शनिवार, 2 मई 2015

व्यंग्य- ‘‘ लक्ष्मी जी का इंटरव्यू ’’-व्यंग्य-राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’

व्यंग्य- ‘‘ लक्ष्मी जी का इंटरव्यू ’’



                    (व्यंग्य-राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’)

               
                लक्ष्मी जी को आज, कलयुग में इस धरती लोक में सबसे ज्यादा पूजा जाता है।  मेरा मानना है कि उनके पतिदेव विष्णु जी भी स्वर्ग लोक में उनका उतना नाम नहीं लेते होगें, जितना हम पृथ्वीवासी यहाँ पर उनका नाम,ध्यान एवं पूजा करते है उनका महत्व हर पल महंगाई की तरह बढ़ता ही जा रहा है। लक्ष्मी जी आज सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण एवं बहुत उपयोगी हो गयी है। गरीब हो या अमीर सभी लक्ष्मी जी के पीछे हाथ धोकर पडे हैं।कुछ उनसे आगे भी निकल गये है।। मै भी लेखक एवं पत्रकार होने के नाते उनके पीछे पड़ गया और उनका इंटरव्यू लेने के लिए बडी मुश्किल से उन्हें तैयार किया लक्ष्मी जी ने समयाभाव के कारण बहुत ही कम समय में संक्षिप्त में इंटरव्यू के माध्यम से जो बातें की वह इस प्रकार है-
मैंने पहला प्रश्न पूछा-  हे देवी लक्ष्मी जी, आपने अपना वाहन ‘उल्लू’ को ही क्यों चुना ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया- क्योंकि सभी लोग मेरे पीछे पडे़ रहते हैं, उन्हें उल्लू की तरह सत्य एवं धर्म ,सही और गलत कुछ भी दिखाई नहीं देता है और वे लोग दूसरों को  उल्लू बनाते रहते है और मैं उनको उल्लू बनाती रहती हँू। उल्लू हम दोनों के बीच काॅमन हेाता है इसलिए हमने अपना वाहन उल्लू को ही चुना।
मैंने दूसरा प्रश्न पूछा-        हे देवी जी, आप गरीबों के पास क्यों नहीं रहती ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     क्योंकि गरीब लोग हमेशा मेरा रोना ही रोते रहते है, कहते है कि मेरे पास कुछ नहीं है काम धन्धा कुछ करते नहीं और मुफ़्त में मुझे पाने के ख्वाब देखते रहते है यदि मैं कहीं से प्राप्त भी हो जाऊँ तो उसे शराब और जुआ आदि में नष्ट कर देते हंै। वे मुझे अपने पास स्वयं नहीं रखते
मैंने तीसरा प्रश्न पूछा-    आप अमीरों के पास ही क्यों अधिक रहना पंसद करती हो ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     क्योंकि अमीर लोग रोज उठते से ही नियम से मेरी पूजा-अर्चना करते     है मुझे सदा शुद्ध घी एवं मावा की बढि़या मिठाईयाँ खिलाते रहते हैं मेरी हिफाजत करते है, मेरी चिंता में चिंता ग्रस्त रहते हैं मेरी नाम की माला चैबीस घण्टे जपते रहते है और यहाँ तक कि मेरी चिंता में खुद ही रोगग्रस्त हो जाते है, लेकिन मुझे फिर भी नहीं भूलते यहाँ तक कि मेरी ख़ातिर वे अपने माँ-बाप एवं रिस्तेदारों आदि तक को भूल जाते हैंैं। वे मुझे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं मेरे लिए अपनी जान तक दे देते है रहने की बेहतरीन व्यवस्था करते हैं। इतना त्याग गरीब कभी नहीं कर सकता।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    सुना है आप बहुत चंचल हा,े एक स्थान पर ज्यादा टिकती नहीं हो ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     हाॅ, वो क्या है कि कभी-कभी कुछ अमीरों को मेरी वजह से कुछ ज्यादा     ही घमंड हो जाता है और वे मद में चूर होकर मुझे तक भूल जाते है ऐसे     में मुझे उनकी सही औकात दिखाने के लिए वहाँ से किसी चोरी,डकैतीया छापा पड़वाकर या किसी अन्य माध्यम से दूसरी जगह जाना पड़ता है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    ऐसा माना जाता है कि हम इंसानों में विशेष प्रजाति ‘नेता’ एवं ‘पुलिस’ पर आपकी बहुत कृपा दृिष्ट रहती है ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     