हुआ है। तो जब आधे घंटे घूमने के बाद मुझे प्यास लगी तो मैं एक हाथ में खाली गिलास पकड़े था और दूसरे हाथ में मोबाइल फिर जिस हाथ में मोबाइल था उसी हाथ से नल की टोंटी खोलने लगा तो मोबाइल सरक कर नीचे पानी भरी बाल्टी में गिर गया एक सेंकेड से भी कम समय में मैंने मोबाइल को बाल्टी में से उठा लिया
               चूंकि कवर लगा था तो शीघ्र ही मैंने कवर निकाला उसे रूमाल से पोंछा साफ किया फिर डरते डरते उसे आन किया तो शुक्र है मोबाइल चालू हो गया मैं बहुत खुश था कि चलो मोबाइल को कुछ नहीं हुआ नहीं तो लाकडाउन में कैसे सुधरता। बैटरी चार्ज थी खूब चलाया और जब रात में ग्यारह बजे बैटरी 30प्रतिशत रह गयी यब मोबाइल को रख दिया मैं रोज सुबह 5 पांच खा अलार्म भर  देता हूं और जब 5 बजते है तो मोबाइल चार्ज पर लगा कर फिर सो जाता हूं और फिर जब मैं 7 बजे उठता हूं तो मोबाइल 100प्रतिशत चार्ज मिलता है। फिर अभी लाकडाउन चल रहा है तो सब काम देर से आराम से होते है सुबह 1घंटे छत पर घूमता हूं।
                   आज जब सुबह सात बजे उठा तो देखा कि मोबाइल चार्ज ही नहीं हुआ था लगता था उसकी पिन में जो छेद होते है उसमें पानी घुस गया होगा इसलिए मोबाइल कुछ सेंकेड बाद चार्ज होना बंद हो गया था।अब मैं बहुत टेंशन में आ गया सोचा मैं तो कोराना से अब तक बचा रहा लेकिन मेरे मोबाइल को पानी में डुबकी लगाने से निमोनिया हो गया जिसके कारण उसे चार्ज होने (सांस लेने में तकलीफ होने लगी)।
                       मैं समझ गया इसे कोरोना हो गया। इसका हीट लेविल कम हो गया है मैंने अंतिम ऊपाय करते हुए उस विटामिन डी को डोज देने के लिए उसे दो घंटे तक धूप में रख दिया। फिर जब मोबाइल उठाया तो वह ओवर हीट का मेसेज दे रहा था मैंने थोड़ी दे उसे छाया में रखकर सामान्य अर्थात ठंडा किया।
                    फिर राम का नाम लेकर मोबाइल पुनः चालू किया मोबाइल चालू हो गया मैं खुश था फिर भी उसे चार्ज करना था और चैक करना था कि वह सही से चार्ज हो रहा है कि नहीं। चैक किया तो वह चार्ज हो रहा है अब मैं बहुत खुश था कि चलो मेरा मोबाइल का कोराना विटामिन डी के डोज से ठीक हो गया।
                 इसीलिए कहते है कि जरा सी लापरवाही बहुत मंहगी पड़ सकती है। ये तो निर्जीव मोबाइल था लेकिन हम मनुष्य है और जुवन बहुत अनमोल है इसकी कद्र कीजिए।
कोरोना का खतरा अभी गया नहीं है हमें सावधानी बरतना जरूरी है। बिना मास्क के घर से बाहर नहीं निकलना है गाइडलाइंस का पूरी तरह से पालन करना है।
घर पर रहे स्वस्थ्य रहे सुरक्षित रहे।

     आज शाम चार बजे गूगल मीट पर कला मंदिर भोपाल की आनलाइन हास्य-व्यंग्य गोष्ठी में काव्य पाठ किया। गोष्ठी के मुख्य अतिथि रायपुर से श्री पंकज गिरीश जी थे एवं अध्यक्ष डां गौरीशंकर गिरीश जी ने की संचालन गोकुल सोनी व कांता राय जी ने किया। 15 लोगों ने पढ़ा।
  आज बस इतना ही, शेष फिर कभी।
शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे

आपका अपना-
-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'
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(7)

मेरी प्रिय डायरी (भाग-7) (नयी विधा में लेखन और पुरस्कार)

           -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)

                           दिनांक 9-6-2021 समय रात 8:30

मेरी प्रिय डायरी,

        आत्मिक स्नेह

            मेरे एक मित्र हैं उन्हें अक्सर रात में नींद नहीं आती और जब आती है तो सुबह चार बज जाते है फिर क्या 10 बजे उनका सबेरे होता है उनकी नौकरी भी ऐसी है कि दोपहर 2बजे से 8 बजे तक वो भी वर्क टू होम कहीं जाने का झंझट ही नहीं। जब उन्होंने मुझे अपनी व्यथा सुनायी तो मैंने उन्हें काव्य की नयी नयी विधाएं लिखने के लिए उकसाया बैसे वे दोहा गीत, तो लिख लेते है।

              इसलिए मैंने एक दिन उनसे तांका छंद लिखने को कहा पूरी नियम बता दिये उन्होंने ने रात में अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाये और 5 तांका लिखकर मुझे भेज दिये सबेरे देखा तो पांच तांका पढ़ें अच्छे बन गये थे मैंने उन्हें बधाई दी। कुछ दिन बाद मैंने उनसे कहा पिरामिड कविता लिखने लगो दो-तीन उदाहरण देकर बता दिया कैसे लिखते है फिर क्या है रात में उनने तीन पिरामिड कविता बनाकर मुझे पोस्ट कर दी सुबह मैंने मोबाइल पर देखा तो पढ़कर अच्छा लगा बढ़िया कविता बन गयी थी मैंने फिर से बधाई दी। उन्हें भी अब मज़ा आने लगा जब मैंने देखा कि वे अच्छा लिखने लगे तो मैं भी विधा में दो-तीन रचनाएं लिखकर पोस्ट कर देता इस प्रकार से हम दोनों ही नयी नयी विधाऔ में कलम चलाने लगे बहुत आनंद आया और नयी रचनाएं भी हो गयी।

                     सौभाग्य से एक प्रतियोगिता में इन्हीं नयी रचना पर एक दिन एक हजार एक सौ रुपए का द्वितीय पुरस्कार मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा है। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि मेरा उस अखिल भारतीय प्रतियोगिता में दूसरा स्थान मिला है जब आयोजक ने सम्मान पत्र मोबाइल पर भेजा दिया फिर मेरा खाता नंबर मांगा और कहा की हम राशि आपके खाते में ट्रांसफर कर देते है तो मैं घबरा गया कहीं धोखाधड़ी का शिकार न हो जाऊ।
             अब मैंने दिमाग लगाया और जिसे पहला पुरस्कार मिला था उसको मोबाइल लगाकर पूछा तो उसने कहा सही आदमी है मेरे खाते में राशि आ गयी है तब मैंने भी उन्हें अपना बैंक खाता नंबर भेज दिया शाम उन्होंने राशि मेरे खाते में ट्रांसफर कर दी। मुझे बहुत आत्मिक खुशी हुई।             

कभी कभी ज्ञान देने के साथ साथ उस पय स्वयं भी अमल करे तो हमें फायदा हो जाता है।


आज बस इतना ही, शेष फिर कभी।


शुभरात्रि, स्वस्थ रहे, मस्त रहे।

आपका अपना-

-राजीव नामदेव _राना लिधौरी'

संपादक-'आकांक्षा' पत्रिका

अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़

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गुरुवार, 27 मई 2021

ग़ज़ल लिखना सीखें- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ मप्र

आओ ग़ज़ल लिखना आसानी से सीखें-
राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)


आलेख- आओ ग़ज़ल लिखना सीखे -
                              -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

आइये हम सिखाते है कि ग़ज़लें कैसे कही(लिखी) जाती है। थोड़े से अभ्यास से आप भी आसानी से ग़ज़ल लिखना/कहना सीख सकते हैं।
सीखने के लिए आपको यह बहुत जरूरी है-

1-मात्रा लघु गुरु ज्ञान हो। 
2-रुक्न (अरकान) की जानकारी हो।
3-बहरों का ज्ञान हो।
4-काफ़िया का ज्ञान हो।
5-रदीफ का ज्ञान हो।
6-शेर और उसका मफ़हूम (कथन)।
एवं ग़ज़ल की जबान की समझ हो।
7-शब्द भंडार हो।

1- मात्रा ज्ञान-

क) जिस अक्षर पर कोई मात्रा नहीं लगी है या जिस पर छोटी मात्रा लगी हो या अनुस्वार (ँ) लगा हो सभी की एक (१) मात्रा
गिनी जाती है.

ख) जिस अक्षर पर कोई बड़ी मात्रा  लगी हो या जिस पर   अनुस्वार (ं) लगा हो  या जिसके बाद क़ोई आधा  अक्षर   हो सभी की दो (२) मात्रा
गिनी जाती है।

ग) आधाअक्षर की एक मात्रा उसके पूर्व के अक्षर की एकमात्रा  में जुड़कर उसे दो मात्रा का बना देती है।

घ) कभी-कभी आधा अक्षर के पूर्व का अक्षर अगर दो मात्रा वाला पहले ही है तो फिर आधा अक्षर की भी एक मात्रा अलग से गिनते हैं. जैसे-रास्ता २ १ २ वास्ता २ १ २ उच्चारण के अनुसार।
ज्यादातर आधा अक्षर के पूर्व  अगर द्विमात्रिक है तो अर्द्धाक्षर को छोड़ देते हैं उसकी मात्रा नहीं गिनते. किन्तु  अगर पूर्व का अक्षर एक मात्रिक है तो उसे दो मात्रा गिनते हैं. विशेष शब्दों के अलावा जैसे इन्हें,उन्हें,तुम्हारा । इनमें इ उ तु की मात्रा एक ही गिनते हैं। आधा अक्षर की कोई मात्रा नहीं गिनते।

च) यदि पहला अक्षर ही आधा अक्षर हो तो उसे छोड़ देते हैं कोई मात्रा नहीं गिनते। जैसे-प्यार,ज्यादा,ख्वाब में प् ज् ख् की कोई मात्रा नहीं गिनते।

उदाहरण के लिए हम कुछ अभ्यास यहाँ दिए जा रहे हैं।

शब्द.       उच्चारण.    मात्रा (वजन)

कमल-        क मल-       १२
चेह्रा            चेह रा         २२
शम्अ.         शमा           २१
कह्र.             कहर.        २१
शह्र.             शहर.         २१
दोस्त.           दोस्त.          २१
जिन्दगी        जिन्दगी       २१२
बरहमन.     बर ह मन      २१२
तुम्हारा         तुमारा         १२२
दोस्ती            दो स् ती      २१२
नज़ारा          नज़्जारा       २२२
                      नज़ारा      १२२
                       नज़ारः     १२१
रामनयन-  रा म न यन.   २११२


२- रुक्न /अरकान की जानकारी :-

 रुक्न को गण ,टुकड़ा या खण्ड कह सकते हैं।
इसमें लघु (१) और दीर्घ (२) मात्राओं का एक निर्धारित क्रम होता है। 
कई रुक्न (अरकान) के मेल से मिसरा/शेर/गज़ल बनती है।।
इन्हीं से बहर का निर्माण होता है।

मुख्यतः अरकान कुल आठ (८) हैं।

नाम             वज़न     शब्द

१-मफ़ाईलुन.  १२२२.   सिखाऊँगा
२-फ़ाइलुन.     २१२.     बानगी
३-फ़ऊलुन.     १२२.    हमारा
४-फ़ाइलातुन.  २१२२. कामकाजी
५-मुतफ़ाइलुन११२१२ बदकिसमती
६-मुस्तफ़इलुन  २२१२ आवारगी
७-मफ़ाइलतुन १२११२ जगत जननी
८-मफ़ऊलात  ११२२१ यमुनादास

ऐसे शब्दों को आप स्वयं चुन सकते हैं।
इन्हीं अरकान से बहरों का निर्माण होता है।

३-बहर :-

रुक्न/अरकान /मात्राओं के एक निश्चित क्रम को बहर कहते हैं।
इनके तीन प्रकार हैं-
१-मुफ़रद(मूल) बहरें।
२-मुरक्क़ब (मिश्रित) बहरें।
३-मुजाहिफ़ (मूल रुक्न में जोड़-तोड़ से बनी)बहरें।
बहरों की कुल संख्या अनिश्चित है।

गजल सीखने के लिए बहरों के नाम की भी कोई जरूरत नहीं। केवल मात्रा क्रम जानना आवश्यक है,इसलिए यहाँ प्रचलित ३२ बहरों का मात्राक्रम दिया जा रहा है। जिसपर आप ग़ज़ल कह सकते हैं, समझ सकते हैं।

प्रचलित बहर-

(1)-212-212-212
(2)-122-122-122
(3)-2212-2212
(4)-2212-1212
(5)-2122-2122
(6)-2122-1212-22
(7)-212-212-212-2
(8)-122-122-122-12
(9)-2122-1122-22
(10)-2122-2122-212
(11)-122-122-122-122
(12)-2212-2212-2212
(13)-212-212-212-212
(14)-2122-2122-2122
(15)-221-2122-221-2122
(16)-1212-1122-1212-22
(17)-221-2121-1221-212
(18)-11212-11212-11212-11212
(19)-1212-212-122-1212-212-122
(20)-12122-12122-12122-12122
(21)-1222-1222-122
(22)-1222-1222-1222
(23)-2122-2122-2122-212
(24)-2122-1122-1122-22
(25)-1121-2122-1121-2122
(26)-2122-2122-2122-2122
(27)-212-1222-212-1222
(28)-221-1221-1221-122
(29)-221-1222-221-1222
(30)-1222-1222-1222-1222
(31)-212-1212-1212-1212
(32)-1212-1212-1212-1212

विशेष नियम :-
जिन बहरों का अन्तिम रुक्न 22 हो उनमें 22 को 112 करने की छूट हासिल है।
नोट- गज़ल कहने के लिए किसी उस्ताद शायर से इस्लाह जरूर करा लेना चाहिए।
ग़ज़ल कहना (लिखना) और पढ़ना दोनों अलग-अलग फन है। तन्नुम से उसका असर बहुत बढ़ जाता है।
***
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*आलेख- ग़ज़ल लिखना कैसे सीखे -(भाग-2)*

                  *-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'*
आज हम ग़ज़ल में मक्ता, मतला, रदीफ और काफिया के बारे में संक्षिप्त में जानेंगे।
*मतला-*  ग़ज़ल के पहले शेर को मतला कहते है।

*मक्ता-*  ग़ज़ल के सबसे आख़िरी शेर को मक्ता कहते है। अधिकांश शायर मक्ते में अपना उपनाम तखल्लुस लिखते हैं। इसी शेर को जब कोई कव्वाल एवं गायक पढ़ते हो तो सुनने वाले को पता चल जाता है कि ये ग़ज़ल किसने लिखी है।

*रदीफ-* ग़ज़ल की पहली पंक्ति एवं दूसरी, चौथी, छठवीं, आठवीं, दसवीं, बारहवीं आदि में अंतिम में जो शब्द बार बार उपयोग किया जाता है उसे रदीफ कहते है।
 जैसे- मेरी ग़ज़ल का ये शेर देखे-
       *ग़ज़ल-*
तुम मुझे याद बहुत आते हो।
आंख से दिल में समा जाते हो।।

हो तुम्हीं मेरी मुहब्बत का फ़ूल।
ज़िन्दगी को तुम्हीं महकाते हो।।

तुम तसब्बुर में मिरे आ आकर।
किसलिए तुम मुझे तड़पाते हो।।

प्यार करते हो मुझे तुम भी मगर।
मुंह से कुछ कहने में शरमाते हो।।

*'राना'* हम तुम को भुलाएं कैसे।
दिल के मंदिर में बसे जाते हो।।
***
*गजलगो- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)*

1- उपरोक्त ग़ज़ल में 'निम्नलिखित शेर *मतला* है-

तुम मुझे याद बहुत आते हो।
आंख से दिल में समा जाते हो।।

2- उपरोक्त ग़ज़ल में 'निम्नलिखित शेर *मक्ता* है-

'राना' हम तुम को भुलाएं कैसे।
दिल के मंदिर में बसे जाते हो।।

3- उपरोक्त ग़ज़ल में *"राना"* शायर का तकल्लुस है।देखे आखिरी शेर-
*'राना'* हम तुम को भुलाएं कैसे।
दिल के मंदिर में बसे जाते हो।।

4- *क़ाफिया* - उपरोक्त ग़ज़ल में *आते,जाते, महकाते, तड़पाते, शरमाते जाते क़ाफिया हैं*  इसमें *ते* का *क़ाफिया* लिया गया है।

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लेख- ग़ज़ल लिखना  सीखे -भाग-3

अर्कान (गण):-

उर्दू में अर्कान जिन्हें हिंदी में गण कहते है आठ होते हैं-
इन्ही़ से बहरों ,रूक्न (छंदों)का निर्माण होता है।
1- फ़ऊलुन- 122 - जिसमें पहला लघु वर्ण फिर दो दीर्घ गुरु वर्ण होता है।
2- फ़ाइलुन- 212- जिसमें पहला गुरु वर्ण फिर एक लघु वर्ण फिर एक गुरु वर्ण होता है।
3-मफ़ाईलुन-1222
4- फाइलातुन-2122
5-मुस्तफ़इलुन-2212
6- मुतफ़ाइलुन-11212
7-मफ़ऊलातु-2221
8*मुफ़ाइलतुन-12112

लघु मात्रा वाले वर्ण-
अ,इ,उ,ऋ, यह वर्ण एक स्वरपूर्ण माने जाते है।
दीर्घ (गुरु) 2 मात्रा वाले वर्ण-
आ,ईऊ,ए,ऐ,ओ,औ,अं,अ:, को दो वर्ण का माना जाता है।
आ,ईऊ,ए,ऐ,ओ,औ,अं,अ:, की मात्राओं को एक स्वररहित वर्ण माना जाता है। यह मात्राएं जिस अक्षर में लगी होती हैं उस अक्षर को अपना स्वर देकर स्वयं  स्वररहित वर्ण का स्थान प्राप्त कर लेती हैं।
अ,इ,उ,ऋ, की मात्राएं जिस वर्ण के साथ जुड़ी होती हैं उस वर्ण को स्वरपूर्ण बना देती हैं।इसी कारण इन मात्राऔं वाले वर्ण को केवल एक स्वरपूर्ण वर्ण ही गिना जाता है।

गणों के प्रतीक चिन्ह-
पिंगल में लघु के लिए । और गुरु s के लिए का प्रयोग किया जाता है।
ऊर्दू में सबब सक़ील (।।) एवं सबब खफ़ीफ़ (s) कहा जाता है।
हम यहां पर नीचे कुछ उदाहरण दे रहे है ताकि आसानी से समझ में आ जाये-

रुक्न    -     गण          -       प्रयोग पिंगल अनुसार- प्रयोग अरूज़ अनुसार- साकिन वर्णों की पहचान

मफ़ाईलुन- यगण+गरु (।sss)    यशोदाजी             मुहब्बत कर                मुहबबत कर्            
    
मफ़ाईलुन- तगण+गरु (ss।s)    संजीवनी               अपना नगर                अपना नगर्        

मु-तफ़ाइलुन-सगण+लघु+गुरु      कविता कला          रुचि पूर्वक                  रुचि पूरवक

एक उदाहरण देखें-

सितारों  की  चमक से  चोट लगती  है  रगे  जां पर
।s s     s     । s    s    s।   s s    s  ।s   s    s

अब इसी मिसरे को जब चार वार 'मफ़ाईलुन' में बांटेंगे तो स्तिथि इस प्रकार होगी-

मफ़ाईलुन    मफ़ाईलुन      मफ़ाईलुन    मफ़ाईलुन
सितारों की   चमक से चो   ट लगती है    रगे जां पर

इस प्रकार से मिसरे में शब्दों का खंडित होना और अक्षरों का आगे पीछे जुड़ जाना स्वाभाविक है।
इसी प्रकार से अनुस्वार अरूज़ के नियम के अनुसार कहीं गिने जाते है तो कहीं पर अल्प मात्रा में गिने जाते है कभी नगण्य भी हो जाते है।
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*आलेख- ग़ज़ल लिखना  सीखे -भाग--4*
*मात्रा गिनना सीखें-*

ग़ज़लकार-श्री सुखविंद्र सिंह मनसीरत जी  खेड़ी राओ वाली (कैथल)की एक ग़ज़ल की मात्रा गिनना (तख़्ती) सीखेंगे-

*(1-)पूरी ग़ज़ल-*
ग़ज़ल का भार (वज़न) -222 222 221 2=19

तन भीगा   भीगा  मन  सूखा रहा।
सावन  में  भी  साजन  रूठा रहा।।

जहरी बन कर  विष को पीता रहा।
कड़वे विष  का भी रस मीठा रहा।।

मय को पीकर मैं मयकश भी बना।
महफ़िल में  दिलजानी रूखा रहा।।

बारिश  बूंदें  गीला  कर  ना सकी।
बरसाती   मौसम  में  प्यासा  रहा।।

मनसीरत  मन ही  मन चाहे  तुझे।
नफरत में दीपक बन जलता रहा।।
**************************
ग़ज़लकार- सुखविंद्र सिंह मनसीरत
     खेड़ी राओ वाली (कैथल)

*ग़ज़ल का भार (वज़न) -222 222 221 2=19*
रदीफ- *"रहा"*
क़ाफिया- आ का ,= *रूठा,सूखा,पीता, मीठा,जलता,प्यासा*

तन  भीगा   भीगा  मन  सूखा।  रहा।
2      22     22    2      22  1 2

सावन   में  भी  साजन  रूठा रहा।।
2  2    2   2   2   2   22  1 2

जहरी बन कर  विष को पीता रहा,
2  2    2   2   2   2   22  1 2

कड़वे विष  का भी रस मीठा रहा।
2  2    2   2   2   2   22  1 2

मय को पीकर   मैं  मयकश भी बना,
2   2   2   2   2    2   2    2  1 2
महफ़िल   में  दिलजानी रूखा  रहा।
2     2    2   2     22   22   1 2
बारिश  बूंदें  गीला  कर  ना सकी,
2  2    2 2   22   2     2  1 2
बरसाती   मौसम  में  प्यासा  रहा।
2  2 2      2  2   2   22    1 2

मनसीरत  मन  ही  मन चाहे   तुझे,
2  2  2     2   2   2   22   1 2
नफरत में दीपक बन जलता   रहा।
2  2    2   2 2   2   2   2   1 2
**************************
-सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)
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उदाहरण-*(2)*
       *ग़ज़ल- राना लिधौरी*

*रदीफ-* हो

*काफिया-* आते,जाते,महकाते, तड़पाते,शरमाते,जाते,

*भार-* 212   211   222=17
तुम मुझे    याद    बहुत आते  हो।
  2   12    2 1     12   2 2   2  =17

आंख  से    दिल  में  समा जाते  हो।।
2 1   2        2  1  12   2 2   2  =17

हो तुम्हीं मेरी मुहब्बत का फ़ूल।
ज़िन्दगी को तुम्हीं महकाते हो।।

तुम तसब्बुर में मिरे आ आकर।
किसलिए तुम मुझे तड़पाते हो।।

प्यार करते हो मुझे तुम भी मगर।
मुंह से कुछ कहने में शरमाते हो।।

'राना' हम तुम को भुलाएं कैसे।
दिल के मंदिर में बसे जाते हो।।
***
*गजलगो- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी', टीकमगढ़ (मप्र)*
**********

*उदाहरण-(3) **क्यों दूर हो (गजल) **
*वज़न-**** 2122 2212 ***
*रदीफ*- हो
*क़ाफिया-* दूर,हूर,नूरभरपूर,मजबूर, चूर,भूर
********************

पास  आओ  क्यों  दूर हो,
आप  ही  दिल  की हूर हो।

प्यार  में   पागल  हो  चुके,
हिय जिगर का तुम नूर हो।

देख  कर  हो  बीसों  गुना,
हौसले   से     भरपूर   हो।

ताक    से   रहना    घूरना,
आदतों   से   मजबूर   हो।

जीत ली  हमने हर  खुशी
स्नेह   में  चकना  चूर  हो।

यार   मनसीरत  ने  कहा,
हो  चमकती सी  भूर  हो।
********************
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)
*****
*आलेख-*- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'*
संपादक- 'आकांक्षा'पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
शिवनगर कालोनी,  टीकमगढ़ (मप्र)-472001
मोबाइल-9893520965


- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
संपादक'आकांक्षा'पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
    शिवनगर कालोनी,  टीकमगढ़ (मप्र)-472001
मोबाइल-9893520965

ग़ज़ल-("सोच के सहरा में खड़ा है") -राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

ग़ज़ल--सोच के सहरा में खड़ा है-

खुशियों में उर ग़मों में क्यों इंसान पड़ा है।
हर शख्स यही सोच के सहरा में खड़ा है।।

मंदिर मस्ज़िद के तू फ़र्को में पड़ा है।
ईश्वर हर इक दिलों के ही अंदर जड़ा है।।

जल्दी में हरिक काम बिगड़ता जरूर है।
चखकर तो देखो सब्र का फल मीठा बड़ा है।।

ईमान की रोटी से मिले चैंनों सकूं भी।
हराम की कमाई का फल मिलता सड़ा है।।

इस दौर में लालच की इन्तहा तो देखिए।
भाई से ही भाई क्यों अक्सर लड़ा है।।

हैवान कत्ले आम ही तो रोज़ कर रहे।
इंसान उसे देख कर क्यों सहमा खड़ा है।।

सब लोग यही कहते जो देखा वही सच है।
'राना' तो अपनी बात पे दमखम से खड़ा है।।
      ***
© राजीव नामदेव "राना लिधौरी",टीकमगढ़*
           संपादक "आकांक्षा" पत्रिका
जिलाध्यक्ष म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (मप्र)-472001
मोबाइल- 9893520965
Email - ranalidhori@gmail.com
Blog-rajeevranalidhori.blogspot.com

मंगलवार, 25 मई 2021

दोहा मंजरी (बुंदेली दोहा संग्रह ई बुक)- रामगोपाल रैकवार, टीकमगढ़

                             दोहा मंजरी

                       (दोहा संग्रह) ई_बुक

                दोहाकार-रामगोपाल रैकवार 'कंवल'

        संपादन - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

 प्रकाशन- जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़

                  दिनांक- 25-5-2021

©कापीराइट- रामगोपाल रैकवार,टीकमगढ़ (मप्र)

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                            दोहा मंजरी
                      (बुंदेली दोहा संग्रह)
                      - रामगोपाल रैकवार

                       कवि परिचय

नाम:- रामगोपाल रैकवार
पिता का नाम:- स्व. श्री रामभरोसे रैकवार
माता का नाम:- स्व.श्रीमती मालती देवी
जन्म :- 21-07-1960
शिक्षा :- एम.ए. (भूगोल), बी.एड.
विधा :- गीत , ग़ज़ल, दोहे, व्यंग्य, यात्रा वर्णन,आलेख आदि
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में
प्रसारण :- आकाशवाणी भोपाल एवं छतरपुर से प्रसारण
सम्मान :- अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित
* आंचलिक सम्मान-2004 मप्र लेखक संघ, टीकमगढ़ द्वारा सम्मानित।
* गिजू भाई सम्मान, भोपाल
*शिक्षाविद डॉ. गुलाब सिंह चौरसिया सम्मान, भोपाल
* अ.भा. साहित्य परिषद टीकमगढ़ द्वारा सम्मानित।
संप्रति :- कनिष्ठ शिक्षक डाइट कुण्डेश्वर (टीकमगढ़)
मोबाइल :- 8085153778
पता :-प्रहलादपुरम, तखा टीकमगढ़ (मप्र)

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                   भूमिका-
                           - राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'

                श्री रामगोपाल जी रैकवार एक बहुत बढ़िया साहित्यकार है साहित्य की दोनों गद्य एवं पद्य पर समान अधिकार रखते है जहां वे गद्य में बेहतरीन व्यंग्य,यात्रा संस्मरण, शैक्षणिक आलेख,लिखते हैं तो वहीं पर पद्य में ग़ज़ल,गीत, दोहे और कविता लिखने में भी दक्ष है। आपके अनेक गीत बहुत सराहे गये हैं जिनमें ढ़ूंढ मत ठाव कोई ढूंढ मत छाव कोई अभी लंबा है सफ़र.... एवं आऔ गुनगुनी धूप में बैठे बहुत उत्कृष्ट गीत हैं।
           आप राज्य शिक्षा केंद्र भोपाल से जुड़े हुए हैं आपकी अनेक रचनाएं पाठ्य-पुस्तक में शामिल हैं। रेडियो से आपके अनेक बाल उपयोगी शैक्षणिक आलेख प्रसारित होते रहते हैं।
             श्री रामगोपाल जी को भ्रमण करने का बहुत शौक है देश के अधिकांश धार्मिक स्थलों के दर्शन कर आये है। नेपाल तक घूम आये है। प्रकृति प्रेमी होने के कारण वर्तमान में गुफाओं पर अन्वेषण का काम कर रहे है खासकर बुंदेलखंड में अज्ञात छोटी-बड़ी  गुफाओं की खोज एवं भ्रमण कर रहे है अब लगभग एक दर्जन गुफाओं पर जा चुके हैं। वहां का उत्पत्ति व वहां का प्राचीन इतिहास पता करके आंकड़े एकत्रित कर रहे हैं। आपने रिगौरा, घूरा,जतारा,खरों आदि गुफाओं पर वहां भ्रमण कर शोध किया हुआ है।
            श्री रामगोपाल जी ने लाइब्रेरियन श्री विजय मेहरा जी एवं साहित्यकार श्री राजीव नामदेव 'राना लिधौरी' से साथ टीकमगढ़ जिले में "चलित लाइब्रेरी" का नया प्रयोग भी किया है जिसे काफी सराहना मिली है।
            वर्तमान में आप साहित्यिक संस्था मप्र लेखक संघ टीकमगढ़ जिले इकाई का सचिव है एवं जिले की अनेक संस्थाओं से जुड़े हुए है। आप अ.भा.साहित्य परिषद टीकमगढ़ के अध्यक्ष भी रहे तथा अ.भा.बुंदेलखण्ड़ साहित्य एवं संस्कृति परिषद टीकमगढ़ के महामंत्री के पद पर भी रहे है।
           आप श्री राजीव नामदेव  'राना लिधौरी',के साथ संयुक्त रूप से 'जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़' के ग्रुप एडमिन भी है। इस पटल ने दो ही साल में बुंदेलखंड में अपनी बिशिष्ट पहचान बना ली है। इस पटल पर हिन्दी एवं बुंदेली में नियमित रूप से दिये गये बिषय पर दोहा लेखन होता है।इस पटल पर लगभग पचास चुने हुए सक्रिय सदस्य है जो निरंतर दोहा लेखन कर रहे है। 
इसी पटल पर दिये गये बिषयों पर श्री रामगोपाल जी रैकवार ने भी अपनी कलम बखूबी चलायी है। इन्हीं में से कुछ दोहे 'दोहा मंजरी' ई बुक में हम प्रकाशित कर रहे है। ये दोहे कबीर, तुलसी और बिहारी के दोहों की श्रेणी के हैं। इन दोहों को पढ़कर आप स्वयं मूल्यांकन कर सकते है। आशा है पाठकों को जरूर पसंद आयेंगे। 
 अपनी अमूल्य समीक्षा एवं पाठक प्रतिक्रिया देकर लेखक की होंसला अफजाई जरूर कीजिए।
धन्यवाद

- राजीव नामदेव "राना लिधौरी"
संपादक'आकांक्षा'पत्रिका
अध्यक्ष मप्र लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी, टीकमगढ़ (मप्र)
मोबाइल-9893520965
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दोहा मंजरी
बुंदेली दोहा संग्रह
दोहाकार- रामगोपाल रैकवार
***********

बिषय- छमा

साँसी औषध है छमा,
पूरै मन के घाव।
छमा भाव सें मिटत हैं,
आपुस के दुरभाव।।

वीरन कौ गुन है छमा,
भूषन वीर कहाय।
ऊखों कउं बैरी नईं,
जीखों  छमा सुहाय।।

छमा करत मैं सबइ खों,
छमा करें सब मोय।
जेइ भाव सें सुख मिलै,
सब जग सुखमय होय।।
***

बियय-बब्बा 

बब्बा अनुभव ज्ञान हैं,
बब्बा नेह दुलार।
बब्बा घर की आन हैं,
बब्बा सें परवार।।

बब्बा हम खुद हो गए,
नातन हैं अनमोल।
दादा-दादा कत फिरत,
मीठे नौने बोल।।
**
बब्बा की माटी धरी,
झर-झर रोबै नीम।
जिन्नै लगाइ कर चले,
अंतिम राम-रहीम।।
**
कक्का कयँ सें नइँ लगे
बब्बा कयँ लग जाय।
ऊखों बब्बा हम कयँ,
जो जा किसा बताय।।
*****28-12-2020
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बिषय- उतरन

उतरन जिनकी है पुँजी,
पुज रय हैं चउँ ओर।
बने बिजूका हैं धनी,
की खों देबें खोर।

सजे बिजूका हार में,
हो रई जै-जैकार।
बालें खा रय चौंट कें,
मिट्ठू पैरेदार।।
****
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बिषय-बसंत

नौन मिरच धनिया हरौ,
चटनी, रोटीं चार।
इक हरदी की गाँठ सें,
भई बसंती दार।।
******

बिषय- कलदार

बिड़ी सूँट कें जो पियें,
मैकें फिर कलदार।
छाती अपनी फूँक कें,
मिटा रये घर-बार।।
***
राज ओरछा के हते,
रुपया गदा उभार।
असली चाँदी के बने,
गजासाई कलदार।।
****
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बिषय-पाहुने

पाहुन जैसौ जो रयै,
खूब होय सत्कार।
जो अड़कें रै जाय तौ,
मिलबै रोनी दार।।

पटल-पाँवने आ रये
लैकें दोहा खूब।
जैसें पंडत रय चढ़ा,
हरदी-आखत-दूब।।

*****
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बिषय-फुदना

बारे में पैनत हते,
टोपी फुँदनादार।
जनमदिना पै मिलत ती,
गुड़िया- मोटरकार।।

****
बिषय-मउआ

मउआ मेवा है मदिर,
गुलगुच मधुर मिठास।
भोजन निर्धन का यही,
और कभी आवास।।
***
जानै कितने चढ़ गए,
बलिवेदी पै लाल।
दमकत भारत मात कौ,
उन लालन सें भाल।
****
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बिषय- ततूरी

मोड़ी-मोड़ा  गैल में,
फिर रय उपनय पाँय।
उनै ततूरी  नइ लगै,
दै रय सबरय दाँय।। 


बारो भगबै बायरें,
लयं मताई कौर।
बेटा,ततूरी हो गई,
खेलौ अपनी पौर।।  


जेठ मास की दुपरिया,
बरो जा रऔ चाम।
धरनी ततूरी सें तपै,
परबै चिलका घाम।।

कर्रे बोल न बोलिए,
तन आगी लग जाय
मन की ततूरी न मिटै,
कोटन करौ उपाय।। 
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बिषय-दुपहर

जेठ मास उपनय फिरौ,
फुटका पर जें पाँव।
दुपहर जा बिलमाय लो,
पाखर-बिरछा छाँव।।

*****
बिषय- होरी

होरी होरी में गई,
घर जब नइँयाँ कंत।
फागुन कौ हम का करें,
मन हो गऔ है संत।।
***

किलकोटी पप्पी करे,
मेमसाब के संग।
मेमसाब पुचकारती,
उयै लगा कें अंग।। 
****

बिषय- मौ फुलाय

तनक-तनक-सी बात पै,
मौ जो लेत फुलाय।
ऐसै विकट सुभाव कौ, 
कोऊ नईं  सुहाय।।

*****
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बिषय-कुतका

मोसें तौ लै जात ते,
वे पइसा जब चाय।
मैंने माँगे एक दिन,
कुतका दऔ बताय।।
***

बिषय-खरियाट

हों छोटे या हों बड़े
खल करबें खरयाट।
सूदे सें मानै नईं,
डंडा इनकी काट।।
***
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बिषय- नैनू

नैंनू सें घी बनत है,
औ घी सें बलबान।
होम-धूप , पूजा-दिया,
मधुर-मधुर पकवान।।
     ***
दूद-दई, माखन सबइ,
मथुरा-हाट बिकाय।
कान्हा मटकी फोर कें,
दीनो बंद कराय।।
***
सीनाजोरी सें मिलै,
या चोरी सें पायँ।
कान्हा अगुआ हैं बने,
नैंनू सब मिल खायँ।।
     ***
मीठी बानी बोलिए,
मन-मक्खन हो जाय।।
काम सादबे कौ 'कँवल',
सीदौ-सरल उपाय।।
     ***
बोइ सफल जो आजकल,
मक्खन खूब लगाय।
इक दूजे की पीठ खों,
या फिर रऔ खुजाय।।
******
बिषय-पथरा

पथरा है जो मील का,
ठाँड़ो एकइ धाम।
मंजिल की देता खबर,
भौत बड़ौ जौ काम।।

पथरा परबत पै बड़ौ,
आय न कौनउँ काम।
पथरा नौनौ बाट कौ,
पंथी खों आराम।।

अक्कल पै पथरा परे,
काट रये हैं रूख।
बरसा में अंतर परो,
नदी- ताल गय सूख।।

पथरा थे जो नींव के,
उनखों दऔ भुलाय।
सज-धज कें ऊपर चढ़ो,
कलस रऔ इतराय।।

पथरा छोड़ो राम नै,
गऔ समन्दर डूब।
राम लिखे तौ तैर गय,
जौ अचरज है खूब।।
***
ठुमक-ठुमक बिटिया निगी,
पैजनिया छनकाय।
कानन में घण्टी बजीं,
सब घर ख़ों हरसाय।।

ठुमक-ठुमक बिटिया निगी,
पैलउँ-पैलउँ बार।
पैजनिया छम-छम बजी,
गूँज उठो घर-द्वार ।।

***

कलाकंद दोहा बने,
मिठया सब कवि वृंद।
पढ़-पढ़ कें गुरया गये,
भऔ पटल आनंद।।

***

डुबरी मउआ की बनी,
फरा डरे हैं ऐंन।
दद्दा,बब्बा, बाइ, बउ,
खा रय भैया-बैंन।।

छोटे मउआ चाउनै,
और फरा खों चून।
संग चिरोंजी हो डरी,
डुबरी बढ़ाय खून।।

हँड़िया में डुबरी चुरै,
बिना दूद की खीर।
लँय कचुल्ला हैं खड़े,
नइँ लड़ेर खों धीर।
***

बुरा खोजता हृदय में
जानै जग की पीर।
जो घर बारै आपनौ,
साँचौ वही कबीर।।

उसके पाछें हरि फिरें,
जो गंगा-सा नीर।
निर्मल हृदय चाहिए,
जैसा संत कबीर।।
***

(मौलिक-स्वरचित)
-रामगोपाल रैकवार, टीकमगढ़

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