मंगलवार, 15 सितंबर 2015

पुस्तक समीक्षा- ‘राना का नज़राना (ग़ज़ल संग्रह)-समीक्षक:- उमा शंकर मिश्र ‘तन्हा’,टीकमगढ़


पुस्तक समीक्षा- ‘राना का नज़राना (ग़ज़ल संग्रह)
                    ग़ज़लकार:- राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
                    प्रकाशन:- म.प्र. लेखक संघ,टीकमगढ़
                    समीक्षक:- उमा शंकर मिश्र ‘तन्हा’,टीकमगढ़
                    प्रकाशन वर्षः- 2015
                    मूल्यः-100रु.                पेज-120
    ‘‘राना का नज़राना’’काबिले तारीफ़ है- उमाशंकर मिश्र ‘तन्हा’
        राना का नज़राना’ नगर के प्रख्यात कवि व साहित्यकार,कई पुरस्कारों से सम्मानित और देश कार की कई भाषाओं की  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ की चैथी किताब है इससे पहले इनके तीन संग्रह ‘अर्चना’,रजनीगंधा,और ‘नौनी लगे बुन्देली’ प्रकाशित हो चुके है। अलग-अलग विधाओं में क़लम का जादू बिखेरने वाले ‘राना लिधौरी’ की इस 120 पेजों किताब उनकी 112 ग़ज़लों का संग्रह है।
        ‘राना’ ने अपने इस मजनुमा-ए-ग़ज़ल में जि़न्दगी एवं समाज के लगभग प्रत्येक पहलू पर अशआर नुमायाँ किये हैं। हालांकि राना जी ने खुद लिखा है कि इन्होंने अपनी ग़ज़लों में मेहबूबा,माशूका, आदि से दूर रखकर आज के हालात पर तथा तमाम विषयों पर क़लम चलाने की कोशिश की है परन्तु,उन्होंने जिस नज़ाकत से प्यार, मुहब्बत, जुदाई, वफ़ा और बेवफ़ाई पर अपने जज़बात प्रकट किये हैं वो भी कम क़ाबिले-तारीफ़ नहीं है।
कुछ बानगियाँ देखिए-    चाँदनी रात में ये हुश्न निखर जाने दो।
            आज तो जु़ल्फ़ को शानों मे बिखर जाने दो।।
    और-          भूल जाओगे अजी सारा जहाँ।
             उससे नैना तो लड़ाकर देखिए।।
ये शेर किसी उस्ताद रूमानी शायर के शेरों से कम वज़न नहीं रखते।
उनके टूटे हुए दिल के ज़ज़्बात पर भी गौर फरमाये- प्यार का अपने चाहा था हमने सिला।
                           बेबफ़ाई का तोहफा दिया आपने।।
कहीं प्यार की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अपना बड़ा दिल प्रदर्शित करते हुए उनका क्षमा भाव भी देखिए-
                     बद्दुआयें न देंगे कभी आपको।
                    भूल जायेगे जो भी किया आपने।।
            अन्य मसलांे पर तो उनकी क़ल़म की जादूगरी देखते ही बनती है। चाहे देशभक्ति हो या कौमी एकता, मज़हब की बात हो या हौंसलों की, सभी विषयों पर रानाजी ने बेहतरीन शे’र पेश किये है।  अन्य मसलों पर लिखे गये कुछ यादगार शेर पेश हंै-
            देश की है शान,मेरी जान तिरंगा। न हिन्दु,न इसाई,मुस्लमान तिरंगा।।  
            देश रक्षा के लिए खून बहाने की जगह। हम लहू दंगे फसादों में बहा देते है।।
            राना ने खुद बड़ी सफगोई से बडप्पन दर्शाते हुए स्वीकार किया है कि उन्हें बहर का ज्ञान नहीं है और मात्राओं का दोष न देखा जाये उन्होेंने बड़ी ही कुशलता से अपनी भावनाओं को सरल व सहज ढंग से व्यक्त किया है। अतः हम इस पहलू पर बात नहीं करेगे।
        राना अपने एक रोग के बारे में खुद लिखते है कि- नहीं मैं बच सका इस संक्रमण से।
                                 मैं भी कवि हँू रोग लगा है छपास का।।
उनकी शायरी कल्पनाओं पर नहीं यथार्थ पर आधारित हैं। जैसे-किया राना ने जो महसूस अब तक।