हाॅ, यह बात सही है नेता मेरा प्रिय शिष्य है क्यांेकि वो मुझे देश के                     विभिन्न स्थानों के साथ-साथ विदेश भ्रमण पर ले जाता है मेरा मन एक                     स्थान,एक देश में रह कर ऊब जाता है। इसीलिए नेता मुझे विदेश भ्रमण                         कराता है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आपको कौन सा देश भ्रमण करने में सबसे ज्यादा मज़ा आता है ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     मुझे भारत में मुंबई,दिल्ली एवं विदेशों में स्विट्जरलंैंड बहुत पंसद है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आप कहाँ रहना अधिक पसंद करती हैं आपका पसंददीदा स्थान ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     मुझे स्विट्जरलंैंड में स्विस बैंकों में ‘यू बी एस’ बैंक बहुत ज्यादा प्रिय है मैं
अधिकांश समय वहीं पर रहती हूँ। यदि मैं मर भी गयी तो इसी जगह पर मरना पसंद करूंगी। वहाँ का एकांत मुझे बहुत पसंद है कोई डिस्टर्वेंस नहीं करता।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आपका स्थायी पता क्या है ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     वैसे मेंै रहती तो विष्णु जी के साथ ही हँू ,लेकिन उन्हें मेरे साथ रहने का वक्त ही नहीं मिलता, इसलिए मैंने अपना एक नया फ्लैट स्विट्जरलंैंड में स्विस बैंकों में ‘यू बी एस’ बैंक खरीद लिया है वही पर रहती हँू।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    और पुलिस पर भी तो आप मेहरवान होती है कोई खास वजह ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     भई ऐसा है कि पुलिस मेरे प्रिय शिष्य नेता की भी शिष्य होती हैं इसलिए                     उसका भी थोड़ा बहुत ध्यान रहना पड़ता है।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    आपको प्रसन्न करने के क्या उपाय हैं, बतायें ?   
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     यह उपाय तो आप मेरे शिष्यों से ही सीख सकते है, आप नेता, पुलिस, चोर, उद्योगपतियों आदि से ट्रेनिंग भी ले सकते हो।
मैंने अगला प्रश्न पूछा-    दीपावली पर आपकी विशेष पूजा अर्चना की जाती है लेकिन फिर भी आप हम                 लोगों से प्रसन्न क्यों नहीं होती ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     मैं तो सभी के पास आना चाहती हँू लेकिन क्या करूं मजबूर हँू एक तो मेरा वाहन उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता है और दूसरा मैं दीपावली पर आना चाहँू तो आपके पटाखों और बमों की आवाज सुनकर     मेरा उल्लू दूर से ही लौट जाता है।
मैंने एक अंंितम प्रश्न पूछा-    आपकी हमशक्ल को आपसे ज्यादा प्रसिद्धी क्यों मिल रही है ?
लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया-     ऐसा है कि वो मेरी जुड़वा बहन हैं मैं पहले हुई थीं वह एक मिनिट बाद                     इसलिए उसका नाम ‘दो नंबर की लक्ष्मी’ हैं और छोटे को तो हमेशा ही   ज्यादा प्यार मिलता है। इसलिए वह छोटी होने का फायदा उठा रही है।
मैंने लक्ष्मी जी को इंटरव्यू लेने के लिए समय देने के पर बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और अब मैं आपको उल्लू बनाने के लिए यह व्यंग्य लिख रहा हँू।

    888    / राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
        संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका
       अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
      शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
       पिनः472001 मोबाइल-9893520965
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