                               क़लम उस पर चलाना चाहता हँू।।
फिर लिखते हैं- छोड़ दो ऐसी मधुर इक तान ‘राना’ तुम यहाँं।
            सब मचल जायेंगे उसको गुनगुनाने के लिए।।
जिन्हें सुनकर उनके अशआर गुनगुनाने का मन अनायास ही करने लगता है।
राना जी मजहबी दायरे से बाहर निकल कर ईश्वर को एक और सर्वव्यापी मानते हुए इंसानियत का पैग़ाम देते है-        पड़ा क्यों तू मज़हब के चक्कर में नादाँ।
        अगर तू है इंसां तो इक जात होगी।।
    और-        न गिरजा,न मस्जि़द,न मंदिर मिलेगा।
            न ढँूडों उसे दिल के अंदर मिलेगा।।
इसी तरह-     वो तो हर शै में मौजू़द है। कहते है कि पता चाहिए।।
एक मंझे हुए व्यंग्यकार होने के नाते राना भला राजनीति और नेताओं को कहाँ बख्सने वाले थे-
        इनका कोई ईमान हे,न कोई धरम है।
        जनता को कैसे ये तो उल्लू बनाये है।।
और ज़्यादा तीखापन लाते हुए कहते  है-     हिन्दू औ मुसलमां का लड़ाते है ये नेता।
                         वोटों के लिए दंगे कराते है ये नेता।।
        इस संग्रह में जो चमकते हुए शेर कहे जा सकते है वो लगते है जैसे दुष्यंत कुमार से प्रेरित होकर लिखे गये हो-     जि़न्दगी भी मोम सेी गलने लगी हैै।
                 जब से ज़हरीली हवा चलने लगी है।।
और -    भूख से बेहाल बच्चा,रो रहा था सड़क पर।
    माँ उसे कैसे खिलाती,रोटियाँ सच्चई की।।
उनकी दो ग़ज़लें ‘चर्चित हो गये और ‘मन देखा है’ हिन्दी ग़ज़ल की ओर बढ़ते उनके क़दमों की परिचायक है।
    राना ने अपनी ग़ज़लों में कुछ अटपटे और अंग्रेजी शब्दों से भी परहेज नहीं किया है जैसे-हड्डी,लात,ठूँठ,सड़ा गधा,चैक,एडवांस, फ्यूज़ बल्व आदि। ये लफ़्ज़ उनके शेरों के और भी रोचक बनाते है।
बनगी देखिए- हराम की कमाई का फल मिलता सड़ा है।
    और         ‘राह में तेरी खड़ा इक ठँूठ सा,
            अब बहारों का नज़ारा ढूँडता हँॅू।।
अंग्रेजी शब्दों का भी बेहतरीन उपयोग देखिए- आदर्श विवाह सिफ़्र दिखावा है दोस्तों।
                        चैक भी एडवांस में मगाने लगे  है लोग।।
इनकी क़लम में हास्य भी भला कहाँ अछूता रहता- इस उम्र में ये जवानी की मत उमंगे रख।
                           फ्यूज़ बल्व में मौजूद बिजलियाँ नहीं होती ।।
क्रिकेट खिलाड़ी व खेल पे्रमी होने के नाते एक शेर में उनकी ये पीड़ा भी देखिए-
                    हम विदेशी कोच रखकर भी यहाँ।
                    मैंच फिर भी जीत क्यों पाते नहीं।।
        कुल मिलाकर मुख़्तलिफ़ किस्म के मोतियों को पिरोये ‘राना का नज़राना’ एक बेहतरीन माला बन पड़ी है। हाॅलाकि ग़ज़ल शायर का लहू माँगती है जिसके लिए बेहद गहरा अध्ययन और इस्लाह की आवश्यकता होती है फिर भी जानिब राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ का ये प्रथम प्रयास काबिले तारीफ़ है। उनके निरंतर सीखने की लगन उन्हें अदबी बुलन्दियों पर ले जायेगी। उन्हीं के शब्दों में हम सबकी दुआये है-
                        राना तू खूब लिखता चल,अपने कलाम को।
                        शायरी में लोग भी तुमको शुमार देखेंगें।।
              
            888        समीक्षक-     - उमाशंकर मिश्र ‘तन्हा’
                            सेकेटरी-तंज़ीम बज़्म-ए-अदब’
                            टीकमगढ़ (म.प्र.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें